संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Thursday, February 13, 2014

हम देखेंगे...लाजिम है कि हम भी देखेंगे--इकबाल बानो की आवाज़.

आज हमारे प्रिय शायर फ़ैज़ की याद का दिन है।
'फ़ैज' एक बीहड़ जिंदगी जीने वाले शायर। कितना बड़ा है उनकी लेखनी का कैनवस। उनकी पैदाइश को एक सौ तीन साल पूरे हुए।  इस दौरान दुनिया बहुत बदल गयी। तकनीक जिंदगी और समाज पर हावी हो गयी। सरोकार तरल होते चले गये। और फ़ैज़ की ज़रूरत और सांद्र होती चली गयी। उनके अशआर का वज़न सघन होता गया।  

रेडियोवाणी पर हमने 'फ़ैज़' को अकसर याद किया है। एक दिलचस्‍प बात आपको बतायें। शायद 'ग़ालिब' के बाद 'फ़ैज़' ऐसे शायर रहे हैं जिन्‍हें ख़ूब गाया गया है। नैयरा नूर, इकबाल बानो, उ. बरक़त अली ख़ां, हरिहरन, मेहदी हसन, टीना सानी, गुलाम अली, आशा भोसले जैसे कितने कितने फ़नकारों ने उन्‍हें अपनी आवाज़ बख्शी। और तकरीबन सबकी आवाज़ में फ़ैज़ को सुनना अच्‍छा लगता है। फ़ैज़ की याद में आज उनकी एक सबसे मशहूर नज़्म 'हम देखेंगे'। इक़बाल बानो की आवाज़ में। इसकी इबारत हमने 'कविताकोश' के
इस पन्‍ने से ली है। ललित और उनकी टीम का शुक्रिया।

Nazm: Hum Dekhenge
Shayar: Faiz Ahmed Faiz
Singer: Iqbal Bano
Duration: 11 19



हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल[1] में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2]
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम [3]
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर[4] भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

शब्दार्थ

  1. सनातन पन्ना
  2. घने पहाड़
  3. पवित्रता या ईश्वर से वियोग
  4. देखने वाला
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Tuesday, August 11, 2009

कब याद में तेरा साथ नहीं : संगीतकार ख़ैयाम की गाई एकमात्र ग़ज़ल

रेडियोवाणी पर जगजीत कौर का जिक्र पहले भी हुआ है। जगजीत कौर ने ज्‍यादा गाने नहीं गाए हैं, लेकिन इतने-कम गानों के बावजूद उनके चाहने वाले उनके गाने खोज-खोजकर सुनते हैं । जगजीत जी के गानों की फेहरस्ति आप यहां देख सकते हैं । सभी सुधि-श्रोता और पाठक जानते हैं कि जगजीत कौर संगीतकार ख़ैयाम की शरीके-हयात हैं । संगीतकार ख़ैयाम फिल्‍म-जगत के बेहद ज़हीन संगीतकारों में से एक हैं । उन्‍होंने इतने लंबे सफ़र में कभी अपने काम से समझौता नहीं किया ।

पिछले दिनों रेडियोवाणी पर लगे 'सी-बॉक्‍स' पर गुजरात के हमारे सुधि-पाठक और श्रोता khaiyyam2 मलय का संदेसा आया कि क्‍या आपके पास संगीतकार ख़ैयाम का गाया कोई गीत या ग़ज़ल आपके पास है । ज़ाहिर है कि इसका जवाब 'नहीं' में ही था । जिसके बदले में उन्‍होंने मुझे एक लिंक भेजी और पता चला कि HMV ने ख़ैयाम साहब का जो the golden collection नामक अलबम जारी किया है उसमें ये ग़ज़ल शामिल है ।आपके पास है । ज़ाहिर है कि इसका जवाब 'नहीं' में ही था । जिसके जवाब में उन्‍होंने मुझे एक लिंक भेजी और पता चला कि HMV ने ख़ैयाम साहब का जो the golden collection नामक अलबम जारी किया है उसमें ये ग़ज़ल शामिल है । ये सन 1986 में बनी मुज़फ्फ़र अली की फिल्‍म 'अंजुमन' के लिए रिकॉर्ड की गयी थी । पर शायद कभी रिलीज़ नहीं हो सकी । इस फिल्‍म के गाने आप यहां सुन सकते हैं । आपको वो गाना भी सुनाई देगा जिसे भूपिंदर सिंग और शबाना आज़मी ने गाया है । यहां ये जिक्र करते चलें कि ख़ैयाम ने अपने शुरूआती दौर में कई फिल्‍मी गीत गाए हैं।

( ऊपर की तस्‍वीर में ख़ैयाम जगजीत कौर और बीचोंबीच हैं साहिर लुधियानवी...कह नहीं सकते कि 'कभी-कभी' की रिकॉर्डिंग की तस्‍वीर है या फिर 'शगुन' के गानों की रिकॉर्डिंग के दौरान ली गयी तस्‍वीर )

रेडियोवाणी पर जल्‍दी ही आपको ये सभी गाने सुनवाए जा सकते हैं । बहरहाल....ख़ैयाम
photo12 साहब की आवाज़ सुनकर सुखद-आश्‍चर्य हुआ । और 'मधुशाला' की मन्‍नाडे की गाई वो पंक्ति याद आ गयी...'और और की रटन लगाता जाता हर पीने वाला' । अशआर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के हैं । ये ऐसी ग़ज़ल है जो आपके ज़ेहन में बस जायेगी । ( तस्‍वीर में ख़ैयाम और जगजीत कौर )

यहां सुनिए। 








कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं
सद-शुक्र* के अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं   *
सौ बार शुक्र
मैदाने-वफ़ा दरबार नहीं, यां नामो-नसब* की पूछ कहां     *नाम और वंश
आशिक़ तो किसी का नाम नहीं, कुछ इश्‍क़ किसी की ज़ात नहीं
जिस धज से कोई मक्‍तल* में गया, वो शान सलामत रहती है  
*फांसी या बलि देने की जगह
ये जान तो आनी-जानी है, इस जां की तो कोई बात नहीं
गर बाज़ी इश्‍क़ की बाज़ी है, जो चाहे लगा दो डर कैसा

गर जीत गए तो क्‍या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

इस ग़ज़ल से जुडी इंटरनेटी खोजबीन में कुछ और चीज़ें मिली हैं । ये एक वीडियो प्रेजेन्‍टेशन है जिसे किसी ने इस ग़ज़ल को यू-ट्यूब पर उपलब्‍ध करवाने के लिए बनाया है ।




और ये है इसी ग़ज़ल का एक और संस्‍करण जिसे उस्‍ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ां साहब ने गाया है । ये भी यूट्यूब से कबाड़ा गया है ।


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