सैंया बिना घर सूना सूना- बप्पी लहरी का एक अनमोल गीत ।
बप्पी लहरी ( लाहिड़ी ) को आमतौर पर अस्सी के दशक के फूहड़ गानों के लिए ही याद किया जाता है और ये दुख की बात है । बहुत समय पहले रवि भाई ने लिखा था कि उन्हें अस्सी के दशक के झमाझम गाने पसंद आते हैं और उनके घर वाले इस बात पर उनका मज़ाक़ उड़ाते हैं । पिछले दिनों अपने छोटे भाई के साथ मैं भी बचपन के दिनों को याद कर रहा था और हमने हंस हंस कर तोहफा और मवाली जैसी फिल्मों के गानों को याद किया ।
सचमुच बेहद हल्के और फूहड़ गानों का युग था वो । लेकिन तब वो भी अच्छे लगते थे और आज उनमें एक नॉस्टेलजिक एलीमेन्ट नज़र आता है । तभी तो कहीं से अगर 'तोहफ़ा तोहफ़ा' की तरंग सुनाई देती है तो हम फौरन अस्सी के दशक में पहुंच जाते हैं । बहरहाल ....आज मैं ये बात ज़ोर देकर कहना चाहता हूं कि बप्पी लहरी को केवल 'अस्सी के दशक के फूहड़ गीतों तक' रिड्यूस करना ठीक नहीं है । मैं बप्पी दा को बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार मानता हूं और इसके तर्क भी हैं मेरे पास ।
इच्छा तो ये है कि रेडियोवाणी पर 'अस्सी के दशक के फूहड़' गीतों की एक नॉस्टेलजिक सीरीज़ भी चलाई जाये और बप्पी दा के उत्कृष्ट गीत भी । ज़ाहिर है कि फिलहाल उत्कृष्टता पर ही हमारे रिकॉर्ड की सुई टिकी रहे तो अच्छा । पर अगर रेडियोवाणी पर आपको 'ता थैया ता थैया हो' सुनाई दे जाये, फिल्म 'हिम्मतवाला' से....तो बजाय मुंह बिचकाने के, अपने भीतर झांककर सोचिएगा कि उस ज़माने में आप इन गानों को कितना सुनते थे रेडियो पर ।
सन 1979 में एक फिल्म आई थी-'आंगन की कली' । मैंने ये फिल्म नहीं देखी और ना ही देखने की कोई तमन्ना है । पर इस फिल्म का ये गाना....सही मायनों में अदभुत है । अगर हम 'हिम्मतवाला' , 'तोहफा' और 'जस्टिस
चौधरी' के गानों से भप्पी दा को आंकें तो ये कहीं से भी उनका गाना नहीं लगता । ग्रुप वायलिन की विकल तरंग के बीच लता जी का गुनगुनाना ......'सैंया बिना घर सूना-सूना' और फिर धीरे से नाज़ुक से रिदम का शुरू होना' । और फिर मुखड़े के बाद बांसुरी....वो भी हल्की सी प्रतिध्वनि के साथ । दिलचस्प बात ये है कि इस गाने में भूपिंदर एकदम आखिरी छोर पर आते हैं तकरीबन तीन मिनिट तिरेपन सेकेन्ड पर....और कहते हैं.....'आंसू यूं ना बहाओ, ये मोती ना लुटाओ' । ये गाना किसी ठेठ सामाजिक फिल्म का फलसफाई गाना भले हो...पर कहीं ना कहीं हमारे अंतस को छूता है । भप्पी दा को सलाम करते हुए ये अर्ज़ करूंगा कि उन्होंने सिर्फ सोने के गहने ही नहीं पहने और ना ही सिर्फ पश्चिम के गीतों की नकल करके डिस्को लहर चलाई । शास्त्रीयता से पगे ऐसे गीत भी बनाए हैं बप्पी दा ने कि अचरज होता है ।
आज महानायकों और सफल व्यक्तित्वों के तिलस्म को टूटते हुए देख रहे हैं हम । शायद ये सिलसिला अस्सी में ही शुरू हो गया था जब 'चलते चलते' जैसे गाने बनाने वाले बप्पी दा ने डिस्को की राह पकड़ी थी । बीच बीच में उन्होंने कैसे खुद को साबित किया....ये जानने के लिए और बहसियाने के लिए रेडियोवाणी पर आते रहिएगा । फिलहाल तो--सैंयां बिना घर सूना सूना ।
शैलेंद्र के सुपुत्र शैली शैलेंद्र की रचना है ये । शैली मार्च 2007 में एक गुमनाम मृत्यु को प्राप्त हुए हैं ।
लता: सैंयाँ बिना घर सूना, सूना
सैंयाँ बिना घर सूना
राही बिना जैसे सूनी गलियाँ
बिन खुशबू जैसे सूनी कलियाँ
सैंयाँ बिना घर सूना
सूना दिन काली रतियां
असुवन से भीगी पतियां
हर आहट पे डरी डरी
राह तके मेरी अँखियाँ
चाँद बिना जैसे सूनी रतिया
फूल बिना जैसे सूनी बगिया
सैंयाँ बिना घर सूना ...
अंधियारे बादल छाये
कुछ भी ना मन को भाये
देख अकेली घेरे मुझे
यादों के साये साये
चाँद बिना जैसे सूनी रतिया
फूल बिना जैसे सूनी बगिया सैंयाँ
बिना घर सूना ...
भूपिन्दर: आँसू यूँ ना बहाओ
ये मोती न लुटाओ
रुकती नहीं हैं वक़्त की धारा
पल पल बदले जग ये सारा
जैसे ढलेगी रात अँधेरी
मुस्कायेगा सूरज प्यारा
सुख के लिए पड़े दुःख भी सहना
अब ना कभी फिर तुम ये कहना.
चाँद बिना जैसे सूनी रतिया
फूल बिना जैसे सूनी बगिया
सैंयाँ बिना घर सूना !
