संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Monday, January 24, 2011

रघुवर तुमको मेरी लाज--पंडित भीमसेन जोशी को नमन।

ये तो याद नहीं कि पंडित भीमसेन जोशी को 'मिले सुर मेरा तुम्‍हारा' से पहले कब सुना था। स्‍कूल जाने वाले उन कच्‍चे-कच्‍चे दिनों में संगीत में दिलचस्‍पी के अंकुर शायद फूट ही रहे थे। शास्‍त्रीय संगीत को समझने का ना कोई ठौर था ना ठिकाना। पर चीज़ें कहीं-कहीं से मिल जाती थीं, तो सुन लिया करते थे।

पंडित भीमसेन जोशी के भजन निश्चित रूप से हम बेचैनों के भीतर bhimsen_joshi1_20081106 एक ठहराव पैदा करते थे। उन्‍होंने कबीर ख़ूब गाया था। म.प्र. के नन्‍हे से छिंदवाड़ा आकाशवाणी केंद्र में 'संझवाती' नामक कार्यक्रम होता था। तब आवारागर्दी के दिन थे। 'युववाणी' की ड्यूटी होती तो आकाशवाणी में पाए जाते। ना होती तो भी कॉलेज 'बंक' करके डेरा डाले रहते। लोगों को काम करते देखते। लाइब्रेरी की ख़ाक छानते। सीनियर्स की सिर खाते। दोस्‍तों पर रौब जमाते कि आज कुमार गंधर्व की रचना सुनी। आज भीमसेन जोशी के स्‍वर में

'कबीर' सुना।

भीमसेन जोशी की शास्‍त्रीयता से हमारा नाता-रिश्‍ता ज़रा कम था। हमें तो उनकी आवाज़ एक इसलिए पसंद थी कि उन्‍हें सुनकर हमारे भीतर का तूफान ज़रा ठहर जाता था। थोड़ा भला-भला सा लगता था। ऐसा हमेशा होता रहा। जसराज जी, भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व और पंडित छन्‍नू लाल मिश्रा....इन चार विभूतियों को सुनना हमेशा अच्‍छा लगता रहा।

आज 'दद्दा' चले गए।  पर उनका 'सुनो सुनो साधो जी' या 'बीत गए दिन भजन बिना रे' या 'नैहर छूटो जाए' या फिर 'माझे माहरे पंढरी' सुनकर अच्‍छा लगता था। मराठी रचनाएं तो समझ भी कम आती हैं। पर फिर भी भली-भली सी  लगती हैं। नौकरी के शुरूआती दिनों में जब लोकल-ट्रेनों का सफर करना होता था तब ट्रेनों की भजन-मंडलियां अकसर भीमसेन जोशी की रचनाएं तन्‍मयता से गातीं नज़र आतीं। ये लगता कि इन रचनाओं को गाने से इन लोगों का ट्रेन के नारकीय सफ़र का दुख कम हो जाता होगा। और शायद वो अपनी जिंदगी का सामना ज्‍यादा साहस के साथ कर पाते होंगे।

दिलचस्‍‍प तथ्‍य ये है कि पंडित जी ने कुछ फिल्‍मों में भजन भी गाए। या यूं कहें कि उनके गाए कुछ भजन फिल्‍मों में लिए गए। 'संत तुलसीदास' और 'अनकही' फिल्‍मों के नाम याद आते हैं। 'अनकही' अमोल पालेकर की फिल्‍म थी। बॉबी ने अपनी साइट पर 'अनकही' पर
यहां लिखा है। इस फिल्‍म का संगीत जयदेव का था।

आईये गोस्‍वामी तुलसीदास की ये रचना सुनें पंडित जी के स्‍वर में।

bhajan: raghuvar tumko meri laaj
singer: pt bheemsen joshi
film: ankahee
year: 1985
music: jaidev
duration: 5 34
डाउनलोड लिंक- ये रही



रघुवर तुम को मेरी लाज
सदा सदा मैं शरण तिहारी 
तुमहो गरीब निवाज
रघुवर तुम को मेरी लाज
पतित उद्धारण विरद तिहारो श्रवनन सुनी आवाज
हूँ तो पतित पुरातन करिए
पार उतारो जहाज
रघुवर पार उतारो जहाज
रघुवर तुम को मेरी लाज

अघ खंडन दुःख भंजन जन के
यही तिहारो काज
रघुवर यही तिहारो काज
तुलसीदास पर किरपा कीजे भक्ति दान देहु आज
रघुवर भक्ति दान देहु आज
रघुवर तुम को मेरी लाज
सदा सदा मैं शरण तिहारी
तुम हो गरीब निवाज
रघुवर तुमहो गरीब निवाज
रघुवर तुम को मेरी लाज


यू-ट्यूब पर इस रचना का ग़ैर-फिल्‍मी संस्‍करण है। जिसकी रफ्तार में थोड़ा परिवर्तन है।


भीमसेन जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजली।

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