संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
Showing posts with label श्रद्धांजली. Show all posts
Showing posts with label श्रद्धांजली. Show all posts

Tuesday, August 21, 2007

शहनाई के शहंशाह बिस्मिल्ला ह खां के बिना एक साल


आज उस्‍ताद बिस्‍मिल्‍लाह ख़ान की बरसी है । पहली बरसी ।
शहनाई की स्‍वरलहरी पर अगर कोई चेहरा याद आता है तो वो बिस्‍मिल्‍लाह ख़ां का ही रहा है । मैंने जब से होश संभाला उन्‍हें बस उसी बनारसी अदा में देखा । सिर पर टोपी, पान से लाल हुए होंठ, चेहरे पर मुस्‍कान और बातों में वही बनारसी ठसक और पिनक । कब क्‍या और कितना तुर्श बोल दें कुछ नहीं पता ।



करीब दो साल पहले डॉ. शोमा घोष के बुलावे पर वो मुंबई के नेहरू सेन्‍टर में आए थे। वे शोमा घोष के गुरू पिता थे । बिस्‍मिल्‍लाह खां ने शोमा घोष के साथ अलबम भी तैयार किया और मंच पर प्रस्तुतियां भी कीं ।


बिस्मिल्‍लाह खां की शहनाई लाल किले की प्राचीर से हमेशा सुनाई देती रही । चाहे पंद्रह अगस्‍त हो या छब्‍बीस जनवरी । अब ये चिरंतन सत्‍य बन गया है कि कुछ शुभ हो, सुंदर हो तो शहनाई बजेगी और अगर शहनाई बजेगी तो वो बिस्मिल्‍लाह ख़ां की ही होगी । ठेठ बनारसी रंग में रंगे बिस्मिल्‍लाह ख़ा साहब ने सारी दुनिया को दिखा दिया कि धार्मिक-कट्टरता के बाहर निकलकर कुछ मुस्लिम कलाकारों ने किस तरह संगीत को अपना धर्म बनाया । काशी के घाटों पर बड़ी तन्‍मयता से शहनाई बजाने वाले बिस्मिल्‍लाह ख़ां पंजवक्‍ता नमाज़ी रहे । लेकिन धर्म को लेकर उनके मन में कोई रूकावट या हिचक नहीं थी । जब वो मूड में होते तो महादेव के भजन गुनगुनाते और ऐसी आवाज़ कि सुनकर लगे जन्‍म सफल हो गया है ।


मुंबई में पत्रकारों ने जब उनसे असुविधाजनक सवाल पूछे तो उन्‍होंने वो ख़बर ली थी कि पूछिये मत । उन्‍होंने वो मिसालें दीं और वो प्रसंग छेड़े के सिर्फ छेड़ने के लिए सवाल पूछने वाले एकदम सहम गये थे । बिस्मिल्‍लाह ख़ां ने शहनाई को शादी की महफिलों से निकालकर शास्‍त्रीय-संगीत की महफिल में सजा दिया । उन्‍होंने जीवन भर संगीत को ही जिया । तमाम तरह के विवादों और झंझटों के बावजूद बिस्मिल्‍लाह ख़ां शहनाई के शहंशाह हैं । और इस संक्षिप्‍त पोस्‍ट के ज़रिए रेडियोवाणी और संगीत के तमाम कद्रदान उन्‍हें श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं ।

आईये सुनें बिस्मिल्‍लाह ख़ां साहब का शहनाई वादन—
ये है उनकी बजाई कजरी--

Get this widget Share Track details

ये है एक पहाड़ी धुन--



Get this widget Share Track details


बिस्मिल्‍लाह ख़ां साहब ने शहनाई पर भांगड़ा तक बजाया है सुनिए—

Get this widget Share Track details


यहां सुनिए शादी की शहनाई—



उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खां और उ.अमीर खां साहब फिल्म गूंज उठी शहनाई ।



रागमाला फिल्‍म गूंज उठी शहनाई--






Technorati tags:
,
,
,
,

READ MORE...

Thursday, July 19, 2007

वक्‍त ने किया क्‍या हसीं सितम-आईये गीता दत्‍त की पुण्‍यतिथि पर उन्‍हें शिद्दत से याद करें



आज गीता रॉय की पुण्‍यतिथि है । आज ही दिन सन 1972 में उन्‍होंने इस संसार को अलविदा कह दिया था ।

गीता रॉय एक सोंधी, मिट्टी से सनी ख़ालिस आवाज़ । मुझे तो गीता रॉय एकाकी लोगों का स्‍वर लगती हैं । उनकी आवाज़ के दो शिद्दत भरे छोर हैं, एक तरफ उमंग और उत्‍साह की लहरें छलक-छलक आती हैं । दूसरी तरफ उनकी आवाज़ में इतना गहरा दुख झलकता है कि मन डूब-डूब जाता है । गीता रॉय की जिंदगी में भी ये दोनों छोर पूरे उफान के साथ आये थे । और जिन हालात में वो दुनिया से गयीं, वो बहुत बुरे, बहुत अभिशप्‍त थे, वो जानबूझकर दुनिया से गईं, शायद उन्‍हें मंज़ूर नहीं था कि इन हालात में वो संसार में बनी रहें ।



फरीदपुर पूर्वी बंगाल में पैदा हुई गीता रॉय का परिवार जल्‍दी ही मुंबई आ गया, गीता रॉय बहुत छोटी उम्र से गाने लगी थीं । दादर में अपने घर में वो कुछ गा रही थीं तभी संगीतकार हनुमान प्रसाद ने उनकी आवाज़ सुनी और सन 1946 में फिल्‍म भक्‍त प्रहलाद में दो पंक्तियां गाने का मौक़ा दिया । पर सन 1947 में उन्‍होंने जिन गानों से तहलका मचा दिया वो थी ‘दो भाई’ । जहां तक मुझे याद आता है इस फिल्‍म के संगीतकार एस.डी.बर्मन थे । ये है वो गाना जिसको सुनकर आपको शायद यक़ीन भी ना हो कि फिल्‍म-संसार में ये उनका पहला गीत था ।

Get this widget | Share | Track details
सन 1949 में तीन नामी फिल्‍में रिलीज़ हुई थीं—बरसात, अंदाज़ और महल । इन तीनों में नायिकाओं को एक नई गायिका ने आवाज़ दी थी, इस नई गायिका का नाम था लता मंगेशकर । यहां से शुरू होकर लता जी की सफलता इतनी बड़ी हो गयी कि हम सब जानते हैं । पचास के दशक में लता जी की कामयाबी की आंधी में दो ही गायिकाएं टिक सकी थीं—गीता रॉय और शमशाद बेगम । बहरहाल 1951 में गीता रॉय ने पहली बार खुशी की तरंग वाले रंगारंग गाने गाये, सचिन देव बर्मन के निर्देशन में । उनमें से एक है ये—
Get this widget | Share | Track details


बहरहाल गीता रॉय का करियर बेहद तूफानी रहा । कमाल के गीत उन्‍होंने गाये हैं । लेकिन मैं यहां उनके कुछ ऐसे गीतों का जिक्र करना चाहता हूं जिन्‍हें पेशेवर कामयाबी भले उतनी ना मिली हो, पर मेरी नज़र में ये गीता रॉय के प्रतिनिधि गीत हैं । और जब मैं ये बात कहता हूं तो मुझे याद आता है फिल्‍म ‘अनुभव’ का गीत । पता नहीं क्‍यूं ये भी मेरे मन को बहुत बहुत भाता है । शायद अपनी विकलता के लिए, उफ़ क्‍या बोल लिखे हैं गुलज़ार ने । पढिये और सुनिए ।
Get this widget | Share | Track details
इससे पहले मैं ये कहना चाहता हूं कि इस गाने में गीता राय ने जो लहराहट लाई है, वो कमाल की है । आखिरी पंक्ति में जिस तरह गीता राय हल्‍की सी हंसी शामिल की है, वो भी अद्भुत है । फिर गुलज़ार जाने कैसे कैसे गीत लिख लाते हैं, भला हो कनु राय का जो इस गद्य नुमा गीत को उन्‍होंने इतने प्‍यार से धुन में पिरोया---

मेरी जां, मुझे जां ना कहो, मेरी जां
जां ना कहो अनजान मुझे, जान कहां रहती है सदा
अनजाने क्‍या जानें, जान के जाए कौन भला
मेरी जां, मुझे जां ना कहो, मेरी जां ।।

सूखे सावन बरस गये कितनी बार इन आंखों से
दो बूंदें ना बरसें इन भीगी पलकों से
मेरी जां, मुझे जां न कहो, मेरी जां ।।

होंठ झुके जब होठों पर, सांस उलझी हो सांसों में
दो जुड़वां होठों की बात कहो आंखों से
मेरी जां, मुझे जां ना कहो मेरी जां ।।

इसी फिल्‍म का एक और गाना मुझे याद आता है । कपिल कुमार के बोल । कनु राय की तर्ज़ । इस गाने को पढियेगा भी ज़रूर, लेखनी में भी ज़रा अलग ही तरह का गीत है ये ।
Get this widget | Share | Track details




कोई चुपके से आके, सपने सजा के, मुझको जगाके बोले मैं आ रहा हूं
कौन आये ये मैं कैसे जानूं ।

दूर कहीं बोले पपीहा, पिया आ, मौसम सुहाना,
तरसे है कोई यहां, आ भी जा, करके बहाना,
कौन सा बहाना, कैसा बहाना, कितना मुश्किल है ये बताना
देखो फिर भी कोई भा रहा है
कौन भाए ये मैं केसे जानूं ।। कोई चुपके से आके ।।

प्‍यासा है दिल का गगन, प्‍यार की अग्नि जलाए,
पलकों में क़ैद है सावन, होठों तक बात ना आए,
बात आते आते रात हो गई, छांव की बारात छोड़ गयी साथ
बात आते आते हो गयी रात, इतनी रात गये कैसे गाऊं
देखो फिर भी कोई गा रहा है, कौन गाए ये मैं कैसे जानूं,
कोई चुपके से आके ।।

गीता रॉय की गुरूदत्‍त से मुलाकात सन 1951 में फिल्‍म जाल के गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान हुई थी । आखिरकार छब्‍बीस मई 1953 को गीत रॉय और गुरूदत्‍त ने ब्‍याह रचा लिया । लेकिन 1957 आते-आते गुरूदत्‍त का नाम वहीदा रहमान से जुड़ने लगा और गीता रॉय का दिल छलनी होता चला गया । दिक्‍कतें इतनी बढ़ीं कि गीता अपने बच्‍चों को लेकर अलग रहने लगीं । इस बीच पारिवारिक जिंदगी की परेशानियों ने उनके गाने पर असर डाला और वो संगीतकारों से मुंह चुराने लगीं । रिहर्सलों में नहीं जाती थीं । फोन नहीं उठाती थीं । सोचिए कि यही वो दौर है जब उन्‍होंने बड़े दर्द भरे गीत गाये हैं । ऊपर के दोनों गीत इसी तरह के हैं । शायद मौक़ा मिले तो आगे चलकर मैं इस दौर के गानों की फेहरिस्‍त तैयार करके आपके सामने रखूंगा ।

आखिरकार सात साल बाद 10 अक्‍टूबर 1964 को गुरूदत्‍त नहीं रहे ( उन्‍होंने अपनी जिंदगी खत्‍म कर दी ) गीता राय का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया । आर्थिक मुसीबतें बढ़ गयीं, स्‍टेज शो और गानों के ज़रिए उन्‍होंने खुद को संभालना शुरू किया । शराब की लत बढ़ती चली गयी । और बीस जुलाई 1972 को उन्‍होंने इतनी शराब पी ली कि वो संसार और संगीत के परे चली गयीं । छोड़ गयीं अपने दर्दीले नग्‍मे हम सबके लिए ।
Get this widget | Share | Track details


वक्‍त ने किया क्‍या हंसी सितम, तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम
बेक़रार दिल इस तरह मिले, जिस तरह कभी हम जुदा ना थे
तुम भी खो गये, हम भी खो गये, एक राह पे चल के दो क़दम
वक्‍त ने किया ।।

जायेंगे कहां कुछ पता नहीं, चल पड़े मगर रास्‍ता नहीं
क्‍या तलाश है कुछ पता नहीं, बुन रहे हैं दिल ख्‍वाब दम-ब-दम
वक्‍त ने किया ।।

ये गीत कैफ़ी आज़मी ने लिखा है और सचिन देव बर्मन की तर्ज़ ।
गीता राय और गुरूदत्‍त की जिंदगी पर ये गाना कितना फिट बैठता है ।

गीता राय को हमारी श्रद्धांजली ।
उनके गीत हमारे अकेलेपन का सहारा बने रहेंगे ।


READ MORE...

Monday, July 9, 2007

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्‍लाह


मेरी शिकायत लगातार बढ़ती जा रही है, आजकल अच्‍छे कवि-सम्‍मेलन और मुशायरों का आयोजन नहीं होता । बचपन की बात है, घर पर ब्‍लैक एंड व्‍हाईट टी.वी. होता था और अकसर मुशायरे और कवि सम्‍मेलन आते थे । ऐसे मुशायरों में क़तील शिफाई, निदा फ़ाज़ली, नक्‍श लायलपुरी, इफ्तेख़ार इमाम सिद्दीक़ी, वसीम बरेलवी, बेकल उत्‍साही, शेरी भोपाली, राहत इंदौरी, अली सरदार जाफरी वगैरह को सुना और इनकी रचनाएं अपनी डायरियों में उतारीं । यही हाल कवि-सम्‍मेलनों का था । बहरहाल आज इस बात का जिक्र इसलिये कि शायद किसी को याद भी ना हो, आज से छह साल पहले आज ही के दिन जाने माने शायर क़तील शिफाई हमसे जुदा हो गये थे । अब ये अफ़सोस की बात ही है कि ये बात पढ़कर आप चौंक रहे हैं । ज़ाहिर है कि इन अहम तारीख़ों को याद दिलाने का कोई पुख्‍ता इंतज़ाम भी तो नहीं है हमारे यहां, आपको याद आये तो आखिर कैसे । इसलिये आपका ये नाचीज़ दोस्‍त जब जब जितना याद आता है, ऐसी हस्तियों की तारीख़ें आपको याद दिलाने की कोशिश करता है ताकि अगर आप इनके प्रशंसक हैं तो कम से कम इस दिन तो शिद्दत से याद करें इन्‍हें । कल हमने गुरूदत्‍त को याद किया था और आज हम क़तील शिफ़ाई की बरसी पर उन्‍हें खिराजे-अकीदत पेश कर रहे हैं ।

क़तील शिफाई 24 दिसंबर 1919 को हरीपुर हज़ारा में पैदा हुए थे । उनका असली नाम था औरंगज़ेब ख़ान था । क़तील उनका तख़ल्‍लुस था, क़तील यानी वो जिसका क़त्‍ल हो चुका है । अपने उस्‍ताद हकीम मुहम्‍मद शिफ़ा के सम्‍मान में क़तील ने अपने नाम के साथ शिफ़ाई शब्‍द जोड़ लिया था । पिता के असमय निधन की वजह से पढ़ाई बीच में ही छोड़कर क़तील को खेल के सामान की अपनी दुकान शुरू करनी पड़ी, इस धंधे में बुरी तरह नाकाम रहने के बाद क़तील पहुंच गये रावलपिंडी और एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में उन्‍होंने साठ रूपये महीने की तनख्‍वाह पर काम करना शुरू किया । सन 1946 में नज़ीर अहमद ने उन्‍हें मशहूर पत्रिका ‘आदाब-ऐ-लतीफ़’ में उप संपादक बनाकर बुला लिया । ये पत्रिका सन 1936 से छप रही थी । क़तील की पहली ग़ज़ल लाहौर से निकलने वाले साप्‍ताहिक अख़बार ‘स्‍टार’ में छपी, जिसके संपादक थे क़मर जलालाबादी ।

जनवरी 1947 में क़तील को लाहौर के एक फिल्‍म प्रोड्यूसर ने गाने लिखने की दावत दी, उन्‍होंने जिस पहली फिल्‍म में गाने लिखे उसका नाम है ‘तेरी याद’ । क़तील ने कई पाकिस्‍तानी और कुछ हिंदुस्‍तानी फिल्‍मों में गीत लिखे । जगजीत सिंह-चित्रा सिंह और गुलाम अली ने उनकी कई ग़ज़लें और नज़्में गाई हैं । उनकी बीस से भी ज्‍यादा किताबें शाया हो चुकी हैं ।

ग्‍यारह जुलाई 2001 को लाहौर में उनका इंतकाल हो गया ।
क़तील की रचनाएं आप कविता-कोश में
यहां पढ़ सकते हैं ।



Get this widget Share Track details


ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा

तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिये थोड़ी है
इक ज़रा सा ग़म-ए-दौराँ का भी हक़ है जिस पर
मैनें वो साँस भी तेरे लिये रख छोड़ी है
तुझपे हो जाऊँगा क़ुरबान तुझे चाहूँगा

अपने जज़्बात में नग़्मात रचाने के लिये
मैनें धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैं ने क़िस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे
प्यार का बन के निगेहबान तुझे चाहूँगा

तेरी हर चाप से जलते हैं ख़यालों में चिराग़
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये
तुझको छू लूँ तो फिर ऐ जान-ए-तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी ख़ुश्बू आये
तू बहारों का है उनवान तुझे चाहूँगा

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्‍लाह


दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह

मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे
रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह

सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह

या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह


ये मोजज़ा भी मोहब्‍बत कभी दिखाए मुझे




ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझे
कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे

वो महरबाँ है तोप इक़रार क्यूँ नहीं करता
वो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे

मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये को
बदन मेरा ही सही दोपहर न भाये मुझे

मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ
बरहना शहर में कोई नज़र न आये मुझे

वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मालूम
दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे

मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ "क़तील"
ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे


हाथ दिया उसने मेरे हाथ में


हाथ दिया उसने मेरे हाथ में
मैं तो वली बन गया एक रात में

इश्‍क़ करोगे तो कमाओगे नाम
तोहमतें बंटती नहीं ख़ैरात में

इश्‍क़ बुरी शय नहीं पर दोस्‍तो
दख्‍ल ना दो तुम मेरी हर बात में

मुझपे तवज्‍जो है सब आस पास की
कोई कशिश तो है मेरी ज़ात में

रब्‍त बढ़ाया ना क़तील इसलिये रब्‍त:संपर्क
फ़र्क़ था दोनों के ख़यालात में


किया है प्‍यार जिसे हमने जिंदगी की तरह



किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चांदनी की तरह

कभी न सोचा था हमने ‘क़तील’ उस के लिए
करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह



क़तील के कुछ चुनिंदा शेर---

सब कहते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर
मैं दिल में सोचूँ शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है


रची है रतजगो की चाँदनी जिन की जबीनों में
"क़तील" एक उम्र गुज़री है हमारी उन हसीनों में


जिस बरहमन ने कहा है के ये साल अच्छा है
उस को दफ़्नाओ मेरे हाथ की रेखाओं में



वो ख़ुदा है किसी टूटे हुए दिल में होगा
मस्जिदों में उसे ढूँढो न कलीसाओं में



हम को आपस में मुहब्बत नहीं करने देते
इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में

किस को ख़बर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं
सावन आया लेकिन अपनी क़िस्मत में बरसात नहीं

मेरे अन्दर चली थी आँधी ठीक उसी दिन पतझड़ की
जिस दिन अपने जूड़े में उसने कुछ फूल सजाये थे

"क़तील" जिसकी अदावत में एक प्यार भी था
उस आदमी को गले से लगा लिया मैनें

सच बात पे मिलता है सदा ज़हर का प्याला
जीना है तो फिर जीने के इज़हार न माँगो

बताईये क्‍या जिंदगी के किसी मोड़ पर आपको भी याद आये हैं क़तील

READ MORE...

बिछड़े सभी बारी बारी-गुरूदत्‍त की याद में (जन्‍मदिन पर विशेष)


आज मैं अचानक गुरूदत्‍त को क्‍यों याद कर रहा हूं,
दरअसल आज उनका बयासीवां जन्‍मदिन है ।

गुरूदत्‍त एक अजीब और जटिल शख्सियत थे, मुझे लगता है कि जिन लोगों में रचनात्‍मकता और जुनून का ख़ज़ाना होता है, वो अकसर थोड़े या ज्‍यादा ‘सिनिक’ हो जाते हैं । और गुरूदत्‍त भी ऐसे ही थे ।

विविध भारती पर क़रीब दो बरस पहले बारिश के ऐसे ही दिनों में वहीदा रहमान आईं थीं और उन्‍होंने गुरूदत्‍त के जुनून के किस्‍से सुनाए थे । कैसे एक फिल्‍म की शूटिंग के दौरान उन्‍हें सीढ़ी से उतर के नीचे आना था और जहां खड़े होकर संवाद बोलने थे, वहां से उनकी नाक की लौंग को चमकना था । लाइटिंग की गड़बड़ी से ऐसा हो नहीं रहा था और वो दिन भर वहीदा को सीढियों से उतरवाते रहे थे । ये तो बहुत छोटी-सी घटना है । उससे भी बड़ी घटना ये है कि वहीदा रहमान से उनको जुड़ाव हो गया था, शायद हिंदी सिनेमा की ये सबसे अनोखी मिसाल है, गुरूदत्‍त ने अपनी फिल्‍मों में वहीदा को जिस काव्‍यात्‍मक रूप में प्रस्‍तुत किया वो अनमोल है, वैसा तो किसी ने मधुबाला को भी पेश नहीं किया । तमाम फिल्‍मों की छबियां ले लीजिये और उनमें वहीदा के किरदारों को जोड़ लीजिये, निर्देशक के उद्दाम प्रेम और एक समझदार नायिका के अविकल-सौंदर्य ने जुड़कर जो समां रचा है, उस पर हम बस आहें भरते ही रह जाते हैं । अफ़सोस कि इस ‘प्रेम’ का अंत वहीदा के उस थप्‍पड़ से हुआ, भरे सेट पर वहीदा ने गुरूदत्‍त को थप्‍पड़ मारा और गुरूदत्‍त ने की आत्‍महत्‍या की कोशिश । बहरहाल, यहां से ‘गॉसिप’ का रास्‍ता शुरू होता है, इसलिये हम फिर से गुरूदत्‍त के कृतित्‍व की ओर आते हैं, पर पहले मेरे ज़ेहन में कौंधते इस सवाल का कोई जवाब है आपके पास, बेहद संवेदनशील और जुनूनी रचनाकार आत्‍महंता क्‍यों होते हैं । क्‍यों वो दुनिया को इस क़ाबिल नहीं पाते कि वहां जिया जाये, रचा जाये, ज़ुल्‍मतों को सहा जाये और फिर भी ‘बने’ रहा जाये ।


गुरूदत्‍त हिंदी के ऐसे पहले निर्माता-निर्देशक थे जो अपनी एक खास सोच के साथ रूपहले संसार में आये थे । उन्‍होंने सच्‍चा सिनेमा बनाया, कोई ख़ामख़याली नहीं थी उन्‍हें दुनिया के प्रति । मुझे हैरत होती है कि ‘प्‍यासा’ और ‘काग़ज़ के फूल’ जैसी फिल्‍मों में गहरे यथार्थ को उन्‍होंने अपने ‘रोमांटिसिज़्म’ के साथ किस कुशलता से पिरोया है । यथार्थवादी फिल्‍मों में ‘रोमांस’ या तो बहुत सूखा हो जाता है या फिर सिरे से ग़ायब नज़र आता है, पर गुरूदत्‍त के यहां ऐसा नहीं था । गुरूदत्‍त की फिल्‍मों के अलग-अलग दृश्‍यों में इसे महसूस किया जा सकता है । ख़ासतौर पर ‘प्‍यासा’ और ‘काग़ज़ के फूल’ में ।

दिलचस्‍प बात ये है कि गुरूदत्‍त ने एक ही तरह का सिनेमा नहीं बनाया, हालांकि बहुत उथले तरीक़े से देखकर कुछ आलोचक गुरूदत्‍त के सिनेमा को ‘मोनोटोनस’ और ‘बोझिल’ क़रार देते हैं । पर ऐसा नहीं है, गुरूदत्‍त बहुत ही ‘इन्‍टेन्‍स’ फिल्‍मकार थे । हम बात कर रहे थे उनके सिनेमा में विविधता की, उनकी निर्देशित पहली फिल्‍म ‘बाज़ी’ एक बेमिसाल अपराध-फिल्‍म थी । 1951 में रिलीज़ ये फिल्‍म आज छप्‍पन साल बाद भी कालजयी मानी जाती है । ( यहां ये जिक्र ज़रूरी है कि इसी फिल्‍म के एक गाने की रिकॉर्डिंग में गुरूदत्‍त की मुलाक़ात गीता रॉय से हुई थी और छब्‍बीस मई 1953 में उन्‍होंने शादी कर ली )

1954 में गुरूदत्‍त ने ‘आरपार’ बनाई, जो मुझे उनकी बनाई कमज़ोर फिल्‍म लगती है, पर इस फिल्‍म की खूबी ये थी कि इसके किरदार बेहद विश्‍वसनीय थे । सड़कछाप सामान्‍य लोग, अपनी जिंदगी में गुम, जद्दोजेहद करते लोग । यहां हम उनकी फिल्‍मों के संगीत की भी चर्चा करना चाहेंगे । चाहे ‘बाज़ी’ हो या ‘आरपार’ या फिर ‘मिस्‍टर एंड मिसेज़ 55’ या फिर ‘प्‍यासा’ और ‘काग़ज़ के फूल’ सारी फिल्‍मों का संगीत कमाल रहा है । ज्‍यादातर फिल्‍मों में उन्‍होंने ओंकारनाथ नैयर को संगीतकार रखा था । और जिद्दी निर्देशक के जिद्दी संगीतकार ने वाकई कालजयी संगीत रचा । कहते हैं कि अपने गानों के फिल्‍मांकन में गुरूदत्‍त का जवाब नहीं था, वो गानों को पहले कहानी में बहुत बारीकी से पिरो लेते थे और जब फिल्‍माते तो वो सिनेमा पर रची एक कविता बन जाते ।

गुरूदत्‍त के सिनेमेटोग्राफर वी.के.मूर्ति कहते हैं कि ‘वक्‍त ने किया क्‍या हंसी सितम’ इस गाने की शूटिंग दोपहर में नटराज स्‍टूडियो में की जा रही थी । तभी रोशनदान से रोशनी की एक ‘बीम’ आती हुई दिखी, जब मैंने इसे गुरूदत्‍त को दिखाया तो उन्‍होंने कहा कि इसे हम अपने गाने में इस्‍तेमाल करेंगे । आप यकीन नहीं करेंगे कि किस तरह हमने दो मिरर लगाके बड़ी मुश्किल से रोशनी को भीतर रिफ्लेक्‍ट किया और वो मशहूर ‘बीम-शॉट’ लिया जो अब कालजयी बन चुका है ।

सन 1957 में आई ‘प्‍यासा’ और 1959 में आई ‘काग़ज के फूल’ सेल्‍यूलॉइड पर रची कविता की तरह हैं । दोनों ही फिल्‍में गुरूदत्‍त ने बड़े ही जतन से बनाईं थीं । ‘काग़ज़ के फूल’ के कुछ शॉट तो ‘मैजिकल मूमेन्‍ट्स’ की शक्‍ल में सामने आते हैं । एक निर्देशक और उसकी प्रिय अभिनेत्री के बीच के संबंधों की जटिलता और उतारचढ़ाव को उन्‍होंने बड़ी संवेदनशीलता के साथ उभारा था । क्‍योंकि एक तरह से ये उनकी जिंदगी की दास्‍तान थी । ये फिल्‍म भारत की पहली ‘सिनेमास्‍कोप’ फिल्‍म भी थी । जो बुरी तरह से असफल रही थी और गुरूदत्‍त टूट से गये थे । कहते हैं कि इसके बाद उन्‍होंने कभी फिल्‍म निर्देशित ना करने का फैसला किया था । फिल्‍म ‘चौदहवीं का चांद’ में निर्देशक के रूप में एम.सादिक़ का नाम आता है और फिल्‍म ‘साहेब बीवी और गुलाम’ में जाने माने लेखक अबरार अलवी का नाम आता है । पर कहते हैं कि गुरूदत्‍त के क्रियेटिव इनपुट इन फिल्‍मों को महान बना सके । बड़ौदा में फिल्‍म ‘चौदहवीं का चांद’ की शूटिंग के दौरान उन्‍होंने अपने कैमेरामैन वी.के.मूर्ति से कहा था—‘अगर ये दुनिया मुझे मिल भी जाये तो क्‍या है’ जब मूर्ति ने उनसे पूछा कि वो ऐसा क्‍यों कह रहे हैं तो बोले---मुझे ऐसा ही लग रहा है, देखो ना- मुझे निर्देशक बनना था, बन गया, अभिनेता बनना था, वो भी बन गया, अच्‍छी फिल्‍में बनानी थीं सो वो भी बनाईं, पैसा है, सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा । शायद ये वो दौर था जब वहीदा से उनकी अंतरंगता की वजह से उनके और गीता दत्‍त के बीच तक़रार चल रही थी और वो बच्‍चों को लेकर अलग रहने लगी थीं । गुरूदत्‍त ने खुद को खत्‍म किया और गीता रॉय शराब का शिकार होकर चल बसीं ।

गुरूदत्‍त जैसा सिनेकार अपने पीछे कई चीज़ें छोड़ गया है, वो जुनून, जो एक लाइटहाउस की तरह सिनेमा की दुनिया के लोगों को रास्‍ता दिखा सकता है, वो कलात्‍मकता, जो उस दौर की तकनीकी सीमाओं के बावजूद क्रांतिकारी लगती है, वो जज़्बा, जिसके तहत उन्‍होंने वहीदा रहमान, राज खोसला, अबरार अलवी और ना जाने कितने नये लोगों को मौक़ा दिया । वो सनक, जिसके तहत उन्‍होंने खुद को खत्‍म किया और जो हमें सिखाती है कि तमाम बातों के बावजूद जीवन में संतुलन बना रहना चाहिये ।

आज ही के दिन 1925 में गुरूदत्‍त पादुकोण जन्‍में थे । शायद तब भी बारिश हो रही होगी, आज भी हो रही है, शायद बारिश के इस पैथोस भरे, जमे-जमे, उदास और ख़ाली-ख़ाली से मौसम ने ही गुरूदत्‍त को ऐसा बनाया होगा ।


विनम्र श्रद्धांजली ।



प्‍यासा-ये महलों ये तख्‍तों





प्‍यासा-जाने वो कैसे लोग थे





काग़ज़ के फूल






ठंडी हवा काली घटा









जाने वो कैसे लोग थे जिनके
Get this widget | Share | Track details


कुछ तस्‍वीरें







READ MORE...

Friday, June 22, 2007

भूली हुई यादों मुझे इतना ना सताओ—नहीं रहीं अभिनेत्री अनीता गुहा । हमारी श्रद्धांजली



कल विख्‍यात अभिनेत्री अनीता गुहा का निधन हो गया । मैंने सोचा था कि कल सुबह ही उनके बारे में अपने चिट्ठे पर लिखूंगा, लेकिन समय नहीं मिल सका, इस बीच पहले से ही तैयार किया अपना ऑडियो फ़ीचर चढ़ा दिया, जो विश्‍व संगीत दिवस पर था, इस पोस्‍ट पर टिप्‍पणी के रूप में हैदराबाद की सुधी पाठक अन्‍नपूर्णा ने शिद्दत से अनीता गुहा को याद किया है ।

पचास और साठ के दशक में मीना कुमारी और गीताबाली के साथ अनीता गुहा की गिनती शानदार अभिनेत्रियों में होती थी । इसमें दिलचस्‍प पेंच ये है कि बाक़ी दोनों अभिनेत्रियों रोमांटिक किरदारों के लिए जानी गयीं और अनीता गुहा पौराणिक फिल्‍मों में निभाए देवी के किरदारों के लिए ।

अनीता गुहा की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्‍म थी ‘जय संतोषी मां’ । जो ‘शोले’ के साथ रिलीज़ हुई और शोले को बॉक्‍स ऑफिस पर कड़ी टक्‍कर देते हुए हिंदी सिनेमा के इतिहास में शामिल हो गयी । यक़ीन मानिए ‘जय संतोषी मां’ बॉक्‍स ऑफिस पर अपनी कामयाबी के लिए जानी जाती है । इस फिल्‍म का उषा मंगेशकर का गाया गीत ‘मैं तो आरती उतारूं रे’ सुनने के लिए यहां क्लिक कीजिए ।

जहां तक मेरी जानकारी है फिल्‍मों में उनका प्रवेश बंगाली फिल्‍म ‘बसेर केला’ से हुआ था ( अगर ये तथ्‍य ग़लत हो तो कृपया बताएं, सुधार लिया जायेगा ) और हिंदी फिल्‍म संसार में वो ‘दुनिया गोल है’ नामक फिल्‍म के ज़रिए आईं । जिसमें उनके नायक थे करण दीवान ।

लेकिन असली ख्‍याति उन्‍हें मिली विजय भट्ट की फिल्‍म ‘संपूर्ण रामायण’ से ।
इसके बाद उन्‍होंने कई धार्मिक फ़िल्‍मों में काम किया । जैसे
अंगुलीमाल ( इस फिल्‍म का गीत सुनने के लिए यहां क्लिक करें )

पवन पुत्र हनुमान, शंकर सीता अनुसूया, कण-कण में भगवान वग़ैरह ।

लेकिन ऐसा नहीं है कि अनीता गुहा ने केवल धार्मिक फिल्‍में ही की हों, उन्‍हें कुछ और फिल्‍में करने का मौक़ा भी मिला ।

मुझे फिल्‍म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ याद आ रही है । और इंटरनेट पर खोजबीन करने पर इस फिल्‍म का ये वीडियो भी मिल गया है । देखिये और शिद्दत से याद कीजिये अनीता गुहा को ।




फ़ि‍ल्म छूमंतर में उन्‍होंने जॉनी वॉकर के साथ बतौर नायिका काम किया था । फिल्‍मों के क़द्रदान उनकी ये भूमिका अभी भी याद करते हैं । 1956 में आई इस फिल्‍म के संगीतकार थे ओ0पी0 नैयर । इस फिल्‍म का गीत ‘जब बादल लहराया’ सुनने के लिए यहां क्लिक कीजिए ।

इसी तरह मदनमोहन का स्‍वरबद्ध किया वो यादगार नग्‍मा ‘वो भूली दास्‍तान लो फिर याद आ गयी’ अनीता गुहा पर ही फिल्‍माया गया था ।

Get this widget Share Track details


ये गाना है भूली हुई यादों, फिल्‍म संजोग ।


इस गाने को आप यहां देख भी सकते हैं ।







जब अनीता गुहा के नग्‍मों को याद करें तो याद आती है फिल्‍म ‘दूज का चांद’ और याद आता है इस फिल्‍म का गीत—‘सजन सलोना’ ।

अरे हां याद आया फिल्‍म चाचा जिंदाबाद में तो वो किशोर कुमार की नायिका थीं ।
मदनमोहन का स्‍वरबद्ध किया इस फिल्‍म का लता जी का गाया एक कालजयी गीत है ‘बैरन नींद ना आए’ । इसे आप यहां क्लिक करके सुन सकते हैं ।

हैरत की बात ये है कि अनीता गुहा के गानों का जिक्र करते हुए ज्‍यादातर गीत मदनमोहन के ही मिल रहे हैं । फिल्‍म देख कबीरा रोया में उन्‍होंने तीन में से एक नायिका की भूमिका की थी । और इस‍ फिल्‍म के लिये लता मंगेशकर ने अपने कैरियर का एक अत्‍यंत महत्‍त्‍वपूर्ण गीत गाया था—‘मेरी वीणा तुम बिन रोए’ । मुझे ये तो याद नहीं कि ये गीत अनीता गुहा पर फिल्‍माया गया था या नहीं । पर इसे आप यहां क्लिक करके सुन सकते हैं ।

फिल्‍म पूर्णिमा का गीत ‘हमसफर मेरे हमसफर’ इसे कल्‍याण जी आनंद जी ने स्‍वरबद्ध किया है । यहां क्लिक करके सुनिए ।

फिल्‍म ‘प्‍यार की राहें’ का गीत-‘दो रोज़ में वो प्‍यार का आलम’ । इसे सुनने के लिए यहां क्लिक कीजिए । संगीत कनु घोष का ।

अगर आपको अनीता गुहा की फिल्‍मों से जुड़ी कोई बात याद हो तो ज़रूर बताईयेगा ।
अनीता गुहा को हमारी विनम्र श्रद्धांजली ।

READ MORE...

Thursday, May 3, 2007

हम ना रहेंगे, तुम ना रहोगे फिर भी रहेंगी निशानियां: नरगिस (nargis) की याद में एक चिट्ठा








मित्रो पिछले दो तीन दिनों से आपके इस दोस्‍त के कंधे में जकड़न आ गयी है, इसलिए चाहकर भी चिट्ठाकारी नहीं हो पा रही है । पर जब पता चला कि आज अदाकारा नरगिस की याद का दिन है, तो खुद के रोक नहीं पाया । आज से ठीक छब्‍बीस साल पहले नरगिस दत्‍त की कैंसर से मौत हो गयी थी । जीवन कितनी बड़ी त्रासदियां लेकर आता है इसकी मिसाल देखिए कि नरगिस आपा अपने बेटे की फिल्‍म को रिलीज़ होते नहीं देख पाईं । एक ख्‍वाब था जो अधूरा रह गया । एक आस जो दिल में रह गयी । और उनकी मौत के चार दिन बात सात मई को संजय दत्‍त ने रजत पट पर अपना पहला क़दम रखा ‘रॉकी’ के ज़रिए


बहरहाल अदाकारा नरगिस की जिंदगी वाक़ई बेहद नाटकीय रही । पैदा हुईं तो नाम था फातिमा रशीद । मां जद्दन बाई नामचीन गायिका और अभिनेत्री थीं । पांच बरस की हुईं तो फिल्‍मों में बेबी रानी के नाम से काम करवाया जाने लगा । बनना चाहती थीं डॉक्‍टर पर मां की जिद के आगे एक ना चली । शूटिंग में व्‍यस्‍त हो गयीं । ज़बर्दस्‍ती भिनेत्री बनाया गया, फिर भी कद्दावर अभिनेत्री कहलाईं और हिंदी सिनेमा की सबसे नरमो-नाजुक और सबसे ‘इंटेलेक्‍चुअल’ अदाकारा कही गयीं । अगर आप बुरा ना मानें तो एक सच सामने लाना चाहता हूं, हिंदी सिनेमा की हीरोईनों को बे-अक्‍ल और उथला माना जाता रहा है और माना जाता है । लोग मानते हैं कि वो ज्‍यादा पढ़ी लिखी और समझदार नहीं होतीं, बस पेड़ों के गिर्द नाच लिया, ठुमके लगा लिये और हो गया । दुनिया से उनका ज्‍यादा कोई सरोकार नहीं होता । बाद की कई नायिकाओं ने इस ख्‍याल को तोड़ा और खुद को साबित किया है पर ज्‍यादातर तो ये राय सही ही नज़र आई है ।


राजकपूर और नरगिस की जोड़ी पहली बार सिनेमा के परदे पर आई थी सन 1948 में फिल्‍म ‘आग’ में, ये आर0के0प्रोडक्‍शन्‍स की पहली पेशकश थी, यानी निर्देशन और फिल्‍म निर्माण की दुनिया में राजकपूर का पहला पहला क़दम । इसके बाद बरसात (1949) आवारा (1951) आह(1953) श्री 420(1955) चोरी चोरी(1956) जागते रहो(1956) जैसी फिल्‍मों में राजकपूर और न‍रगिस की जोड़ी नज़र आई । (इनमें से फिल्‍म चोरी चोरी राजकपूर का निर्माण नहीं थी । ना ही वो इसके निर्देशक थे । और जागते रहो का केवल निर्माण उन्‍होंने किया था)

राजकपूर हिंदी सिनेमा के शोमैन कहलाते हैं । और फिल्‍मों में अपनी नायिका को बेहद रूमानी अंदाज़ में पेश करने का ज़बर्दस्‍त जुनून राज साहब में था । आपने देखा होगा राज कपूर ने अपनी फिल्‍मों में नरगिस को बिलकुल साफ शफ्फाफ सफेद साड़ी में पेश किया है । लंबे बाल, माथे पर लहराती जुल्‍फ़ और इतना मासूम चेहरा कि जिसके लिए अंग्रेज़ी का शब्‍द vulnerable मौजूं लगता है और इसकी जोड़ का हिंदी शब्‍द मिल नहीं रहा है । आईये कुछ गानों के ज़रिए नरगिस की अदायगी को सलाम करें ।

याद
कीजिये फिल्‍म‘आवारा’ का वो गीत, जिसमें लता जी गाती हैं ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे, वो चंदा, मैं तुमसे प्‍यार कर लूंगी, बातें हज़ार कर लूंगी’ तो एक भारतीय लड़की की लाज भी दिखती है और लड़कियों की वो बोल्‍डनेस भी दिखती है जो सिर्फ और सिर्फ प्‍यार करने वालों में पाई जाती है, याद रहे ये वो लड़की है जो एक आवारा से प्‍यार कर रही है । इस फिल्‍म को देखिये और महसूस कीजिए कि कितनी शिद्दत से नरगिस ने इस भूमिका निभाया है । इस गाने को यहां सुनिए ।


फिर मुझे फिल्‍म श्री 420 का वो गीत ‘प्‍यार हुआ इक़रार हुआ’ इस गाने का वो दृश्‍य या
द कीजिए जिसमें राजकपूर और नरगिस छाता लगाकर बारिश में टहलते हुए गाना गा रहे हैं । और नरगिस वायलिन बजाते राजकपूर की बांहों में झूल जाती हैं । ( ये गाना यहां सुनिए) शायद यही दृश्‍य आगे चलकर आर0के0फिल्‍म्‍स का ‘लोगो’ बना । इस गाने में नरगिस लता जी की आवाज़ में गाती है—‘मैं ना रहूंगी तुम ना रहोगे फिर भी रहेंगी निशानियां’ और इस पूरे गीत में नरगिस के चेहरे के भाव देखिए, यक़ीन मानिए आज शायद प्‍यार के समर्पण का वो भाव सिरे से ग़ायब ही हो चुका है ।

हम इस विवाद में नहीं पड़ते कि राजकपूर और नरगिस की ऑनस्‍क्रीन केमिस्‍ट्री क्‍या उनकी असली जिंदगी में भी थी । अगर थी भी तो इसमें बुराई क्‍या है । लेकिन आर0के0फिल्‍म्‍स से अलग होने के बाद कोई भी नरगिस की शख्सियत की ठसक, उनकी रूमानियत, नाज़ुकी, अल्‍हड़ता, शोखी और बेफिक्री को एक साथ नहीं उभार सका । हां उन्‍होंने कुछ बड़ी कमाल की फिल्‍में राज कपूर के प्रोडक्‍शन के अलावा भी कीं ।

मुझे ‘मदर इंडिया’ की उनकी भूमिका बेहद प्रिय है । भारतीय नारी के संघर्ष को जिस तरह नरगिस ने जिया वो अन्‍यत्र दुर्लभ है । मुझे याद है फिल्‍म निर्देशक कुणाल कोहली ने कहीं कहा था—‘मदर इंडिया’ के गाने ‘घूंघट नहीं खोलूं’ में जिस तरह नरगिस लजाई और सकुचाई नज़र आती हैं, वैसी लाज तो आज की लड़कियों में सिरे से ग़ायब है और आज की हीरोईनों से भी हम वैसा अभिनय नहीं करवा सकते’ । जब ये बात मैंने लता जी को सुनाई तो वो ज़ोर से हंसीं और उन्‍होंने कहा कि इस लाज को अपने गायन में उतारने के लिए उन्‍हें कई कई गानों में बड़ी मेहनत करनी पड़ी थी । इस गाने को
यहां सुनिए ।

सन 1958 की उनकी फिल्‍म ‘लाजवंती’ कई कारणों से मुझे प्रिय है । और फिल्‍म ‘रात और दिन’(1967) दोनों फिल्‍में अपने अनोखे कथानकों के कारण वैसे भी उल्‍लेखनीय हैं । लेकिन चूंकि हम गीतों के बहाने नरगिस आपा को याद कर रहे हैं तो ज़रा ये गाना सुनिये ।
यहां क्लिक कीजिए । ये गाना है ‘गा मेरे मन गा’ सचिन दा की तर्ज़ । घर से निकाली गयी एक पतिव्रता स्‍त्री का गीत है ये । जो अपने आप में दुखियारी है । इसे सुनिए मत देखिए, और नरगिस के चेहरे को देखिये । कितनी पीड़ा, कितना संत्रास है, उनके चेहरे पर ।

फिल्‍म रात और दिन में नरगिस ने एक ऐसी स्‍त्री का किरदार निभाया जिसे नींद में चलने की बीमारी है । इस बीमारी की वजह से किस तरह उसका पारिवारिक जीवन नर्क हो जाता है इसकी दास्‍तान है ये फिल्‍म । इसका गाना सुनने के लिए
यहां क्लिक कीजिए । ‘आवारा ऐ मेरे दिल जाने कहां है तेरी मंजिल’ । क्‍या कहूं नरगिस की अदायगी के बारे में । हर बार वो बिल्‍कुल अलग नज़र आती हैं । कहते हैं कि नरगिस सही मायनों में एक भारतीय स्‍त्री की आदर्श छबि थीं ।

नरगिस ने ज्‍यादातर संघर्ष करती और जूझती और अपने अस्तित्‍व के लिए लड़ती नारी की भूमिकाएं निभाईं और कहना ना होगा कि बख़ूबी निभाईं । उनके जीवन की नाटकीयता देखिए कि फिल्‍म ‘मदर इंडिया’ की शूटिंग के दौरान जब वो आग की लपटों में घिर गयीं थीं तो फिल्‍म में उनके बेटे की भूमिका निभा रहे सुनील दत्‍त ने उन्‍हें बचाया था । बाद में उन्‍होंने नरगिस के सामने शादी का प्रस्‍ताव भी रखा और नरगिस ने अपने से एक साल छोटे बेहद ज़हीन और शानदार व्‍यक्तित्‍व को अपना जीवनसाथी चुन लिया । उस ज़माने के नज़रिए से ये भी एक साहसिक निर्णय था । फिर वे राज्‍यसभा में चुनी जाने वाली पहली भारतीय अदाकारा बनीं और वहां वो केवल सजावट की चीज़ (ornamental member) बनकर नहीं गयीं, वहां उन्‍होंने ज़बर्दस्‍त सक्रियता दिखाई । जीवन की त्रासदी देखिए कि कैंसर के खिलाफ़ जंग छेड़ने वाली नरगिस खुद इस जानलेवा बीमारी की शिकार बनीं और फिर इस बीमारी से हार भी गयीं ।

मैंने कितने ही फिल्‍म कलाकारों से सुना है कि नरगिस कितनी बड़े दिल वाली और कितनी जिंदादिल थीं । कई बार तो पूरी यूनिट के लोगों के लिए खाना बनाकर लाती थीं । साथी कलाकारों का बहुत ख्‍याल रखती थीं । उनका गरिमामय व्‍यक्तित्‍व, समाज से उनके सरोकार, उनकी जिंदादिली और उनकी प्रतिभा एक साथ इतने गुण आज की अभिनेत्रियों में कम ही नज़र आते हैं । नरगिस आपा को विनम्र श्रद्धांजलि ।




READ MORE...
Blog Widget by LinkWithin
.

  © Blogger templates Psi by Ourblogtemplates.com 2008 यूनुस ख़ान द्वारा संशोधित और परिवर्तित

Back to TOP