संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, June 17, 2007

तुझे सूरज कहूं या चंदा—फादर्स डे पर ये गीत और अपने मन की ढेर सारी बातें




प्रिय मित्रो
आज Fathers day है । हिंदी में कहें तो पितृ दिवस । कई लोग कहते हैं कि ये सब विदेशी संस्‍कृति के चोचले हैं । पर मुझे लगता है कि अगर ऐसे चोंचले हों तो वो अच्‍छे ही हैं ।

हमारे देश में त्रासदी ये रही है कि पिता घर में अधिकतर एक भयावह उपस्थित के तौर पर रहे हैं । कुछ पीढियों पहले तक पिता के प्रति एक सम्‍मानजनक आतंक रहा करता था, उनकी छबि ग़ुस्‍सैल और आंखें तरेरने वाले की होती थी । ऐसे परिवारों में बच्‍चों ने कभी अपने मन की बातें अपने पिता से नहीं कहीं । इसमें पिता का भी दोष रहा क्‍योंकि पिता ने एक आतंक कायम रखा, जो शायद अनुशासन का आतंक था या फिर ख़ानदानी तहज़ीब का । हालांकि इधर कुछ सालों से कई परिवारों में पिता और पुत्र के बीच आतंक का रिश्‍ता दोस्‍ती के रिश्‍ते में बदलता दिख रहा है जो एक सुखद बात है ।

बहरहाल आज फादर्स डे है । पिता के प्रति अपने जज़्बात के इज़हार का दिन । और वही मैं कर रहा हूं । मुझे आज बचपन के वो दिन याद आ रहे हैं जो मैंने भोपाल में
बिताए । पिता की वजह से रेडियो तब घर में एक अनिवार्य उपस्थित की तरह होता
था । मुझे याद है भारत संचार निगम लिमिटेड या पुराने भारतीय दूर संचार विभाग की अपनी नौकरी में वो जब शिफ्ट में जाया करते थे, दोपहर की शिफ्ट में वो दो बजे के समाचार सुनकर ही निकलते थे । तब हिंदी समाचारों में देवकीनंदन पांडे और रामानुज त्रिपाठी (अगर मैंने सही नाम लिखा है तो) की कड़क आवाज़ें गूंजा करती थीं और अंग्रेज़ी समाचारों में बोरून हालदार जैसों की आवाज़ें । बैरीटोन वॉईस । दोपहर की चाय पीकर पापा दफ्तर चले जाया करते थे । मुझे हमेशा लगता था कि पापा इतने समाचार क्‍यों सुनते हैं । जिमी कार्टर जैसे नाम उस वक्‍त के समाचारों में सुने थे ।

पापा की दूसरी ख़ासियत रही अख़बारों से उनका अनुराग । घर में इंदौर वाला नईदुनिया आता था । और बहुत बचपन में मैं उसे ज़मीन पर बिछाकर उसे बैठकर एक एक अक्षर जोड़कर पढ़ता था और मां पापा से सैंकड़ों सवाल पूछा करता था क्‍योंकि कौड़ी भर कुछ समझ नहीं आता था । बस नये शब्‍द मिल जाते थे ।

एक बार पता न‍हीं टीचर की क्‍या बात अच्‍छी नहीं लगी, मैं चुपचाप बस्‍ता उठाकर घर आ गया । पापा घर पर थे, ये बात उन्‍हें पसंद नहीं आई, उन दिनों उनके पास सायकिल हुआ करती थी । फ़ौरन उन्‍होंने मुझे साइकिल पर बैठाकर स्‍कूल पहुंचाया और सिखाया, मैदान छोड़कर कभी भागना नहीं चाहिये समझे ।

ये पापा ही थे, जिन्‍होंने मुझे रेडियो में पहुंचाया । जी नहीं, मैं अपनी नौकरी की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि उन दिनों की बात कर रहा हूं जब मैं पहली कक्षा में था । भोपाल आकाशवाणी पर बाल सभा कार्यक्रम लाईव होता था । मां मुझे बाल कविताएं रटवाती थीं, चुटकुले याद करवाती थीं और पापा साइकिल पर मुझे आकाशवाणी ले जाते थे, रविवार की ये सुबह मेरे लिए उत्‍सव जैसी होती थी । मक़बूल हसन साहब और शायद पुष्‍पा सक्‍सेना मिलकर उस कार्यक्रम का संचालन करते थे । इसे ऑफ ब्रॉडकॉस्‍ट रिकॉर्ड कर लिया जाता था । बाद में जब हम बच्‍चे अपनी आवाज़ सुनते थे तो हैरत होती थी ।
उस समय पापा को भी नहीं पता था कि आगे चलकर रेडियो ही मेरा कार्यक्षेत्र बनेगा । पर शायद रेडियो के संस्‍कार मुझे पापा की उन्‍हीं कोशिशों से मिले ।

पापा की ख़ासियत ये रही कि वो कभी कड़क, आतंकित कर देने वाले पिता नहीं रहे, हमारी जायज़ नाजायज़ मांगों को उन्‍होंने अकसर मान लिया । जैसे कि कॉलेज की पढ़ाई के दौरान जब मुझे रेडियो से अनुराग हो गया और मैं रेडियो पर युववाणी करने लगा तो पापा ने मुझे प्रोत्‍साहन दिया । उनकी इच्‍छा के विरूद्ध जब मैंने physics में एम0एस0सी0 करने की बजाय हिंदी में एम0ए0 करने और रेडियो में जाने का फैसला किया तो उन्‍होंने थोड़े विरोध के बाद हामी भर दी । वरना वो मुझे विज्ञान के क्षेत्र में जाते देखना चाहते थे ।

कई मुद्दों पर तमाम असहमतियों के बावजूद पापा के प्रति मेरे मन में बहुत सम्‍मान रहा है । मुझे अपने पिता महान लगते हैं, जीवन में कई ऐसे मौक़े आए जब मैंने महसूस किया कि पापा की शख्सियत कितनी बुलंद है, उनके सिद्धांत कितने प्रबल हैं । बुंदेलखंड के एक गांव से निकलकर शहर में अपना शानदार करियर बनाने वाली पहली पीढ़ी के सदस्‍य हैं वो ।


पर कभी भी मैंने पापा से ये नहीं कहा कि मैं उन्‍हें कितना प्‍यार करता हूं ।
वो मेरे लिए एक बरगद के पेड़ जैसी एक आश्‍वस्‍त उपस्थिति हैं ।
किसी भी मुश्किल में मुझसे बस एक फ़ोन दूर ।

आज बहुत बहुत सारी पुरानी बातें याद आ रही हैं । पर उन्‍हें फिर कभी लिखूंगा ।
फिलहाल ये बता दूं कि आज पापा जबलपुर में रेडियो पर मेरे कार्यक्रम नियमित रूप से सुनते हैं और तमाम परिचितों को फ़ोन करके बताते भी हैं कि आज फ़लां ख़ास कार्यक्रम है, कल वो वाला कार्यक्रम है । और मुझे अच्‍छा लगता है । क्‍योंकि एक दौर था जब जिंदगी के सामने कोई मंजिल, कोई करियर नहीं था, तब मैंने पापा का विरोध करके अपने लिए एक चुनौतीपूर्ण रास्‍ता चुना था । उन्‍हें मुझ पर तो भरोसा था पर शायद ज़माने पर नहीं था और वो मेरे करियर को लेकर परेशान रहा करते थे ।

आज अच्‍छा लगता है कि मैं उनके सपनों को एक हद तक पूरा कर पाया हूं ।

फ़ादर्स डे मौक़ा है अपने पिता से अपने मन की बात कहने का-- आप भी कह डालिए । उन्‍हें अच्‍छा लगेगा ।

संस्‍कृत का एक श्‍लोक है—नारिकेल समाकारा दृश्‍यते खलु सज्‍जना: अन्‍ये बदरीकारा बहिरैव मनोहरा: । पिता का हृदय नारियल के समान भीतर से नाज़ुक होता है ।


और अब चलते चलते फिल्‍म संसार से एक ऐसा गीत, जिसमें एक पिता अपने बेटे से अपने मन की बातें कर रहा है । फिल्‍म है एक फूल दो माली । मन्‍ना डे की आवाज़ ।
कमाल का गीत है ये ।

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तुझे सूरज कहूं या चंदा तुझे दीप कहूं या तारा
मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा ।।

मैं कब से तरस रहा था, मेरे आंगन में कोई खेले
नन्‍हीं सी हंसी के बदले मेरी सारी दुनिया ले ले
तेरे संग झूल रहा है, मेरी बांहों में जग सारा
मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा ।।

आज उंगली थाम के तेरी तुझे मैं चलना सिखलाऊं
कल हाथ पकड़ना मेरा, जब मैं बूढ़ा हो जाऊं
तू मिला तो मैंने पाया, जीने का नया सहारा
मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा ।।

मेरे बाद भी इस दुनिया में, जिंदा मेरा नाम रहेगा
जो भी तुझको देखेगा, तुझे मेरा लाल कहेगा
तेरे रूप में मिल जाएगा, मुझको जीवन दोबारा
मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा ।।

तुझे सूरज कहूं या चंदा ।।





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Monday, May 7, 2007

इस रविवार को मैं मिला स्‍वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से
















जिंदगी में कुछ दिन बेहद यादगार बन जाते हैं । ऐसा ही यादगार बन गया कल यानी रविवार 6 मई 2007 का दिन । इस दिन आपके इस दोस्‍त को स्‍वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर से उनके निवास स्‍थान ‘प्रभुकुंज’ में जाकर मिलने का सौभाग्‍य मिला ।

विविध भारती के लिए लता जी से फोन पर रिकॉर्डिंग करने का सौभाग्‍य आपके इस दोस्‍त को पहले भी तीन बार मिल चुका है । एक बार पूरे एक साल पहले, जब नौशाद साहब नहीं रहे थे, ये पांच मई 2006 की बात है । जब मैंने नौशाद को श्रद्धांजलि देने वाला कार्यक्रम ‘फिर तेरी कहानी याद आई’ बनाने के दौरान लता जी को फोन लगाया था और कितनी भावुक हो गयी थीं वो नौशाद को याद करते हुए । विविध भारती के नियमित श्रोताओं को मेरी वो बातचीत याद होगी, जिसमें लता जी ने बहुत सारे अनमोल नग्‍मों और नौशाद साहब के साथ बीते यादगार क्षणों की चर्चा की थी ।

इससे पहले जब लता जी ने अपना पचहत्‍तरवां जन्‍मदिन मनाया
था तब भी मैंने विविध भारती पर ‘लता-मंजरी’ नामक दो घंटे का एक विशेष कार्यक्रम तैयार किया था
इसके लिए भी लता जी से पूरे आधे घंटे तक फोन पर बात की थी । इस बातचीत में लता जी ने अपने गानों के अलावा क्रिकेट के अपने शौक़, डायमंड डिज़ायनिंग की रूचि, फोटोग्राफी के अपने जुनून और इत्र यानी परफ्यूम के शौक़ के बारे में भी विस्‍तार से बताया था । अगर आपको ना मालूम हो तो आपको बता दूं कि लता जी को फोटोग्राफी, ज्‍वेलरी डिज़ायनिंग, परफ्यूम जमा करने और क्रिकेट का जबर्दस्‍त शौक़ है । और वे अपने गानों से ज्‍यादा इन विषयों पर बातें करना पसंद करती हैं । जब इस बातचीत में मैंने उनसे परफ्यूम गिफ्ट करने की उनकी आदत के बारे में पूछा था तो उन्‍होंने कहा था कि जब आप मेरे घर आयेंगे तो आपको भी एक परफ्यूम भेंट करूंगी । और मैं धन्‍य धन्‍य हो गया था ।



बहरहाल इसी शनिवार को पता चला कि रविवार शाम पांच बजे का समय लता जी ने दे दिया है । और हम सब पूरे तामझाम के साथ उनके घर पहुंचे । प्रभुकुंज प्रथम तल । पैडर रोड मुंबई । अजीब सी सनसनी हो रही थी, बेचैनी का आलम था । जाकर बैठे,
हृदयनाथ मंगेशकर जी के बेटे आदिनाथ ने हमें रिसीव किया । उनसे कुछ संगीत चर्चा हुई और उसके बाद साक्षात् स्‍वरों की देवी अवतरित हो गयीं । मैंने भी उनके चरण छुए और उन्‍होंने मेरे सिर पर हाथ रखा, लगा जीवन सफल हो गया है ।



बहुत बहुत सारी बातें कीं । दरअसल इतना ज्‍यादा रोमांच हुआ है कि अभी तक एक दिन बाद भी मैं उसे संभाल नहीं पा रहा हूं । क्‍या बताऊं क्‍या नहीं इसका फैसला करना मुश्किल है । लता जी ने बताया कि उन्‍होंने हिंदी और मराठी के अलावा बंगाली गाने बहुत सहजता से गाये हैं । बंगाली भाषा उन्‍हें बेहद प्रिय रही है । एक और खास बात जो
कही वो ये कि असल में वो शास्‍त्रीय गायिका बनना चाहती थीं, पर पिताजी के अचानक निधन और परिवार की जिम्‍मेदारियों के आ जाने से उन्‍हें फिल्‍मों में आना पड़ा । उन्‍होंने ये भी बताया कि उन्‍हें अपने गाये भजन बहुत पसंद हैं । और खासकर मीरा भजन

काफी पसंद हैं । गले की देखभाल वो‍ बिल्‍कुल नहीं करतीं ।

इसके आगे क्‍या कहूं, मैं समझ नहीं पा रहा हूं । आप मेरी और मेरे साथियों की खींची लता जी की तस्‍वीरें देखिये । लता जी ने जो ऑटोग्राफ दिये वो भी देखिये ।
और इसी आलेख में नीचे सुनिए लता जी के कुछ अनमोल नग्‍मे ।


चूंकि लता जी ने बांगला गानों का जिक्र किया है तो चलिये आज कुछ अनमोल बांग्‍ला गीत सुने जायें । मैंने वो गीत चुने हैं जो बाद में हिंदी में भी आये ।

जैसे ‘जा उरे जा पाखी’
यहां सुनिए ।


दूसरा गीत है—ना जियो ना,
यहां सुनिए ।






















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