संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Saturday, August 1, 2009

यूं तेरी रहगुज़र से दीवानावार गुज़रे : मीनाकुमारी के अशआर उन्‍हीं की आवाज़ में ।

मैंने अभी कुछ दिन पहले की अपनी पोस्‍ट में कहा था कि गीता रॉय की याद कभी भी आ सकती है, वही वाक्‍य मीना आपा के लिए दोहराना चाहता हूं । मीना कुमारी की याद कभी भी आ सकती है । उनके लिए हम तारीख़ों के मोहताज नहीं । ख़ूबसूरत लोग अपने साथ अपनी पीड़ा लेकर भी आते हैं । दुनिया की लगभग सभी ख़ूबसूरत नायिकाओं और इतर महिलाओं को अपने हिस्‍से के संत्रास सहने पड़े और मीना आपा भी उनमें से एक हैं । आज अगर वो होतीं तो सतत्‍तर साल की होतीं और चांदी के रंग वाले बालों में उनका नूर भरा चेहरा कुछ और ही कहानी कहता । पर मीना आपा की जिंदगी बड़ी लेकिन संक्षिप्त होनी
थी । इसीलिए तो महज़ चालीस बरस की उम्र में उनकी कहानी खत्‍म हो गयी । कुछ कहानियां कभी खत्‍म नहीं होतीं । मीना आपा की कहानी भी ऐसी ही है ।



परदे पर उनके निभाए किरदारों के बीच भी पता नहीं क्‍यों मुझे लगता है कि उनका दुख चुपके से उनके चेहरे पर छलक पड़ता था । उनकी शायरी में उनकी निजी जिंदगी के सख्‍त अहसास उतर आए हैं । ख़ैयाम ने उनसे उनके ही कुछ अशआर गवाए थे । वैसे गुलज़ार ने उनकी शायरी की डायरी को संपादित करके प्रकाशित किया है ।

भाई शरद कोकास का इसरार है कि मीना आपा के जन्‍मदिन पर I Write I Recite नामक एलबम वाली पोस्‍ट को दोबारा प्रकाशित किया जाए । तो मैंने सोचा कि उसी अलबम से कुछ और सुना जाए इस बार । अभी यूट्यूब वीडियो लगा रहा हूं । जो एकाध दिन में मीडिया प्‍लेयर में बदल दिया जाएगा ।

कोई बताए कि जब मीना आपा गाती हैं तो उन्‍हें सुनकर मुझे लगता है ....
कोई सफेद लिबास पहने मर्सिया गा रहा है ।



यूं तेरी रहगुज़र से दीवानावार गुज़रे
कांधे पे अपने रखके अपना मज़ार गुज़रे
बैठे हैं रास्‍ते में दिल का खंडहर सजाकर
शायद इसी तरफ़ से एक दिन बहार गुज़रे
बहती हुई ये नदिया घुलते हुए किनारे
कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे
तूने भी हमको देखा, हमने भी तुझको देखा
तू दिल ही हार गुज़रा हम जान हार गुज़रे

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Monday, May 11, 2009

टुकड़े टुकड़े दिन बीता, धज्‍जी धज्‍जी रात मिली: मीनाकुमारी के अशआर उन्‍हीं की आवाज़ में ।

मीना कुमारी, एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ एक बेहद जज्‍़बाती शायरा भी थीं । ख़ूबसूरती और चमक-दमक से भरी दुनिया में वो एक बेहद सादा शख्सियत थीं । फिल्‍म-संसार की सबसे ख़ूबसूरत नायिकाओं का निजी जीवन बेहद त्रासद रहा है ।


सुरैया से शुरू करें---तो उनका अकेलापन इतना गहन था, कि सब कुछ बिखर जाने के बाद भी रोज़ाना सुबह वो घंटों आईने के सामने सजती रहतीं और एकदम लकदक होकर घर पर रहतीं । जबकि ना कोई मिलने आता और ना ही किसी का कोई फ़ोन आता था । मधुबाला का जीवन भी ख़ूबसूरती और संत्रास से घिरा हुआ था । परदे पर बेहद शोख़ और मुस्‍कानें बिखेरती मधुबाला निजी जीवन में बेहद टूटी हुई और अकेली थीं । आखिरी दिनों में कैंसर ने उनकी वो शक्‍ल बना दी थी कि वो खुद आईना देखने से डरती थीं ।


मीनाकुमारी की जिंदगी की कहानी किसी से छिपी नहीं है । जिंदगी से जो meenakumari-5b-1_1186978289 भी ज़ख़्म मिले, उन्‍होंने उन्‍हें अपनी शायरी में ढाल दिया । गुलज़ार ने मीना कुमारी की डायरी से चीज़ों को बहुत अनुरोध के बाद निकलवाकर एक संग्रह तैयार करवाया था । इस संग्रह को आप यहां से ख़रीद सकते
हैं ।

बहुत बरस पहले संगीतकार ख़ैयाम ने मीना कुमारी के कुछ अशआर स्‍वरबद्ध करके खुद उन्‍हीं से गवाए थे । इस संग्रह का नाम दिया गया “I write I recite” अगर आपका नज़दीकी म्‍यूजिक-स्‍टोर थोड़ा समझदार और तेज़ है तो वो ज़रूर आपको ये सी.डी.उपलब्‍ध करवा सकता है । वैसे ढूंढें तो संभवत: यूट्यूब पर आपको इनमें से कुछ रचनाएं मिल सकती हैं ।

बहरहाल मीना कुमारी की आवाज़ में उनकी एक ग़ज़ल ।

अवधि-चार मिनिट दस सेकेन्‍ड
संगीतकार-ख़ैयाम ।




टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्‍जी-धज्‍जी रात मिली
जिसका जितना आंचल था, उतनी ही सौग़ात मिली ।
जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली ।
मातें कैसी, घातें क्‍या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी फिर साथ मिली ।



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