संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, January 17, 2010

'लो अपना जहां दुनिया वालो' आसासिंह मस्‍ताना की विकल याद

पिछली पोस्‍ट में दूरदर्शन के सुहाने दिनों से निकालकर 'सरब सांझी गुरबानी' का सबद 'कोई बोले राम राम' क्‍या सुनाया यादों का पिटारा ही खुल गया है । हल्‍की-सी याद बाक़ी है दूरदर्शन के दिल्‍ली केंद्र से आसासिंह मस्‍ताना को सुनने-देखने की । आसासिंह मस्‍ताना पंजाबी-संगीत का दिव्‍य-स्‍वर रहे हैं । सबसे दिलचस्‍प बात ये है कि उन्‍हें सुनकर ही ये अहसास फिर ताज़ा होता है कि पंजाबी संगीत का मतलब ऊंचे-सुर में गाना और हमेशा उल्‍लासपूर्ण गाना ही नहीं है । उसमें प्‍यार की नरमी भी है और जिंदगी की उदासी भी--दर्द भी ।

आज पंजाबी-संगीत की जो 'गति' है उसे क्‍या कहा जाएगा ये आप स्‍वयं तय कर सकते हैं । पर ये वही पंजाबी संगीत है जिसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है । कई महान गायकों की फेहरिस्‍त है, जिनकी शीरीं-पंजाबी सुनकर 'बल्‍ले-बल्‍ले' हो जाती है ।

आईये 'मकर-संक्रांति' के बाद के इन दिनों में आसासिंह मस्‍ताना को विकल-मन से याद
करें । आसासिंह मस्‍ताना और सुरिंदर कौर के पंजाबी लोक-गीतों से तो हम सभी वाकिफ़
हैं । पर उन्‍होंने फिल्‍मों में भी गाया ।  

रोशन के संगीत-निर्देशन में उन्‍होंने फिल्‍म 'दूज का चांद' में गाया था । भारत-भूषण, सरोजा 1964-a-Dooj Ka Chand देवी, अशोक कुमार और आग़ा वग़ैरह इस फिल्‍म के सितारे थे । ये वही फिल्‍म है जिसमें मन्‍नाडे ने 'फूलगेंदवा ना मारो' जैसा शानदार गाना गाया है, जिसमें आग़ा झाडियों के सामने बैठे हैं और पीछे ग्रामोफोन बज रहा है । हीरोइन समझ रही है कि आग़ा उसके लिए गा रहे
हैं । जब सांप आता है तब आग़ा की पोल खुलती
है ।  'दूज का चांद' अपने शानदार गानों के लिए भी याद की जाती है । गीतकार साहिर संगीतकार रोशन । इस फिल्‍म का ये पोस्‍टर प्रफुल्‍ल के पिकासा-वेब पर मौजूद इस ख़ज़ाने से साभार है । 


'दूज का चांद' के इस गाने में आसासिंह मस्‍ताना की आवाज़ का 'सोग़' ख़ूब उभरकर सामने आता है । गाना ही ऐसा है कि आपको भीतर तक भिगो दे ।

song: Lo apna jahaan duniya walo
film: Dooj ka chand
singer: Asa singh Mastana
lyrics:  Sahir
music: Roshan
Duration: 3 24









ये हैं इस गाने के बोल--


लो अपना जहां दुनिया वालो
हम इस दुनिया को छोड़ चले
जो रिश्‍ते-नाते जोड़े थे
वो रिश्‍ते-नाते तोड़ चले
कुछ सुख के सपने देख चले
कुछ दुख के सदमे झेल चले
तक़दीर की अंधी गर्दिश ने
जो खेल खिलाए खेल चले
ये राह अकेले कटती है
यहां साथ ना कोई यार चले
उस पर ना जाने क्‍या पाएं
इस पार तो सब कुछ हार चले 


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Monday, January 11, 2010

कोई बोले राम राम कोई ख़ुदाय- दूरदर्शन के सुहाने दिनों का वो शबद

ब्‍लैक एंड व्‍हाईट वाले दूरदर्शनी दौर की यादें ताज़ा हैं ज़ेहन में अब तक । इतने दिन गुज़र गए लेकिन टी.वी. देखने का वो रोमांच दोबारा नसीब नहीं हो सका । बाद में तो टी.वी. बहुत ही प्रेडिक्‍टेबिल हो गया । इसलिए वो मज़ा जाता रहा ।

उफ़ वो दिन……जब फिल्‍म 'काला-आदमी' में पुलिस से भागते सुनील दत्‍त बच्‍चे से अचानक बड़े हो जाते हैं । जब 'विक्‍टोरिया नंबर 203' में विक्‍टोरिया और हीरों का रहस्‍य गहराता चला जाता है । जब 'दीवार' में इंटरवल के वक्‍त एक भाई एक दिशा में और दूसरा दूसरी दिशा में जाता है और स्‍क्रीन पर बीच में एक लकीर आ जाती है । जब सत्‍यजीत रे और दे सीका की फिल्‍में देर रात आती हैं दूरदर्शन पर । जब रांगोली और चित्रहार जीवन का हिस्‍सा हैं । जब पढ़ाई और संडे की फिल्‍म के बीच संतुलन बनाना बेहद ज़रूरी लगता है ।

उन्‍हीं दिनों रविवार को सबेरे एक कार्यक्रम आता था—गुरबानी । हो सकता है कि उसका नाम 'सरब-सांझी-गुरबानी' रहा हो । ठीक से याद नहीं । लेकिन उसकी शुरूआत होती थी एक शबद से--'कोई बोले राम राम कोई खुदाय' । ये तो याद नहीं कि किसकी आवाज़ हुआ करती थी । पर इंटरनेटी-यायावरी में जो संस्‍करण मिले उनमें यही अच्‍छा लगा । जिसे यहां सुनवाया जा रहा है । ये 'शबद' दूरदर्शन के उन यादगार दिनों के नाम !

sabad: koi bole ram ram
duration: 5-42
artist:bhai jaswinder singh and party





कोई बोले राम राम कोई खुदाय,
कोई सेवे गुसैयां कोई अल्लाह
कारण करण करीम कृपा धार रहीम ।
कोई नावे तीर्थ कोई हज जाई
कोई करे पूजा कोई सिर नवाय ।
कोई पढ़े बेद कोई कथेब
कोई औढ़े नील कोई सफेद ।
कोई कहाये तुर्क कोई कहे हिन्दू
कोई बशाई भीसथ कोई सुरगी धू ।
कहू नानक जिन हुकम पसाथा
प्रभ साहिब का तिन भेद जाथा
।

भाई विक्षुब्‍ध सागर की टिप्‍पणी में पता चला कि ये सबद 'सरब सांझी गुरबानी' में भाई जसविंदर सिंह और साथियों ने गाया था । इसकी यूट्यूब विन्‍डो भी यहां लगाई जा रही है ।



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