संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Friday, April 2, 2010

पंचम और होमी मुल्‍लां दो अद्भुत कलाकार । castenets और resso resso दो अद्भुत वाद्य ।

रेडियोवाणी पर पिछली पहेली क्‍या पूछी, यूं लगा कि हमारे सुधि-पाठकों की बत्‍ती गुल हो
गई है । इस बार तो सूरत के भाई पियूष मेहता भी कन्‍फ्यूज़ से हो गए लगते हैं । दअरसल बत्‍ती तो हमारी भी गुल हो गई थी जब हमसे ये पहेली पूछी गई थी । हमारे मित्र डाक-साब की इस गुगली ने हमें धराशाई कर दिया था । क्‍योंकि इन वाद्यों को समझना थोड़ा-सा मुश्किल है । 

बहरहाल हमने आपको एक धुन सुनवाई थी और आपसे पूछा था कि इसमें मौजूद वाद्यों को पहचानिये । शर्त ये थी कि गिटार को छोड़ दीजिए बाक़ी वाद्य पहचानिये । फिर से सुनने के लिए आप ऊपर दिये लिंक पर जाकर पहेली का बाक़ायदा पूरा हिस्‍सा सुन सकते हैं । 

दरअसल इन वाद्यों की आवाज़ हमने फिल्‍मी-गानों में इतनी सुनी है और अभय की बात सही है कि फिल्‍मी-गानों के इतर ट्रेन में गाने वाले गवैये- भिखारी  या गांवों में मिलने वाले लोक गायक इसी तरह की ध्‍वनि पत्‍थरों को आपस में बजाकर निकालते हैं....इसलिए ध्‍वनि तो जानी-पहचानी लगती है पर हम इन वाद्यों को नहीं पहचानते ।

आपको बता दें कि ये ध्‍वनियां थीं -कैस्टेनेट्स (castenets) और रेसो-रेसो (Resso Resso) की । और जो अंश हमने आपको सुनवाया था वो सन 1961 में आई फिल्‍म 'छोटे-नवाब' के गाने का था । ये संगीतकार राहुल देव बर्मन यानी पंचम की पहली फिल्‍म थी । और इसका गाना 'घर आ जा' बेहद मकबूल हुआ था । थोड़ा-सा विषयांतर कर दूं--लेकिन देखिए कि इस गाने का कितना सुंदर विश्‍लेषण 'पंचम-मैजिक' पर अंकुश चिंचालकर ने किया है । इसे मैंने रेडियोवाणी के दूसरे पन्‍ने पर भी चढ़ा दिया है स्‍थाई रिफरेन्‍स के लिए । 



जिन लोगों को प्‍लेयर नहीं दिख रहा है उन्‍हें बता दें कि वो इस लिंक को क्लिक करके इसे सुन भी सकते हैं और डाउनलोड भी कर सकते हैं ।

अगर ये गाना आपको देखना है तो यहां क्लिक करें और यू-ट्यूब पर देखें ।



बहरहाल...बात हो रही थी 'छोटे नवाब' के गाने 'मतवाली आंखों वाले' की ।
जी हां इसी गाने की शुरूआत में है कैस्‍टेनेट्स और रेसो-रेसो की ये तरंगें । अब आपको ये भी बता दें कि इसे बजाया है होमी मुल्‍लां ने । मुल्‍लां 1970 से लेकर आखिर तक राहुल देव बर्मन की टोली का हिस्‍सा रहे हैं । और मुख्‍य-रूप से इन वाद्यों के अलावा डुग्‍गी, afro harp, metallic plate और डफली जैसे वाद्य बजाते रहे हैं ।
homi_2 तस्‍वीर-साभार-पंचम-मैजिक । 
अब कैसा रहे अगर आपको पंचम की संगीत-टोली का अनन्‍य-हिस्‍सा रहे होमी मुल्‍ला का वो वीडियो दिखाया जाए जिसमें होमी ख़ुद ये वाद्य बजा रहे हैं । लीजिए देखिए । यू-ट्यूब पर ग़ोता लगाकर हम इसे लाए हैं ।



पंचम के संगीत में रेसो-रेसो और कैस्‍टेनेट्स का प्रयोग अन्‍य गानों में भी हुआ है । ये रही कुछ गानों की लिंकित फेहरिस्‍त ।

1. करवटें बदलते रहे रात भर हम (फिल्‍म 'आपकी क़सम')  यहां देखिए । रेसो-रेसो 2. मेरे सामने वाली खिड़की में ( फिल्‍म 'पड़ोसन' ) यहां देखिए । कैस्‍टेनेट्स 3. जब हम जवां होंगे (बेताब) यहां देखिए । कैस्‍टेनेट्स 4. गुलाबी आंखें (दि ट्रेन) यहां देखें । अफ्रीकी रेसो रेसो 5. हवा के साथ-साथ (सीता और गीता) यहां देखिए । रेसो रेसो ।
ये फेहरस्ति और लंबी है । पर फिलहाल इसे इतना ही छोड़ा जा रहा है । क्‍योंकि हम आपको castenets और Resso resso के बारे में ज्‍यादा बताना चाहते हैं ।

विकिपीडिया के मुताबिक़ कैस्‍टेनेट्स का प्रयोग प्राचीन रोमन, इतालवी, पुर्तगाली और Castagnetten
स्‍पेनिश संगीत में किया जाता था । ये एक परकशन इन्‍स्‍ट्रमेन्‍ट यानी ताल-वाद्य है ।  इनमें दो कटोरीनुमा रचनाएं एक डोरी के ज़रिए आपस में बंधी रहती हैं और बजाने वाला इन्‍हें आपस में टकराकर आवाज़ें निकालता है । इसके एक हिस्‍से को hembra (मादा) और दूसरे को macho (नर) कहते हैं । दोनों की pitch में अंतर होता है । 

स्‍पेन के Flamenco नृत्‍य में नर्तक इन्‍हें बजाते हुए नाचते हैं । हालांकि इस नृत्‍य में कैस्‍टेनेट्स का प्रयोग बहुत आम नहीं है । भारत में राजस्‍थान के लोकगायन में इनका बहुत प्रयोग होता है । इस वीडियो में देखिए । इस वीडियो में कैस्‍टेनेट्स के साथ-साथ मोरचंग भी सुनाई देगा । जो राजस्‍थान के अलावा देश में कई इलाक़ों के लोक-संगीत में भी सुनाई देता है । पर राजस्‍थानी संगीत में इसका खूब प्रयोग होता है । इस वाद्य का प्रयोग भी आर.डी.बर्मन ने किया था । पड़ोसन फिल्म के गाने में । वीडियो में बाईं ओर से पहला वादक कैस्‍टेनेट्स बजा रहा है । दूसरा और चौथा वादक मोरचंग बजा रहा है । 'सोलो' मोरचंग का अच्‍छा-सा वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें ।




चीन की कुछ नर्तकियों को कैस्‍टेनट्स लेकर फ्लेमेन्‍को नृत्‍य करते देखने के लिए यहां क्लिक करें । रही बात रेसो-रेसो की....तो इसके बारे में ज्‍यादा जानकारियां तलाश की जा रही हैं । इंतज़ार कीजिएगा । 

हमें समय-समय पर अपनी पहेलियों से चारों ख़ाने चित्‍त कराने वाले डाक-साब फिर किसी बुझौवल में फंसाएंगे । और हम भी मज़े-मज़े में पहेली के साथ यहां हाजि़र हो जायेंगे । लेकिन पहेली का ताल्‍लुक संगीत की दुनिया के किसी अनछुए पहलू से ही होगा, ये पक्‍का है ।



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Sunday, January 3, 2010

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम' : गुलज़ार, भूपिंदर और 'चांद परोसा है'


कल यानी चार जनवरी को 'पंचम' की याद का दिन होता है । पंचम : आर.डी.बर्मन । 'पंचम' को गए सोलह बरस हो गए पर सोलह पल भी ऐसा नहीं लगा कि वो हमसे दूर हैं । दरअसल  इस दौरान रोज़ाना पंचम के गाने कैसेट्स, कंपेक्‍ट डिस्‍क, आइ पॉड्स और एफ.एम.स्‍टेशनों पर लगातार बजते रहे हैं । इन गानों की शक्‍ल में पंचम लगातार हमारे बीच मौजूद रहे हैं । पंचम ने भारतीय सिनेमा को एक नई 'ध्‍वनि' प्रदान की थी । पंचम शीतल-पेय की बोतलों, कांच की ख़ाली कटोरियों और गिलासों, रसोई के बर्तनों, लकड़ी के टुकड़ों वग़ैरह सबमें से संगीत खोज निकलाते थे । (पंचम के एक्‍स्‍पेरिमेन्‍ट्स के बारे में पढिये रेडियोवाणी के दूसरे पन्‍ने पर यहां )

पंचम एक अन्‍वेषक-संगीतकार थे । और यही वजह है कि कई बार वो इतने एक्‍सपेरीमेन्‍टल हो गए कि ज़माने ने उस वक्‍त उनकी कुछ रचनाओं को एकदम से नकार दिया । हालांकि उनके जाने के बाद अब हमें उनकी धुनों के नए चेहरे और नए आयाम समझ में आ रहे हैं ।

बाक़ी कलाकारों को छोड़ दें और सिर्फ पंचम, गुलज़ार और आशा भोसले की तिकड़ी के बारे में ही सोचें तो ये सही मायनों में भारतीय सिनेमा के लिए मणि-कांचन संयोग रहा था । ऐसी क्रियेटिव, एक्‍सपेरीमेन्‍टल और दिलेर तिकड़ी सिनेमा में दूसरी नहीं हुई । पंचम की याद आती है तो गूंजता है आशा भोसले का तरंगित-स्‍वर---'रात क्रिसमस की थी, ना तेरे बस की थी ना मेरे बस की थी'  या फिर 'भीनी भीनी भोर आई ' या इससे भी आगे गुलज़ार के शब्‍दों और पंचम के सुरों की डोर थामे आशा भोसले की नायाब उड़ान 'कोई दिया जले कहीं'  ( ये सभी गीत अलबम 'दिल पड़ोसी है' के हैं ) लेकिन इतने से भला प्‍यास कहां बुझती है । हमें तो इससे आगे चाहिए --'क़तरा क़तरा‍ मिलती है', 'मेरा कुछ सामान', 'आंकी चली बांकी चली', 'आऊंगी एक दिन आज जाऊं' 'बड़ी देर से मेघा बरसा', 'बेचारा दिल क्‍या करे', 'छोटी सी कहानी से' ....ये फेहरिस्‍त इतनी लंबी है कि दिल 'अश-अश' कर उठे । dilpadosihai
और एक दिन 'पंचम' चुपचाप चल दिए ।


यूं लगा कि 'म्‍यूजिक-रूम' की बत्‍ती 'गुल' हो गयी हो थोड़ी देर के लिए । दरअसल 'पंचम' तो शीशे के उस पार निकल गए थे । जहां से उनका अक्‍स ही नज़र आ सकता था । ना तो वो सुनाई दे सकते थे और ना ही उन्‍हें छुआ जा सकता था  । गुलज़ार ने 'पंचम' की याद में एकcph1 नज़्म लिखी थी, जिसे उन्‍होंने वैसे तो कई जगह पर पढ़ा है, पर भूपिंदर-मिताली के अलबम 'चांद परोसा है' में इसका बेहद सघन और आत्‍मीय रूप सामने आया है । पहले गुलज़ार पूरी नज़्म पढ़ते हैं उसके बाद पूरी विकलता के साथ भूपिंदर इसे गाते हैं । वही भूपिंदर जो पंचम के लिए हवाईन गिटार बजाया करते थे । बीच में आशा भोसले की आवाज़ में 'वो रात बुझा दो मेरा वो सामान लौटा दो' की ध्‍वनि सुनाई पड़ती है....मानो पहाड़ों पर कोई आवाज़ गूंज रही
हो । ये गीत जब अपने चरम पर पहुंचता है
तो भूपिंदर 'मैं अकेला हूं धुंध में पंचम' को इतनी बार गुनगुनाते हैं कि दिल बैठ जाता है । इस गाने की गायकी, डिज़ाइन और मिक्सिंग सब बेहद सांद्र है । पंचम को याद करने का और 'मिस' करने का इससे अच्‍छा तरीक़ा हो ही नहीं सकता था ।
हम पंचम के चाहने वाले बहुत विकलता के साथ मिलकर कहना चाहते हैं----'मैं अकेला हूं धुंध में पंचम'

song- yaad hai pancham
lyrics and narration : gulzar
singer : bhupinder singh

album: chand parosa hai.
duration: 6:28  




एक और प्‍लेयर : ताकि सनद रहे ।




याद है बारिशों का दिन, पंचम


याद है जब पहाड़ी के नीचे वादी में
धुंध से झांककर निकलती हुई
रेल की पटरियां गुज़रती थीं
धुंध में ऐसे लग रहे थे हम
जैसे दो पौधे पास बैठे हों
हम बहुत देर तक वहां बैठे
उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे
जिसको आना था पिछली शब, लेकिन  
उसकी आमद का वक्‍त टलता रहा
देर तक पटरियों पर बैठे हुए 
रेल का इंतज़ार करते रहे 
रेल आई ना उसका वक्‍त हुआ
और तुम, यूं ही दो क़दम चलकर
धुंध पर पांव रखके चल भी दिए

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम' ।।


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