संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Thursday, June 28, 2007

‘मुझको इतने से काम पर रख लो’ चलिये सुनें गुलज़ार का सबसे रूमानी गीत, अलबम बूढ़े पहाडों पर ।


प्रिय मित्रो
कुछ दिन पहले मैंने आपको ‘बूढ़े पहाड़ों पर’ अलबम का शीर्षक गीत सुनवाया था और ये वादा किया था कि आगे चलकर इसी अलबम के अन्‍य गीतों का विश्‍लेषण भी प्रस्‍तुत करूंगा । इसलिए आज ऐसे ही एक गीत की बात जो मुझे गुलज़ार ही नहीं बल्कि तमाम गीतकारों के लिखे रूमानी गीतों में सबसे ज्‍यादा कल्‍पनाशील और नाज़ुक लगता है । मैं आपको पहले ही बताना चाहता हूं कि अगर ये गीत बहुत संभल के नहीं लिखा जाता तो फ़ौरन अश्‍लील हो सकता था ।

गुलज़ार वैसे भी बहुत क्रांतिकारी रूमानी गीत लिखने में उस्‍ताद रहे हैं । परंपरावादी लोग इसी मामले में गुलज़ार से चिढ़ते पाए जाते हैं । एक मशहूर शख़्स थे, मेरे सहकर्मी, उनसे अकसर मेरी बहस हो जाती थी, वो कहते—अमां ये भी कोई बात हुई, आपका पसंदीदा शायद आंखों की ‘महकती खुश्‍बू’ देख रहा है । आंखों में ‘महकते ख्‍वाब’ उसे नज़र आ रहे हैं । उसकी रात ‘सीली सीली बिरहा’ की है । रूपकों के मामले में इतना आवारा शायर मैंने नहीं देखा ।

और मुझे उन्‍हें छेड़ने में मज़ा आता था । मैं उन्‍हें अकसर गुलज़ार के किसी ना किसी नये-पुराने गाने के बहाने ‘छेड़’ देता था और फिर हमारी बहस शुरू हो जाती । जैसे कभी कह दिया कि वाह क्‍या गीत है ‘रोज़ रोज़ आंखों तले, एक ही सपना पले, रात का आंचल जले’ अहाहा क्‍या कल्‍पना है । बस बहस शुरू । परंपरावादी शायद क्रोधित और अपन खुश । कुछ साथी उस तरफ और कुछ मेरी तरफ । घंटा दो घंटा आराम से मानसिक जुगाली में कट जाता था । बहस के हथियार बनते थे शकील, मजरूह, राजेंद्र कृश्‍न जैसे गीतकारों के परंपरावादी क्‍लासिक गीत । मेरे पास गुलज़ार के गीतों का ज़ख़ीरा होता । कभी कहता ‘वाह वाह चप्‍पा चप्‍पा चरख़ा चले’ वाह क्‍या बात है । वो कहते, अमां ये कोई गीत है, चरख़ा कोई गीत में आने लायक़ चीज़ है । फिर कभी मैं कह देता, ‘सीली हवा छू गयी, गीला बदल जल गया, वाह क्‍या बात है’ आपने सुना ये गाना, और वो कहते—अमां गीला बदन भी कभी जलता है । अरे किस क़दर नामुराद है ये शायर । बहरहाल ये तो रही परंपरावादी लोगों के गुलज़ार की मिसालों से चिढ़ने की बात । इसी बहाने थोड़ा सा विषयांतर हो गया ।

आईये इसी गीत पर वापस आते हैं ।
इस गाने में गुलज़ार की कल्‍पना एक प्रेमी की शरारत भरी कल्‍पना है ।
लेकिन ये एक ऐसे प्रेमी की कल्‍पना है जो अपनी मेहबूबा को शिद्दत से प्‍यार करता है, और उसका बहुत बहुत ख्‍याल रखना चाहता है । पर आज का कोई ऐरा-ग़ैरा गीतकार होता तो इसे आसानी से अश्‍लीलता की हदों के पार ले जाता । तलवार की धार पर चलकर गुलज़ार ने इस गाने को बहुत प्‍यारी नाज़ुकी का जामा पहनाया है । और इस बात के लिए मैं गुलज़ार को सलाम करता हूं ।

अब इस गाने की धुन और गायकी की बात हो जाए ।

इस गाने की धुन को शुद्ध पश्चिमी धुन पर बनाया गया है । पर वाद्य रखे गये हैं शुद्ध भारतीय । कमाल का वाद्य संयोजन है विशाल भारद्वाज का । सितार का बेहतरीन इस्‍तेमाल किया गया है इस गाने के इंटरल्‍यूड में । ध्‍यान से सुनकर पहचानियेगा । और हां वायलिन से जो धुन रची गयी है इंट्रो और अंतरे में वो कमाल की है, उसके पीछे पीछे सितार आता है तो बड़ा प्‍यारा लगता है । छोटा सा गाना है, सुरेश वाडकर की गायकी का सही इस्‍तेमाल कितना कम हुआ है, ये गाना इस बात को साबित करता है । इसकी मिसाल सुनिए, किस तरह सुरेश हल्‍की सी मुस्‍कान या हंसी के साथ ‘मैं हाथ से सीधा करता रहूं उसको’ गाते हैं । वाह सुरेश साहब कमाल है । गाने के भावों को आपने गायकी से दृश्‍य में बदलके रख दिया है । अब आप इस गाने को सुनिए और बताईये कि कैसा लगा ये गाना ।


इस गाने को सुनने के लिए
यहां क्लिक कीजिए ।


मुझको इतने से काम पे रख लो
जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्‍टा हो जाये तो
मैं हाथों से सीधा करता रहूं उसको ।।


जब भी आवेज़ा, उलझे बालों में (नोट-शायद आवेज़ा कोई ज़ेवर होता होगा)
मुस्‍कुराके बस इतना सा कह दो
आह, चुभता है ये, अलग कर दो
मुझको इतने से काम पे रख लो ।।


जब ग़रारे में पांव फंस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
इक नज़र देख लो तो काफ़ी है
मुझको इतने से काम पे रख लो ।।


जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उलटा हो जाए तो
मैं हाथ से सीधा करता रहूं उसको ।।


आगे चलकर ‘बूढ़े पहाड़ों पर’ अलबम के कुछ और गानों की चर्चा की जाएगी ।

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Saturday, June 23, 2007

इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला---सुनिए गुलज़ार का रचा मेरा पसंदीदा ग़ैरफ़िल्‍मी गीत ।‍






प्रिय मित्रो
कुछ दिन पहले मैंने गुलज़ार की वो कॉमेन्‍ट्री आपको सुनवाई थी जो उनके सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब की शुरूआत में आती है । और मैंने आपसे अर्ज़ किया था कि मेरी नज़र में गुलज़ार का ये सबसे अच्‍छा एलबम है ।

आज मैं उस एलबम के शीर्षक गीत को लेकर आया हूं ।
आने वाले दिनों में इस अलबम के सारे गीतों की एक एक करके चर्चा की जायेगी ।

जहां तक मुझे लगता है कि गुलज़ार ने कश्‍मीर के आतंकवाद को अपनी नज़र से देखा है और इस ललित रचना के ज़रिए वहां को हालात का रूपक गढ़ा है ।

वो कहते हैं कि ‘इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला’ या आखिरी पंक्ति है---‘नानी की अगर मानें तो भेड़िया जिंदा है, जायेंगी अभी जानें, इन बूढ़े पहाड़ों पर ।‘

यानी गुलज़ार कहते हैं कि ये आतंकवाद का भेड़िया है जिसने चिनारों पर आग लगा रखी है और जो सब कुछ तबाह कर रहा है ।

इस गाने को सुनवाने से पहले आपको ये भी बताना चाहता हूं कि इस गीत को सुरेश वाडकर ने गाया और स्‍वरबद्ध किया विशाल भारद्वाज ने । हैरत की बात ये है कि सन 1997 में यानी आज से दस साल पहले निकले इस कैसेट की कोई पब्लिसिटी नहीं हुई । ना ही कंपनी ने आगे चलकर इसे दोबारा लॉन्‍च करने की ज़हमत उठाई । मैंने कहीं किसी को भी इसका जिक्र करते नहीं सुना है ।

अब इसके संगीत की बात ।
विशाल ने इस गाने को बिल्‍कुल एक बैले की तरह बनाया है ।
दिलचस्‍प बात आपको बता दूं कि मेरे छोटे भाई ने इस गाने को लेकर अपने कॉलेज के दिनों में वाक़ई एक बैले किया था और उसका वो बैले अच्‍छा जमा था ।


इस गीत में तीन आवाज़ें आती हैं । कोरस की आवाज़, गायक सुरेश वाडकर की आवाज़ और गुलज़ार की कॉमेंट्री एक सूत्रधार की तरह ।

आप पायेंगे कि हर अंतरे की पहली पंक्ति कोरस गाता है और उसे अधूरा छोड़ देता है, फिर उसे सुरेश वाडकर उठाते हैं ।

इस गीत के संगीत में एक ख़ास तरह की रवानी है । बेहद नाज़ुक रिदम का इस्‍तेमाल किया गया है । और कोरस इतना गाढ़ा और नरम है कि सीधे दिल में उतर जाता है । मेरा दिल ख़ामोश ख़ामोश और ख़ाली ख़ाली सा हो जाता है इस गाने को सुनकर ।
योग के गुरू कहते हैं कि ऐसा बहुत देर योग करने के बाद होता है ।

इस गीत में विशाल ने रबाब का भी बेहतरीन इस्‍तेमाल किया है । कहानी की तरह बुने इस गीत का संगीत वो धीरे धीरे चरम पर ले जाते हैं । और सुरेश वाडकर की आवाज़ यू लगती है मानो एक सफेद बर्फ़ जैसी दाढ़ी वाला सूफ़ी फ़क़ीर अपने चिमटे को बजाता हुआ बस्‍ती से गुज़र रहा हो । मानो सदियों से ये सूफ़ी बूढ़े पहाड़ों पर फिर रहा है । और उसने देखा है कि पहाड़ों पर सदियां बर्फ़ हुई पड़ी हैं ।

आप भी सुनिए और लुत्फ उठाईये ।
बस इतना निवेदन है कि जल्‍दीबाज़ी में इस गीत को मत सुनिएगा जब वक्‍त हो तो तसल्‍ली से सुनिए और इसमें डूब कर देखिए ।

इस गाने को सुनने के लिए
यहां क्लिक कीजिए



बांसुरी की एक गहन तान और फिर गुलज़ार की आवाज़

इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला ।।


इन बूढ़े पहाड़ों पर
इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला ।
सदियों से गिरी बर्फ़ें
और उनपे बरसती हैं हर साल नई बर्फ़ें

घर लगते हैं क़ब्रों से, घर लगते हैं क़ब्रों से,
ख़ामोश सफेदी में
कुतबे से दरख्‍तों के,

ना आब था, ना दाने
अलग़ोज़ा की वादी में
भेड़ों की गई जानें ।

शानदार पहाड़ी बांसुरी की तान और फिर गुलज़ार की आवाज़

कुछ वक्‍त नहीं गुज़रा नानी ने बताया था
सरसब्‍ज़ ढलानों पे बस्‍ती थी गड़रियों की
और भेड़ों के रेवड़ थे ।

ऊंचे कोहसारों के
ऊंचे कोहसारों के गिरते हुए दामन में
जंगल हैं चनारों के
जंगल हैं चनारों के
जंगल हैं चनारों के

सब लाल से रहते हैं
सब लाल से रहते हैं,
जब धूप चमकती है
कुछ और दहकते हैं ।

हर साल चनारों में
हर साल चनारों में
एक आग के लगने से
मरते हैं हज़ारों में
इन बूढ़े पहाड़ों पर


इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला
इन बूढ़े पहाड़ों पर

इसके बाद ग्रुप वायलिन की हल्‍की तान और फिर गुलज़ार की आवाज़

चुपचाप अंधेरे में अकसर उस जंगल से
एक भेडिया आता था एक भेड़ उठाकर वो ले जाता था रेवड़ से
और सुबह को जंगल में बस खाल पड़ी मिलती

( यहां आने वाली रबाब और रिदम का अनोखा संयोजन ज़रूर सुनिए)


हर साल उमड़ता है
हर साल उमड़ता है,

दरियाओं पे बारिश में
एक दौरा सा पड़ता है


सबको तोड़ गिराता है जाता है
संदलाख चट्टानों से
वो सर टकराता है
तारीख़ का कहना है
रहना है चट्टानों को
दरियाओं को बहना है

अब के तुग़यानी में कुछ डूब गये गांव
कुछ गल गये पानी में
चढ़ती रही कुर्बानी
अलग़ोज़ा की वादी में
भेड़ों की गयी जानें

हल्‍के रबाब के पीछे गुलज़ार की आवाज़


फिर सारे गड़रियों ने उस भेड़िये को ढूंढा और मार के लौट आए
उस रात एक जश्‍न हुआ और सुबह को जंगल में
दो और मिली खालें


बांसुरी और बेहतरीन रिदम के बीच कोरस उठाता है अगला अंतरा ।

नानी की अगर मानें
नानी की अगर मानें
तो भेड़ि‍या जिंदा है
जायेंगी अभी जानें
जायेंगी अभी जानें
इन बूढ़े पहाड़ों पर
कुछ भी तो नहीं बदला ।।

इन बूढ़े पहाड़ों पर ।।







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