दुनिया आज वैलेन्टाईन्स डे मना रही है इसलिए हमें रेडियोवाणी पर शरारत सूझी है । हमें पूरी उम्मीद है कि इस 'समझदार शरारत' में आपको भी लुत्फ आयेगा । दरअसल मुंबई के बौराए हुए नौजवानों को देखकर लगा कि क्यों ना 'वेल इन टाईम' इस गाने को आप तक पहुंचा दिया जाए । हम जो कहना चाहते हैं वो बराबर पहुंचेगा और वो भी बिना कहे ।
ये पोस्ट समर्पित है मशहूर शायर 'मखुदूम मोहीउद्दीन' को । आज उनकी लिखी ये नज़्म भले हम आपको सुनवा रहे हैं पर तमन्ना है उनके बारे में आपको कुछ जानकारियां देने की और उनके कुछ अशआर आप तक पहुंचाने की । देखते हैं कि इस लंबी पोस्ट में क्या क्या मुमकिन हो पाता है ।
मस्जिदों के मीनारों ने देखा उन्हें
मन्दिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हें
मयकदे की दरारों ने देखा उन्हें ।।
मखदूम मोहीउद्दीन का पूरा नाम था अबू सईद मोहम्मद मख़दूम मोहीउद्दीन हुज़री । उनका जन्म सन 1908 में आंध्रप्रदेश के क़रीब मेडक में हुआ था । जो उस ज़माने में हैदराबाद रियासत का हिस्सा हुआ करता था । सन 1936 में ओस्मानिया यूनिवर्सिटी से उन्होंने परास्नातक की डिग्री ली थी । सन 1943 में उन्होंने हैदराबाद में 'प्रगतिशील लेखक संघ' का गठन किया था । मख़दूम विविध-रंगी शायर थे । एक तरफ इंतिहा मुहब्बत का रंग उनकी शायरी में उतरा तो दूसरी तरफ मख़दूम ने क्रांति की शमां जलाई । इसीलिये मख़दूम शायर-ऐ-इंक़लाब के नाम से जाने जाते हैं । वे कम्यूनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे । 1946-47 में हुए तेलंगाना विद्रोह में मख़दूम ने अहम योगदान दिया था । सन 1969 में उनका निधन हो गया ।
मखदूम की कविताओं का संग्रह 'बिसात-ऐ-रक्स' (The Dance Floor) काफी मशहूर हुआ है । वैसे उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं पर एक निबंध भी लिखा था और जॉर्ज बर्नाड शॉ की नाटक Widowers' Houses का उर्दू अनुवाद किया था 'होश के नाख़ून' के नाम से । वैसे सन 1944 में उनकी कविताओं का एक संग्रह आ चुका था 'सुर्ख़-सवेरा' (The Red Dawn)और सन 1961 में उनकी किताब आई थी ' गुल-ऐ-तीर' (The Dewdrenched Rose).
मख़दूम पर चिट्ठों की दुनिया में पहले भी चर्चा हो चुकी है । नासिरूद्दीन ने अपने चिट्ठे ढाई आखर पर मख़दूम की यही नज़्म पेश की थी, कठिन उर्दू अलफ़ाज़ के मायने सहित । नीचे जो इबारत दी जा रही है उसका श्रेय भाई नासिरूद्दीन को ही जाता है । इसके अलावा नीरज रोहिल्ला ने अंतर्ध्वनि पर इसका ऑडियो भी चढ़ाया है । वहां भी पहुंचिएगा । पर चूंकि यहां हम मख़दूम के कई गीतों की बातें करने वाले हैं इसलिए शुरूआत इस नग़मे से की जा रही है । चलिए इस गाने को पढ़ें और सुनें ।