संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Monday, July 23, 2007

क्‍या आप कब्‍बन मिर्ज़ा को जानते हैं । आईये उनके गाने सुनें ।


कब्‍बन मिर्ज़ा—क्‍या ख़ास है इस नाम में । कुछ नहीं । सुनकर लगता है कि लखनऊ का कोई शख़्स होगा और क्‍या ।

लेकिन कब्‍बन मिर्ज़ा सिर्फ़ एक नाम नहीं है, कब्‍बन मिर्जा एक आवाज़ हैं ।

अगर आज कब्‍बन साहब जिस्‍मानी तौर पर हमारे बीच नहीं हैं तो क्‍या हुआ, आवाज़ तो है ही उनकी, जो हमारे भीतर अजीब-सी कैफियत पैदा करती है । अगर आपको फिल्‍म-संगीत से प्‍यार है तो ज़रूर आप कब्‍बन मिर्ज़ा को जानते होंगे । कब्‍बन साहब ने कमाल अमरोहवी की फिल्‍म ‘रज़िया सुल्‍तान’ के दो गीत गाये और ऐसे गाये कि आज तक ज़माना इन्‍हीं गीतों के ज़रिये कब्‍बन मिर्ज़ा को याद करता है ।

ये गाने हैं--
तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है
और
आई ज़ंजीर की झंकार ख़ुदा ख़ैर करे

सबसे दिलचस्‍प बात ये है कि कब्‍बन मिर्ज़ा विविध-भारती में काम करते थे । और श्रोता बरसों-बरस उन्‍हें ‘संगीत-सरिता’ की उनकी प्रस्‍तुतियों के लिए याद करते रहे । सन 1996 में जब मैं विविध-भारती आया तब तक मिर्ज़ा साहब रिटायर हो चुके थे । एक दिन अचानक वो विविध-भारती आए और उन्‍हें देखकर मैं दंग रह गया । लंबा क़द, माथे से काफी पीछे सरक चुके घुंघराले बाल, बिना इन की हुई शर्ट, चेहरे पे मुस्‍कान, मिज़ाज में लखनऊ की नफ़ासत । मैं तो उनके सामने बच्‍चा था । मैंने कहा मैं तो धन्‍य हो गया आपके दर्शन करके । उन्‍हें अच्‍छा लगा । दरअसल ये वो दिन थे जब मिर्ज़ा साहब को कैंसर हो चुका था और उनका जसलोक अस्‍पताल में इलाज हुआ था । इस दरम्‍यान वो ठीक भी हो चुके थे ।

बाद में एक प्रायोजित कार्यक्रम ‘एच.एम.टी. समय-यात्रा’ या ऐसा ही कुछ नाम था उस कार्यक्रम का, जिसके लिये एकाध हफ्ते तक वो लगातार आए । एक दिन मैं उनके साथ स्‍टूडियो में बैठ गया और काम में उनकी मदद की । उन्‍हें काम करते देखकर अच्‍छा लगा । रेडियो को इन जुनूनी लोगों ने ही ऊंचाई तक पहुंचाया था ।

कब्‍बन साहब के बारे में मैं ज्‍यादा नहीं जानता पर उनकी जिंदगी का जिक्र मुझे ‘भावुक’ ज़रूर बना देता है । कैंसर से दो बार लड़े कब्‍बन साहब और जब दूसरी बार कैंसर लौटा तो फिर...........। ज़रा सोचिए कि आवाज़ ही जिसकी पहचान थी, उस व्‍यक्ति पर कैंसर से अपनी आवाज़ खो देने के बाद क्‍या गुज़रती होगी । कितनी पीड़ा और कितनी बेबसी झेली होगी कब्‍बन साहब ने । मुंबई के एक सुदूर उपनगर मुंब्रा में एक दिन वो चुपचाप से इस दुनिया से चले गये । लेकिन कब्‍बन साहब की आवाज़ है और दिल को बेचैन करती है ।

पिछले सप्‍ताह मैंने जब अपने छायागीत के लिए उनका गाया, अपना मनपसंद गाना चुना और उसे महीनों बाद बार-बार सुना तो बहुत अच्‍छा भी लगा और अफ़सोस भी हुआ । अच्‍छा लगा आवाज़ सुनकर । अफ़सोस हुआ कि इस तरह की आवाज़ को फिल्‍मों में ज्‍यादा मौक़े नहीं मिले । मैंने कोशिश की कि उनकी कोई तस्‍वीर मिल जाये, तो वो भी नहीं मिली ।

कमाल अमरोही ने अपनी सबसे महंगी फिल्‍म ‘रज़ि‍या सुल्‍तान’ में उनसे दो गाने गवाये थे । इस फिल्‍म में धर्मेंद्र एक हब्‍शी ‘याकूब’ बने थे और धर्मेन्‍द्र के लिए अमरोही साहब को चाहिये थी एक भारी-भरकम गैर पेशेवर आवाज़ । पचास लोगों का ऑडीशन लिया उन्‍होंने और कोई आवाज़ उन्‍हें नहीं जमी । किसी ने कब्‍बन मिर्ज़ा का नाम उन्‍हें सुझाया । तब कब्‍बन मिर्ज़ा तब मुहर्रम के दिनों में नोहाख्‍वां का काम करते थे । यानी मरसिये और नोहे गाते थे । आपको बता दूं कि मरसिये और नोहे बहुत ही विकल स्‍वर में गाये जाते हैं । हालांकि आज इन्‍हें गाने वालों की तादाद काफी कम हो रही है । पर कई साल पहले जबलपुर में मुझे मुहर्रम के वक्‍त ऐसी महफिल में जाने का मौका मिला था जहां मरसिये गाये जा रहे थे । मैंने आकाशवाणी-जबलपुर के लिए उन्‍हें रिकॉर्ड कर लिया
था । बहरहाल—तो कब्‍बन मिर्ज़ा का ऑडीशन लिया गया और ये आवाज़ कमाल अमरोहवी को पसंद आ गयी । इस तरह ये दोनों गाने रिकॉर्ड हुए ।

पहले ज़ि‍क्र इस गाने का--- ‘आई ज़ंजीर की झंकार, ख़ुदा ख़ैर करे’
इसे जांनिसार अख़्तर ने लिखा था, आज के जाने-माने गीतकार जावेद अख़्तर के वालिद थे अख़्तर साहब । और उर्दू के नामचीन शायर ।

ख़ैयाम साहब का टिपिकल-अरेंजमेन्‍ट है ये । एकदम दिव्‍य । शुरूआत बहुत गाढ़ी बांसुरी और संतूर की तरंगों से होती है और उसके बाद इसमें रबाब की लहरें शामिल हो जाती हैं, ख़ालिस अरेबियन धुन लगती है । फिर दिल को झंकृत कर देने वाली कब्‍बन मिर्ज़ा की आवाज़ । जब कब्‍बन मिर्ज़ा इसके दूसरे शेर ‘जाने ये कौन मेरी रूह को छूकर गुज़रा’ पर पहुंचते हैं तो अपनी आवाज़ को काफी ऊंचे सुर पर ले जाते हैं, इससे इस गाने में अंतर्निहित विकलता और बढ़ जाती है । इस गाने को सुनकर आप महसूस करेंगे कि जो असर आज हिमेश रेशमिया के ‘ढकचिक-ढकचिक’ रिदम और ‘वेस्‍टर्न-अरेन्‍जमेन्‍ट’ में नज़र नहीं आता, वो कितनी मासूमियत के साथ ख़ैयाम साहब के मिनिमम-रिदम और एकदम नाज़ुक अरेन्‍जमेन्‍ट में इतनी शिद्दत के साथ नज़र आता है । पढ़ि‍ये, सुनिए और मज़ा लीजिये इस गाने का ।


आई ज़ंजीर की झंकार ख़ुदा ख़ैर करे
दिल हुआ किसका गिरफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे

जाने ये कौन मेरी रूह को छूकर गुज़रा
इक क़यामत हुई बेदार ख़ुदा ख़ैर करे

लम्‍हा-लम्‍हा मेरी आंखों में खिंची जाती है
इक चमकती हुई तलवार ख़ुदा ख़ैर करे

ख़ून दिल का ना छलक जाए कहीं आंखों से
हो ना जाए कहीं इज़हार ख़ुदा ख़ैर करे ।।
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दूसरा गाना है —तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है ।

इस गाने का संगीत-संयोजन भी काफी-कुछ पिछले गाने जैसा ही है । वही संतूर और बांसुरी की तरंगें और वहीं झनकती हुई आवाज़ कब्‍बन सा‍हब की । इसे निदा फ़ाज़ली ने लिखा है ।

आईये पहले इसे पढ़ें--

तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है.............हिज्र—विरह
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्‍यूं, तू कहीं भी हो मेरे साथ है ।।

मेरे वास्‍ते तेरे नाम पर, कोई हर्फ़ आए, नहीं-नहीं
मुझे खौफे-दुनिया नहीं मगर, मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है ।।

तेरा वस्‍ल ऐ मेरी दिलरूबा, नहीं मेरी किस्‍मत तो क्‍या हुआ,
मेरी माहजबीं यही कम है क्‍या, तेरी हसरतों का तो साथ है ।।

तेरा इश्‍क़ मुझपे है मेहरबां, मेरे दिल को हासिल है दो जहां,
मेरी जाने-जां इसी बात पर, मेरी जान जाए तो बात है ।।
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कब्‍बन मिर्ज़ा ने फिल्‍म ‘शीबा’ में भी एक गाना गाया था इसके अलावा कुछ और गुमनाम फिल्‍में थीं जिनमें उनके गाने थे । मेरी तलाश जारी है ।

कब्‍बन मिर्जा की तस्‍वीरें यहां देखें
http://radiovani.blogspot.com/2007/07/blog-post_3434.html

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