कोलाहल भरी दुनिया में सुकून का कोना: कवि प्रदीप का स्वर
बीतें दिनों का कोई दौर ऐसा था, जब हमें कवि प्रदीप का स्वर 'बोरिंग' लगता था। वो ऊबड़-खाबड़ और नादान स्कूली दिन थे। अलमस्त दिन, पल भर में राय कायम कर लेने वाले दिन। उन दिनों जो कुछ पसंद था....या जो कुछ सुनते थे, आज उसके बारे में सोचकर हंसी आती है। बहरहाल...प्रदीप के गीत और उनके स्वर संसार से परिचय बहुत बाद में हुआ। पर उनके गाये गाने यहां-वहां खूब सुनने मिलते। जैसे भोपाल में पुल-पुख़्ता के पार छोटे-तालाब के किनारे बने देवी मंदिर के पास से गुज़रते हुए लाउड-स्पीकर ख़ूब जोर से सुनाता--'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इंसान' और तब के भोपाल में लोग उस घाट पर डुबकी लगा रहे होते।
उन दिनों में नानी के शहर तक की जाने वाली रेल-यात्राओं में जब तब डिब्बे में चढ़ आने वाले भिखारियों को प्रदीप के गीत गाने देखा। वो गाते 'तेरे द्वार खड़ा भगवान, भगत भर दे रे झोली'। परियों की कहानियों में हक़ीक़त का तड़का लगी उन रेलयात्राओं का हर साल भर इंतज़ार करते थे। और वहां जो गीत सबसे ज्यादा गूंजता, वो था--'पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द ना जाने कोई'....ये गीत एक नेत्रहीन बूढ़ा गाता--जो एकदम चीथडा कपड़े पहने लड़के के कंधे पर हाथ रखकर चलता जाता। बच्चा लाठी फर्श पर ठोंकता और उससे बंधा घुंघरू 'छम छम' करता। लोग मूंगफलियां छील रहे होते और छिलके उसी फर्श पर बिखेर रहे होते। कोई पूछता कौन-सा स्टेशन आवे वालो है--जवाब मिलता—'पथरिया'।
उन दिनों सत्यनारायण की पूजा वाले घरों में लडियां लगाकर रोशनी की जाती। और बिजली के खंभों पर भोंपू की शक्ल वाले स्पीकर टांग दिये जाते। जिन पर लिखा होता--'फलाना टेन्ट हाउस'। ये भोंपू कभी 'मैं तो आरती उतारूं रे' बजाते। तो कभी उनसे आवाज़ का दरिया बहता--'कोई लाख करे चतुराई समय का लेख मिटे ना रे भाई'। या 'दूसरों का दुखड़ा दूर करने वाले तेरे दुख दूर करेंगे राम'।
वो बाल-सभाओं वाले दिन थे। तब डिज़्नी और पोगो ने दृश्यों और संवादों की आंधी नहीं चलायी थी। इंद्रजाल कॉमिक्स और चंपक-नंदन-चंदामामा ज़रूर बाल-जीवन का अटूट हिस्सा थे। उन दिनों में बाल-सभाओं में अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार करते हुए अपने किसी सहपाठी को गाते हुए सुनते--'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल'....और बस... परफॉर्म करने की घबराहट में हॉल में बिछी दरी के रेशे निकालकर उन्हें मरोड़ते रहते। तभी किसी दूसरे साथी का नाम पुकारा जाता, और वो गाता--'आओ बच्चो तुम्हें दिखायें झांकी हिंदुस्तान की वंदे-मातरम्'। तब पता नहीं था कि आसपास बिखरे ये गीत दरअसल या तो प्रदीप ने लिखे हैं या ये उनके गाये गीत हैं।
पर धीरे-धीरे वो अच्छे लगने लगे। मन में उनके लिए जगह बनती रही।
आज प्रदीप का जन्मदिन है। किसी ने याद दिलाया--तो बरबस ही उनके ये गाने ज़ेहन में ताज़ा हो गये। दरअसल कभी-कभी अचानक ही किसी कलाकार की भूली-बिसरी याद का मौसम आ जाता है। अभी पिछले ही हफ्ते तो 'छायागीत' के लिए गानों को चुनते वक्त एक गाना सामने आ खड़ा हुआ था--और हमें ज़रा-सा अचरज हुआ कि ये गाना भी प्रदीप का है। वो गाना था फिल्म 'तलाक़' का...'मेरे जीवन में किरण बनके बिखरने वाले, बोलो तुम कौन हो'। आशा भोसले और मन्ना डे ने इसे गाया है और प्रदीप के बोलों को स्वरबद्ध किया है सी. रामचंद्र ने। रूमानी गीतों के उस प्रोग्राम 'छायागीत' में हमारे चुने दो गीत प्रदीप के थे। दूसरा गीत था फिल्म 'जिंदगी और ख्वाब' का गीत--'ना जाने कहां तुम थे, ना जाने कहां हम थे'। दार्शनिक या देशभक्ति गीत लिखने का ठप्पा लगा हुआ है प्रदीप पर। जा़हिर है कि रूमानी गाने लिखने के मौक़े कम आये। पर उन्होंने ऐसे गाने भी अदभुत रचे हैं।
उन्हें 'ऐ मेरे वतन के लोगों' के लिए याद किया जाता है। इसकी जोड़ का दूसरा गीत नहीं रचा गया है। बॉम्बे टॉकीज़ की फिल्म 'किस्मत' में उनके लिखे गाने 'दूर हटो ऐ दुनिया वालो' ने अंग्रेज़ सरकार को परेशान कर दिया था। बैन लगा। हटा। लेकिन इस गाने ने भी एक जन-गीत का दर्जा पा लिया। जब उन्हें 'दादा साहेब फालके' दिये जाने की घोषण हुई--तो हर्ष की लहर दौड़ गयी थी। तब हम विविध भारती आ चुके थे। पर प्रदीप से मिलने का कभी मौक़ा नहीं आया। इसका सदा अफसोस रहेगा।
कवि प्रदीप ज्यादातर अपने लिखे गानों की धुन स्वयं बनाते थे। और ज्यादातर संगीतकार उन्हें अपना लेते थे। आज के शोर भरे समय में शायद इसलिए अच्छे लगते हैं--क्योंकि उनमें एक सादगी है। एक ईमानदारी है। उनका स्वर एक वीतराग साधु का स्वर लगता है। शायद प्रदीप हमें कोलाहल भरी दुनिया में सुकून का एक छोटा-सा कोना देते हैं।
song: dekh tere sansaar ki haalat.
singer: pradeep
lyrics: pradeep
music: c. ramchandra
film: nastik (1958)
duration: 3 21
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उन दिनों में नानी के शहर तक की जाने वाली रेल-यात्राओं में जब तब डिब्बे में चढ़ आने वाले भिखारियों को प्रदीप के गीत गाने देखा। वो गाते 'तेरे द्वार खड़ा भगवान, भगत भर दे रे झोली'। परियों की कहानियों में हक़ीक़त का तड़का लगी उन रेलयात्राओं का हर साल भर इंतज़ार करते थे। और वहां जो गीत सबसे ज्यादा गूंजता, वो था--'पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द ना जाने कोई'....ये गीत एक नेत्रहीन बूढ़ा गाता--जो एकदम चीथडा कपड़े पहने लड़के के कंधे पर हाथ रखकर चलता जाता। बच्चा लाठी फर्श पर ठोंकता और उससे बंधा घुंघरू 'छम छम' करता। लोग मूंगफलियां छील रहे होते और छिलके उसी फर्श पर बिखेर रहे होते। कोई पूछता कौन-सा स्टेशन आवे वालो है--जवाब मिलता—'पथरिया'।
उन दिनों सत्यनारायण की पूजा वाले घरों में लडियां लगाकर रोशनी की जाती। और बिजली के खंभों पर भोंपू की शक्ल वाले स्पीकर टांग दिये जाते। जिन पर लिखा होता--'फलाना टेन्ट हाउस'। ये भोंपू कभी 'मैं तो आरती उतारूं रे' बजाते। तो कभी उनसे आवाज़ का दरिया बहता--'कोई लाख करे चतुराई समय का लेख मिटे ना रे भाई'। या 'दूसरों का दुखड़ा दूर करने वाले तेरे दुख दूर करेंगे राम'।
वो बाल-सभाओं वाले दिन थे। तब डिज़्नी और पोगो ने दृश्यों और संवादों की आंधी नहीं चलायी थी। इंद्रजाल कॉमिक्स और चंपक-नंदन-चंदामामा ज़रूर बाल-जीवन का अटूट हिस्सा थे। उन दिनों में बाल-सभाओं में अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार करते हुए अपने किसी सहपाठी को गाते हुए सुनते--'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल'....और बस... परफॉर्म करने की घबराहट में हॉल में बिछी दरी के रेशे निकालकर उन्हें मरोड़ते रहते। तभी किसी दूसरे साथी का नाम पुकारा जाता, और वो गाता--'आओ बच्चो तुम्हें दिखायें झांकी हिंदुस्तान की वंदे-मातरम्'। तब पता नहीं था कि आसपास बिखरे ये गीत दरअसल या तो प्रदीप ने लिखे हैं या ये उनके गाये गीत हैं।
पर धीरे-धीरे वो अच्छे लगने लगे। मन में उनके लिए जगह बनती रही।
आज प्रदीप का जन्मदिन है। किसी ने याद दिलाया--तो बरबस ही उनके ये गाने ज़ेहन में ताज़ा हो गये। दरअसल कभी-कभी अचानक ही किसी कलाकार की भूली-बिसरी याद का मौसम आ जाता है। अभी पिछले ही हफ्ते तो 'छायागीत' के लिए गानों को चुनते वक्त एक गाना सामने आ खड़ा हुआ था--और हमें ज़रा-सा अचरज हुआ कि ये गाना भी प्रदीप का है। वो गाना था फिल्म 'तलाक़' का...'मेरे जीवन में किरण बनके बिखरने वाले, बोलो तुम कौन हो'। आशा भोसले और मन्ना डे ने इसे गाया है और प्रदीप के बोलों को स्वरबद्ध किया है सी. रामचंद्र ने। रूमानी गीतों के उस प्रोग्राम 'छायागीत' में हमारे चुने दो गीत प्रदीप के थे। दूसरा गीत था फिल्म 'जिंदगी और ख्वाब' का गीत--'ना जाने कहां तुम थे, ना जाने कहां हम थे'। दार्शनिक या देशभक्ति गीत लिखने का ठप्पा लगा हुआ है प्रदीप पर। जा़हिर है कि रूमानी गाने लिखने के मौक़े कम आये। पर उन्होंने ऐसे गाने भी अदभुत रचे हैं।
उन्हें 'ऐ मेरे वतन के लोगों' के लिए याद किया जाता है। इसकी जोड़ का दूसरा गीत नहीं रचा गया है। बॉम्बे टॉकीज़ की फिल्म 'किस्मत' में उनके लिखे गाने 'दूर हटो ऐ दुनिया वालो' ने अंग्रेज़ सरकार को परेशान कर दिया था। बैन लगा। हटा। लेकिन इस गाने ने भी एक जन-गीत का दर्जा पा लिया। जब उन्हें 'दादा साहेब फालके' दिये जाने की घोषण हुई--तो हर्ष की लहर दौड़ गयी थी। तब हम विविध भारती आ चुके थे। पर प्रदीप से मिलने का कभी मौक़ा नहीं आया। इसका सदा अफसोस रहेगा।
कवि प्रदीप ज्यादातर अपने लिखे गानों की धुन स्वयं बनाते थे। और ज्यादातर संगीतकार उन्हें अपना लेते थे। आज के शोर भरे समय में शायद इसलिए अच्छे लगते हैं--क्योंकि उनमें एक सादगी है। एक ईमानदारी है। उनका स्वर एक वीतराग साधु का स्वर लगता है। शायद प्रदीप हमें कोलाहल भरी दुनिया में सुकून का एक छोटा-सा कोना देते हैं।
song: dekh tere sansaar ki haalat.
singer: pradeep
lyrics: pradeep
music: c. ramchandra
film: nastik (1958)
duration: 3 21
