संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, September 13, 2009

आईये सुनें 'चल उड़ जा रे पंछी'- रफ़ी नहीं तलत की आवाज़ में

गानों की खोजबीन का सिलसिला ऐसा है कि ये अकसर आपको हैरत में डाल देता है । आज हम आपको जो गाना सुनवाने जा रहे हैं वो तकरीबन तीन-चार महीने पहले ही 'इंटरनेटी-यायावरी' में हमारे सामने अचानक आ गया था और हम 'ठिठक' गए थे । हुआ यूं कि एक दिन रेडियो पर हम फ़रमाईशों का 'फोन-इन' कार्यक्रम 'हैलो फ़रमाईश' कर रहे थे तो एक सुधि-श्रोता ने अजीब-सी फ़रमाईश की, जो 'बाउंसर' जैसी लगी । बोले--'चल उड़ जा रे पंछी' सुनवा दीजिए । लेकिन हमें ये गाना रफ़ी साहब की आवाज़ में नहीं बल्कि तलत महमूद की आवाज़ में सुनना है ।

उन्‍हें लगा था कि या तो वो गाना विविध-भारती के पास होगा, या फिर हम बग़लें झांकने लगेंगे, क्‍योंकि फिल्‍म के रिकॉर्ड पर ये गीत है नहीं और बहुत ही चुनिंदा लोगों को इस संस्‍करण के बारे में पता है । जब मैंने उनसे कहा कि भाईसाहब ये गाना फिल्‍म के रिकॉर्ड पर नहीं है...तो वो अड़ गये कि हमने तो बहुत बार सुना है । आपने ठीक से देखा नहीं होगा, ज़रा फिर से 'चेक' कीजिए । तब मजबूर होकर हमें उन्‍हें इस गीत की कहानी सुनानी पड़ी । जो आप भी सुन लीजिए ।  ये कहानी मुझे फिल्‍म-संसार के एक मशहूर संगीत-निर्देशक ने बताई थी । 


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