संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, February 17, 2008

फिर फिर मख़दूम--फिर छिड़ी रात बात फूलों की । फिल्‍म बाज़ार

रेडियोवाणी पर हम इन दिनों आपको सुनवा रहे हैं वो नग़्मे जो मख़दूम मोहिउद्दीन के रचे हुए हैं । मख़दूम का जन्‍म सन 1908 में हुआ था और उनकी मृत्‍यु सन 1969 में हुई थी । उनकी हयात में ही कुछ ऐसी फिल्‍में आ गयी थीं जिनमें उनके अशआर शामिल किए गए थे । इसलिए हम ये मान लेते हैं कि उनकी सहमति और स्‍वीकृति के बाद ही फि़ल्‍मों में उनके गाने शामिल किए गये होंगे । पर जहां तक हमारी जानकारी है मख़दूम ने ख़ुद कभी फिल्‍मों में गीत रचने की नहीं सोची थी ।

आज हम आपको मख़दूम का लिखा एक और नायाब गीत सुनवा रहे हैं । मुझे लगता है मख़दूम की रचनाओं से मेरा पहला परिचय इसी के ज़रिए हुआ था । ये गीत सन 1982 में रिलीज़ हुई फिल्‍म 'बाज़ार' का है । जिसके निर्देशक थे सागर सरहदी । समर्थ कलाकारों की पूरी फ़ौज थी इस फिल्‍म में । नसीरूद्दीन शाह, फ़ारूख शेख़, स्मिता पाटील, सुप्रिया पाठक । संगीत ख़ैयाम का था । इस फिल्‍म का संगीत बेहद मकबूल हुआ था । मुझे याद है कि वो बाज़ार से कैसेट भरवाने वाले दिन थे जब मैंने इस फिल्‍म का कैसेट तैयार करवाया था । हर गाने के पहले इस कैसेट में संवाद थे । और वो भी ऐसे भावुक और असरदार संवाद कि पूछिए मत । अभी भी फ़ारूख़ शेख़ की आवाज़ कानों में गूंजा करती है--चूडियां ले लो चूडि़यां । रंग बिरंगी चूडि़यां । या फिर नसीर का वो संवाद--कभी रास्‍ते में मिल गयीं तो पहचान लोगी मुझे । तो स्मिता जवाब देती हैं--सलाम ज़रूर करूंगी......और शुरू होता है गाना--'करोगे याद तो हर बात याद आएगी' । उफ़ क्‍या दौर था वो । स्‍कूल कॉलेज का ज़माना और इत्‍ते रूमानी गीतों का साथ । बहरहाल मख़दूम पर केंद्रित इस श्रृंखला में आज हम इसी फिल्‍म का 'फूलों वाला गीत' सुनेंगे ।

मुझे नहीं लगता कि फूलों पर कहीं और इतना ख़ूबसूरत कुछ लिखा गया है । शानदार बेमिसाल और अद्भुत है ये ग़ज़ल । और उतना ही प्‍यारा संगीत । ख़ैयाम ने इस गाने का इंट्रो इतना भव्‍य तैयार किया है कि आज सुबह सुबह जब मैंने इस गाने को शुरू किया तो लगा वाह क्‍या दिन है ये ।

.... ये महकती हुई ग़ज़ल मख़दूम......जैसे सहरा में रात फूलों की ।।

फिर चाशनी में भीगी दोनों आवाज़ें---तलत अज़ीज़ और लता मंगेशकर । वायलिन पर कुछ अरबी धुन की स्‍वरल‍हरियां । ग़ज़लों को स्‍वरबद्ध करने में ख़ैयाम का कोई सानी नहीं है । सितार कितना ख़ूबसूरत है इस गाने में ज़रा ध्‍यान दीजिएगा । ख़ैयाम एक ख़ास तरह का रिदम रखते हैं अपने नाज़ुक गानों में । यही रिदम आपको रजिया सुल्‍तान के गानों में भी दिखेगा और उमराव जान के गानों में भी । लेकिन हर संगीतकार का एक मुहावरा होता है । ये रिदम और अरेबियन फ्लेवर ख़ैयाम का मुहावरा हैं । आईये सुनें---

 

ये रहे इस गीत के बोल--

फिर छिड़ी रात बात फूलों की

रात है या बारात फूलों की  ।।

फूल के हार फूल के गजरे

शाम फूलों की रात फूलों की ।।

आपका साथ,  साथ फूलों का

आपकी बात, बात फूलों की ।।

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में

रोज़ निकलेगी बात फूलों की ।।

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं

मिल रही है हयात* फूलों की ।।    हयात-जिंदगी

ये महकती हुई ग़ज़ल मख़दूम

जैसे सहरा में रात फूलों की ।।

गाना थोड़ा लंबा है  । तसल्‍ली से सुनियेगा और फिर मख़दूम की रूमानियत को सलाम ज़रूर कीजिएगा । अगर वीडियो देखने का मन है तो ये रहा--

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