नज़ीर की रचना--कन्हैया का बालपन
आज ही भाई नासिरूद्दीन ने यहां कन्हैया का बालपन चढ़ाई है । बेहद रोचक पोस्ट है । अभी हाल ही में कबाड़खाना पर भाई अशोक पांडे ने अपनी इस पोस्ट पर यही रचना चढ़ाई थी । आज मुंबई पर जन्माष्टमी की तरंग इस क़दर तारी है कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं और तीस दिसंबर 2007 को जारी की गयी इस पोस्ट को दोबारा ठेल रहा हूं । आशा है कि रेडियोवाणी के पाठक आज इस रचना को दोबारा पढ़ और सुनकर मुदित ही होंगे । हाथी घोड़ा पालकी....बोलो...जय कन्हैया लाल की ।।
रेडियोवाणी पर इस रचना को मैं लंबे अरसे से चढ़ाना चाह रहा था । नज़ीर अकबराबादी की रचनाएं कम ही गायकों ने गाई हैं । मुझे पीनाज़ मसानी के अलावा अहमद हुसैन मुहम्मद हुसैन ही याद आते हैं जिन्होंने उनकी कुछ रचनाएं गायी हैं जबकि इन रचनाओं में गायकी की अपार गुंजाईश रही है । मुझे कृष्णलीला वाली ये कविता हमेशा से प्रिय रही है । इसे सुनने से पहले ज़रा नज़ीर अकबराबादी के बारे में आपको थोड़ी सी जानकारी दे दी जाए ।
नज़ीर अकबराबादी का असली नाम था वली मुहम्मद ।
अठारहवीं सदी में हुए इस नामचीन उर्दू शायर ने तकरीबन दो लाख रचनाएं लिखी थीं लेकिन बदकिस्मती से ज्यादातर अतीत की गर्द में खो चुकी हैं । तकरीबन छह सौ कविताएं ही प्रकाशित रूप में उपलब्ध हैं ।
नज़ीर ने भारतीय जन-जीवन के कई बारीक पहलुओं पर कविताएं कहीं । उनकी 'होली' पर केंद्रित कविता 'जब फागुन रंग महकते हों तो देख बहारें होली की' भारतीय साहित्य की एक अनमोल कृति है । होली का इतना बारीक और ललित चित्रण शायद ही कहीं मिलेगा । नज़ीर ने मेलों-ठेलों से लेकर रोटियों चूडि़यों, रीछ, होली, दीवाली, आगरे तक ना जाने किन किन विषयों पर अपनी कलम चलाई । वे जनता के शायर थे । बौद्धिक जुगाली की बजाय उन्होंने सादा शब्दों में अपनी बात कहकर जनता के दिल पर राज किया ।
बचपन पर नज़ीर की एक कविता है, जिसका अंश पढि़ये--
क्या दिन थे यारो वह भी थे जबकि भोले भाले ।
निकले थी दाई लेकर फिरते कभी ददा ले ।।
चोटी कोई रखा ले बद्धी कोई पिन्हा ले ।
हँसली गले में डाले मिन्नत कोई बढ़ा ले ।।
मोटें हों या कि दुबले, गोरे हों या कि काले ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।
इसे आप कविता-कोश में यहां पूरा पढ़ सकते हैं ।
अब ज़रा दीवाली पर उनकी कविता की बानगी देखिए--
जहां में यारो अजब तरह का है ये त्यौहार
किसी ने नक़द लिया और कोई करे उधार
खिलौने, खलियों, बताशों का गर्म है बाज़ार
हर एक दुकान में चराग़ों की हो रही है बहार ।।
मिठाईयों की दुकानें लगा के हलवाई पुकारते हैं
कह--लाला दीवाली है आई बतासे ले को,
बरफी किसी ने तुलवाई
खिलौने वालों की उन से ज्यादा है बन आई
ऐसे थे नज़ीर । जिनकी कुछ कविताएं आगे चलकर रेडियोवाणी या तरंग पर ही आपको पढ़वाई जायेंगी । पर फिलहाल सुनिए ये रचना । जिसमें श्री कृष्ण की लीला का कमाल का वर्णन किया गया है । आपको बता दें कि ये पीनाज़ मसानी की आवाज़ है और संगीत जयदेव का है । जिस दिन मैं इस गीत को सुन लेता हूं दो तीन दिन तक बस ज़बां पर छाया रहता है । आप भी सुनिए और इस अनमोल अदभुत रचना का आनंद लीजिए ।
यारो सुनो ये ब्रज के लुटैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।।
मोहन-स्वरूप नृत्य, कन्हैया का बालपन
बन बन के ग्वाल घूमे, चरैया का बालपन
ऐसा था, बांसुरी के बजैया का बालपन
क्या क्या कहूं मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।।
ज़ाहिर में सुत वो नंद जसोदा के आप थे
वरना वो आप ही माई थे और आप ही बाप थे
परदे में बालपन के ये उनके मिलाप थे
ज्योतिस्वरूप कहिए जिन्हें, सो वो आप थे
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन
क्या क्या कहूं ।।
उनको तो बालपन से ना था काम कुछ ज़रा
संसार की जो रीत थी उसको रखा बचा
मालिक थे वो तो आप ही, उन्हें बालपन से क्या
वां बालपन जवानी बुढ़ापा सब एक सा
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।।
क्या क्या कहूं ।।
बाले थे ब्रजराज जो दुनिया में आ गये
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गये
इस बालपन के रूप में कितना भा गये
एक ये भी लहर थी जो जहां को जता गये
यारो सुनो ये ब्रज के लुटैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन
क्या क्या कहूं ।।
परदा ना बालपन का अगर वो करते जरा
क्या ताब थी जो कोई नज़र भर के देखता
झाड़ और पहाड़ ने भी सभी अपना सर झुका
पर कौन जानता था जो कुछ उनका भेद था
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन
औ'मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन
क्या क्या कहूं ।।
