तुझे सूरज कहूं या चंदा—फादर्स डे पर ये गीत और अपने मन की ढेर सारी बातें
प्रिय मित्रो
आज Fathers day है । हिंदी में कहें तो पितृ दिवस । कई लोग कहते हैं कि ये सब विदेशी संस्कृति के चोचले हैं । पर मुझे लगता है कि अगर ऐसे चोंचले हों तो वो अच्छे ही हैं ।
हमारे देश में त्रासदी ये रही है कि पिता घर में अधिकतर एक भयावह उपस्थित के तौर पर रहे हैं । कुछ पीढियों पहले तक पिता के प्रति एक सम्मानजनक आतंक रहा करता था, उनकी छबि ग़ुस्सैल और आंखें तरेरने वाले की होती थी । ऐसे परिवारों में बच्चों ने कभी अपने मन की बातें अपने पिता से नहीं कहीं । इसमें पिता का भी दोष रहा क्योंकि पिता ने एक आतंक कायम रखा, जो शायद अनुशासन का आतंक था या फिर ख़ानदानी तहज़ीब का । हालांकि इधर कुछ सालों से कई परिवारों में पिता और पुत्र के बीच आतंक का रिश्ता दोस्ती के रिश्ते में बदलता दिख रहा है जो एक सुखद बात है । बहरहाल आज फादर्स डे है । पिता के प्रति अपने जज़्बात के इज़हार का दिन । और वही मैं कर रहा हूं । मुझे आज बचपन के वो दिन याद आ रहे हैं जो मैंने भोपाल में
बिताए । पिता की वजह से रेडियो तब घर में एक अनिवार्य उपस्थित की तरह होता
था । मुझे याद है भारत संचार निगम लिमिटेड या पुराने भारतीय दूर संचार विभाग की अपनी नौकरी में वो जब शिफ्ट में जाया करते थे, दोपहर की शिफ्ट में वो दो बजे के समाचार सुनकर ही निकलते थे । तब हिंदी समाचारों में देवकीनंदन पांडे और रामानुज त्रिपाठी (अगर मैंने सही नाम लिखा है तो) की कड़क आवाज़ें गूंजा करती थीं और अंग्रेज़ी समाचारों में बोरून हालदार जैसों की आवाज़ें । बैरीटोन वॉईस । दोपहर की चाय पीकर पापा दफ्तर चले जाया करते थे । मुझे हमेशा लगता था कि पापा इतने समाचार क्यों सुनते हैं । जिमी कार्टर जैसे नाम उस वक्त के समाचारों में सुने थे ।
पापा की दूसरी ख़ासियत रही अख़बारों से उनका अनुराग । घर में इंदौर वाला नईदुनिया आता था । और बहुत बचपन में मैं उसे ज़मीन पर बिछाकर उसे बैठकर एक एक अक्षर जोड़कर पढ़ता था और मां पापा से सैंकड़ों सवाल पूछा करता था क्योंकि कौड़ी भर कुछ समझ नहीं आता था । बस नये शब्द मिल जाते थे ।
एक बार पता नहीं टीचर की क्या बात अच्छी नहीं लगी, मैं चुपचाप बस्ता उठाकर घर आ गया । पापा घर पर थे, ये बात उन्हें पसंद नहीं आई, उन दिनों उनके पास सायकिल हुआ करती थी । फ़ौरन उन्होंने मुझे साइकिल पर बैठाकर स्कूल पहुंचाया और सिखाया, मैदान छोड़कर कभी भागना नहीं चाहिये समझे ।
ये पापा ही थे, जिन्होंने मुझे रेडियो में पहुंचाया । जी नहीं, मैं अपनी नौकरी की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि उन दिनों की बात कर रहा हूं जब मैं पहली कक्षा में था । भोपाल आकाशवाणी पर बाल सभा कार्यक्रम लाईव होता था । मां मुझे बाल कविताएं रटवाती थीं, चुटकुले याद करवाती थीं और पापा साइकिल पर मुझे आकाशवाणी ले जाते थे, रविवार की ये सुबह मेरे लिए उत्सव जैसी होती थी । मक़बूल हसन साहब और शायद पुष्पा सक्सेना मिलकर उस कार्यक्रम का संचालन करते थे । इसे ऑफ ब्रॉडकॉस्ट रिकॉर्ड कर लिया जाता था । बाद में जब हम बच्चे अपनी आवाज़ सुनते थे तो हैरत होती थी ।
उस समय पापा को भी नहीं पता था कि आगे चलकर रेडियो ही मेरा कार्यक्षेत्र बनेगा । पर शायद रेडियो के संस्कार मुझे पापा की उन्हीं कोशिशों से मिले ।
पापा की ख़ासियत ये रही कि वो कभी कड़क, आतंकित कर देने वाले पिता नहीं रहे, हमारी जायज़ नाजायज़ मांगों को उन्होंने अकसर मान लिया । जैसे कि कॉलेज की पढ़ाई के दौरान जब मुझे रेडियो से अनुराग हो गया और मैं रेडियो पर युववाणी करने लगा तो पापा ने मुझे प्रोत्साहन दिया । उनकी इच्छा के विरूद्ध जब मैंने physics में एम0एस0सी0 करने की बजाय हिंदी में एम0ए0 करने और रेडियो में जाने का फैसला किया तो उन्होंने थोड़े विरोध के बाद हामी भर दी । वरना वो मुझे विज्ञान के क्षेत्र में जाते देखना चाहते थे ।
कई मुद्दों पर तमाम असहमतियों के बावजूद पापा के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान रहा है । मुझे अपने पिता महान लगते हैं, जीवन में कई ऐसे मौक़े आए जब मैंने महसूस किया कि पापा की शख्सियत कितनी बुलंद है, उनके सिद्धांत कितने प्रबल हैं । बुंदेलखंड के एक गांव से निकलकर शहर में अपना शानदार करियर बनाने वाली पहली पीढ़ी के सदस्य हैं वो ।
पर कभी भी मैंने पापा से ये नहीं कहा कि मैं उन्हें कितना प्यार करता हूं ।
वो मेरे लिए एक बरगद के पेड़ जैसी एक आश्वस्त उपस्थिति हैं ।
किसी भी मुश्किल में मुझसे बस एक फ़ोन दूर ।
आज बहुत बहुत सारी पुरानी बातें याद आ रही हैं । पर उन्हें फिर कभी लिखूंगा ।
फिलहाल ये बता दूं कि आज पापा जबलपुर में रेडियो पर मेरे कार्यक्रम नियमित रूप से सुनते हैं और तमाम परिचितों को फ़ोन करके बताते भी हैं कि आज फ़लां ख़ास कार्यक्रम है, कल वो वाला कार्यक्रम है । और मुझे अच्छा लगता है । क्योंकि एक दौर था जब जिंदगी के सामने कोई मंजिल, कोई करियर नहीं था, तब मैंने पापा का विरोध करके अपने लिए एक चुनौतीपूर्ण रास्ता चुना था । उन्हें मुझ पर तो भरोसा था पर शायद ज़माने पर नहीं था और वो मेरे करियर को लेकर परेशान रहा करते थे ।
आज अच्छा लगता है कि मैं उनके सपनों को एक हद तक पूरा कर पाया हूं ।
फ़ादर्स डे मौक़ा है अपने पिता से अपने मन की बात कहने का-- आप भी कह डालिए । उन्हें अच्छा लगेगा ।
संस्कृत का एक श्लोक है—नारिकेल समाकारा दृश्यते खलु सज्जना: अन्ये बदरीकारा बहिरैव मनोहरा: । पिता का हृदय नारियल के समान भीतर से नाज़ुक होता है ।
और अब चलते चलते फिल्म संसार से एक ऐसा गीत, जिसमें एक पिता अपने बेटे से अपने मन की बातें कर रहा है । फिल्म है एक फूल दो माली । मन्ना डे की आवाज़ ।
कमाल का गीत है ये । Get this widget | Share | Track details
तुझे सूरज कहूं या चंदा तुझे दीप कहूं या तारा
मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा ।।
मैं कब से तरस रहा था, मेरे आंगन में कोई खेले
नन्हीं सी हंसी के बदले मेरी सारी दुनिया ले ले
तेरे संग झूल रहा है, मेरी बांहों में जग सारा
मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा ।।
आज उंगली थाम के तेरी तुझे मैं चलना सिखलाऊं
कल हाथ पकड़ना मेरा, जब मैं बूढ़ा हो जाऊं
तू मिला तो मैंने पाया, जीने का नया सहारा
मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा ।।
मेरे बाद भी इस दुनिया में, जिंदा मेरा नाम रहेगा
जो भी तुझको देखेगा, तुझे मेरा लाल कहेगा
तेरे रूप में मिल जाएगा, मुझको जीवन दोबारा
मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा ।।
तुझे सूरज कहूं या चंदा ।।







