संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Wednesday, September 12, 2007

सचिन देव बर्मन की पत्नी मीरा देव बर्मन की दुर्दशा

रेडियो के एक प्रेमी हैं सुजॉय । बड़ी मशक्‍कत से याहू के विविध-भारती नामक गुप्‍स पर रेडियो के कुछ कार्यक्रमों को ट्रान्‍सक्रिप्‍ट करते हैं । इसके अलावा सुजॉय रेडियो और संगीत से जुड़े विमर्श के लिए भी तत्‍पर हैं । तकनीकी-दुनिया में व्‍यस्‍त होने के बावजूद सुजॉय की तत्‍परता कमाल की है । एक दो दिन पहले सुजॉय का ये संदेस मेल मुझे ऑरकुट पर मिला --

Her lineage belies the secluded life she is leading now.
Octogenarian Meera Deb Burman, the wife of legendary Bollywood music
maestro Sachin Deb Burman, is passing unhappy days at an old-age home
in Mumbai.

Once an accomplished singer and dancer herself, Meera was shifted by
S D Burman's daughter-in-law Asha Bhosle to 'Sharan', an old-age home
for the rehabilitation of paraplegics in Mumbai's Vashi area, about
seven months ago, knowledgeable sources say.

"I shall die in the old-age home. I will not go anywhere, although I
am not happy here," Meera, 84, was quoted as saying by her relative
Shukla Dasgupta who recently visited her.

पढ़कर मन खिन्‍न हो गया । फिर आज मुंबई के नवभारत टाईम्‍स में मीरा जैन की ये रिपोर्ट छपी दिखी ।

सुरों के जादूगर और संगीत के कुशल चितेरे एस डी बर्मन की भूली-बिसरी पत्‍नी मीरा देव बर्मन को आज सम्‍मान तलाश रहा है । वह भी ऐसे समय जब वो नवी मुंबई के एक वृद्धाश्रम में अपनी पुरानी यादों के सहारे दिन बिताने को मजबूर हैं । त्रिपुरा सरकार के प्रतिनिधि इसी सप्‍ताह उनका सम्‍मान करने और उन्‍हें एक लाख रूपये का चेक भेंट करने के लिए खासतौर पर मुंबई पहुंच रहे हैं ।

सफल संगीतकार राहुलदेव बर्मन की मां मीरा देव बर्मन को भी संगीत में महारत हासलि थी, ये बात बहुत कम लोग जानते हैं । 1970 तक आते आते बर्मन दा की सेहत जवाब दे गयी थी और वे बिस्‍तर से ही संगीत निर्देशन देते थे । इस समय बेटे को मां की प्रतिभा याद आई और पंचम ने ही अपनी मां को एस डी बर्मन की मुख्‍य सहायक संगीत निर्देशक बनाया ।

1971 से 1975 तक हिंदी फिल्‍मों को मीरा देव बर्मन के संगीत की जानकारी का लाभ मिला । 1971 में 'तेरे मेरे सपने' से शुरू हुआ मीरा देव बर्मन का संगीत सफर अभिमान,मिली,चुपके चुपके तक लोकप्रियता के पायदान चढ़ता गया । अभिमान के कर्णप्रिय संगीत और सार्थक शब्‍दों से सजे गीतों ने जनता को मोह लिया । मीत ना मिला रे मन का,नदिया किनारे हिराय आई कंगना,तेरे मेरे मिलन की ये बेला जैसे गीत उस समय बेहद कामयाब रहे थे । दूसरी तरफ मिली का गीत 'बड़ी सूनी सूनी है ये जिंदगी' ने भी अपना असर कायम किया । गायक संगीतकार और नर्तकी मीरा के साथ सचिन दादा का विवाह 1938 में हुआ था । इसके एक साल बाद ही राहुल देव बर्मन यानी पंचम का जन्‍म हुआ । मात्र नौ साल की उम्र में राहुल ने इस बात का अहसास सचिन दा को करा दिया था कि वे उनके सही उत्‍तराधिकारी हैं । उन्‍हत्‍तर साल की उम्र में पंचम दुनिया को छोड़ गये और उनकी मां मीरा का सूनापन गहरा कर गए ।

कुछ दिनों पहले मीरा की बहू और जानी मानी गायिका आशा भोसले ने नवी मुंबई के एक वृद्धाश्रम 'शरण' को उनका बसेरा बना दिया । जीवन की इस सूनी शाम में उनके गृह-प्रदेश त्रिपुरा की सरकार ने ना केवल 95 वर्षीय इस वृद्धा की सुध ली बल्कि उनका सम्‍मान करने का भी फैसला किया है । इसी इरादे के से त्रिपुरा के सांस्‍कृतिक और पर्यटन मंत्री अनिल सरकार और विभागीय निदेशक सुभाष दास चौदह तारीख को मुंबई पहुंचेगे ।


फिल्‍म-संसार की जानी-मानी हस्तियों का बुढ़ापा किस क़दर त्रासद हो जाता है । इसकी एक बानगी ये खबर पेश करती है ।
कुछ दिनों पहले मैंने रेडियोवाणी पर संगीतकार रामलाल और संगीतकार इक़बाल कुरैशी के बारे में आपको बताया था
कि कैसे वो मुफलिसी के दौर से गुजरते हुए इस दुनिया से चले गये । मुबारक बेगम और शमशाद बेगम जैसी गायिकाएं आज गुमनाम जिंदगी बिता रही हैं ।

क्‍या संगीत के प्रशंसकों का फ़र्ज़ नहीं बनता कि संगीत की दुनिया की इन नामी हस्तियों के बुढ़ापे को सुधारने के लिए कुछ किया जाये । बस इस छोटे से लेकिन अहम सवाल को आप तक पहुंचाना था ।

और अंत में एस डी बर्मन का वो गीत जो कई महीनों पहले इसी ब्‍लॉग पर चढ़ाया गया था ।
एक बार फिर--जीवन दर्शन देखिए इस गीत का ।

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जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप

बीती हुई रातों की बातों की तू छाया

छाया वो जो बनेगी धूप ।। जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप ।।

कभी तेरी किरणें थीं ठंडी ठंडी हाय रे

अब तू ही मेरे जी में आग लगाये

चांदनी ऐ चांदनी तेरे हैं दो रूप ।। जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप ।।

आते जाते पल क्‍या हैं समय के ये झूले हैं

बिछड़े साथी कभी याद आये कभी भूले हैं

आदमी ऐ आदमी तेरे हैं दो रूप ।।

कोई भूली हुई बात मुझे याद आई है

खुशी भी तू लाई थी और आंसू भी तू लाई है

दिल्‍लगी ऐ दिल्‍लगी तेरे हैं दो रूप

कैसे कैसे वादों की तू यादों की तू छाया

छाया वो जो बनेगी धूप ।। जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप ।।


ये गीत आनंद बख्‍शी ने लिखा है । सन 1972 में आई फिल्‍म जिंदगी जिंदगी के लिए ।

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Wednesday, June 27, 2007

आर.डी.बर्मन के जन्‍मदिन पर गुलशन बावरा के संस्‍मरण और उनके कुछ बेहतरीन गीत




आज राहुल देव बर्मन का अड़सठवां जन्‍मदिन है ।
इस अवसर पर मैं उनके स्‍वरबद्ध किये और अपने पसंदीदा कई गीत यहां प्रस्‍तुत कर सकता था और बहुत सारी बातें लिख सकता था ।
लेकिन दो दिन पहले टाइम्‍स ऑफ इंडिया के मुंबई संस्‍करण में गुलशन बावरा के संस्‍मरण छपे हैं । जिनमें उन्‍होंने बहुत ही शिद्दत से पंचम को याद किया है । इन्‍हीं संस्‍मरणों के कुछ अंश और साथ में वो गीत भी जिनका यहां ज़िक्र आया है ।


गुलशन बावरा कहते हैं---
तेरह साल हो गये हैं राहुल देव बर्मन को गये । जिन्‍हें हम सब दोस्‍त पंचम के नाम से पुकारते थे । मैं मानने को तैयार नहीं हूं कि वो इस दुनिया से चला गया, वो यहीं है, हर पल हमारे साथ है । मैंने उन्‍नीस साल की रचनात्‍मक यात्रा की थी पंचम के साथ । 1974 से लेकर 1993 तक हर साल पंचम दा और आशा जी सत्‍ताईस जून को हमारे घर आते थे और मेरी पत्‍नी अंजू के साथ पंचम का जन्‍मदिन बिताते थे । पर 1994 के बाद ये सिलसिला थम गया ।

मेरे पास कई ऐसे टेप हैं, जिनमें हमारी औपचारिक बातचीत, लड़ाई झगड़े, विवाद, हंसी मज़ाक़ सब कुछ रिकॉर्ड है । जब भी पंचम की याद आती है मैं ये टेप सुन लेता हूं और यक़ीन मानिए आंखें भर आती हैं ।

इन रिकॉर्डिग्‍स के ज़रिए ही मुझे ये विचार आया कि क्‍यों ना पंचम को ऐसी श्रद्धांजली दूं कि ज़माना याद करे । एक ऐसा अलबम तैयार करूं, जिसमें ना केवल पंचम के शानदार गाने हों बल्कि हमारी रचनात्‍मक बातचीत भी हो ।

हम दोनों जिंदगी को भरपूर जीने में यकीन रखते थे । पंचम के और मेरे घर के दरम्‍यान तीन किलोमीटर का फ़ासला था । मेरे बेडरूम से उसका बेडरूम नज़र आता था ।

मैं आपको एक राज़ की बात बताऊं । पंचम बहुत अच्‍छा खाना बनाता था । यहां तक कि मेरी पत्‍नी अंजू से उसने कई पकवान बनाने सीखे । उसे हमारे घर का सरसों का साग बहुत पसंद था ।

मुझे याद है एक दिन वो कोई नई डिश आज़मा रहा था । वो खाना बनाते हुए चम्‍मच भी बजा रहा था और अपनी कोई धुन गुनगुना रहा था । बजाते हुए मुझसे बोला—लोग जलतरंग बजाते हैं, मैं चमचा तरंग बजा रहा हूं । आपको पता है, किचन में बजाई इसी धुन पर उसने ये गाना बनाया था । फिल्‍म थी सनम तेरी क़सम ।




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फिल्‍म शोले के लिये गब्‍बर सिंह की थीम तैयार की जा रही थी । इसे तांबे के एक पॉट से निकाला गया था । बर्तन के बीच वाले हिस्‍से में पानी उड़लते वक्‍त वहां कुछ नलियां रखी गयी थीं जो अजीब अजीब सी आवाज़ करती थीं । पानी उड़ेलने के इस प्रयोग को पंद्रह बीस बार दोहराने के बाद पंचम को वो ध्‍वनि मिल गयी, जिसकी उसे चाहत थी । और फिर उसे दूसरे पश्चिमी वाद्यों के साथ मिक्‍स करके बनी गब्‍बर की थीम ।



फिल्‍म अब्‍दुल्‍ला में उसे रेगिस्‍तान की हवाओं की आवाज़ चाहिये थी । इसके लिए उसने एक खोखले बांस पर ग़ुब्‍बारा बांधा और उसमें से हवा धीरे धीरे छोड़ी । इस तरह वो आवाज़ निकली ।

फिल्‍म खुश्‍बू के गाने ‘ओ मांझी रे’ के लिए उसे नाव की चप्‍पू की आवाज़ चाहिये थी । पंचम ने कई बोतलों में पानी भरा, किसी में ज्‍यादा किसी में कम । और उनमें फूंक मारी । इससे उसे नाव पर नदी की लहरों के थपेड़े की आवाज़ मिली ।




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एक बार किसी गाने के लिए उसे बारिश की बूंदों की आवाज़ चाहिये थी । पंचम ने इसके लिए पूरी रात अपने घर की बालकनी में बिताई और बारिश की आवाज़ रिकॉर्ड करता रहा, जब तक कि उसे अपना मनपसंद साउंड नहीं मिल गया ।

फिल्‍म पड़ोसन के इस गाने के लिए उसने ना जाने कितने बर्तन खटकाये थे ।





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फिल्‍म यादों की बारात के इस गाने में भी बोतलों और कांच के‍ ग्‍लास का इस्‍तेमाल किया गया है ।

यहां देखिए






यहां सुनिए । यहां आप आर.डी.बर्मन की आवाज़ भी सुन सकते हैं ।




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आर.डी.बर्मन और आशा भोसले के एक कंसर्ट का वीडियो






और चलते चलते आपको ये बताना है कि आज धिन गाना प्‍लेयर पर मैंने आर.डी.बर्मन के कुछ गाने चढ़ाए हैं । ये प्‍लेयर इस चिट्ठे पर ऊपर बाईं ओर है ।
अब आप बताईये क्‍या आप आर.डी. बर्मन के बारे में कुछ कहना चाहते हैं ।

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Monday, June 25, 2007

फिर वही शाम वही ग़म---संगीतकार मदन मोहन के जन्‍मदिन पर बताईये उनके कौन से गाने आपको पसंद हैं और क्‍यूं





आज संगीतकार मदनमोहन का जन्‍मदिन है । आज अगर वो जीवित होते तो तिरासी साल के हो जाते । मदनमोहन एक अनमोल संगीत विरासत छोड़ गये हैं । उनके जीवन के बारे में बातें फिर कभी होंगी । पर आज मैंने ये सोचा है कि मदनमोहन के कुछ गीत आपको सुनवाऊं और दिखाऊं । और साथ में आपसे ये भी पूछूं कि आपको मदनमोहन के कौन कौन से गाने बहुत प्रिय हैं । और क्‍यों । आपकी टिप्‍पणियों को संयोजित करके एक नई पोस्‍ट में प्रस्‍तुत करने की मेरी योजना है । जो लोग अंग्रेज़ी में टिप्‍पणियां करते हैं वो नि:संकोच अपनी बात लिखें मैं उसे हिंदी में प्रस्‍तुत कर दूंगा । देखना ये है कि इन गानों के बहाने आप अपने जीवन की क्‍या क्‍या बातें याद करते हैं । इन सबके साथ मुझे अपनी बातें भी कहनी हैं । पर अगली पोस्‍ट में । फिलहाल सुनिए और देखिए मदनमोहन के दो अनमोल गाने । साथ में हैं कुछ अनमोल तस्‍वीरें ।

ये लता जी का गाया फिल्‍म अनपढ़ का गीत । आपको याद होगा नौशाद ने मदनमोहन से कहा था कि अनपढ़ के दो गाने मुझे दे दो और मेरा सारा संगीत ले लो ।

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इस गाने को आप यहां देख सकते हैं



ये है तलत महमूद का गाया मदन मोहन का एक अनमोल नग़्मा ।

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इस तस्‍वीर में बांई ओर तलत महमूद हैं और दाहिनी ओर हैं मदनमोहन । बीच में जो महाशय हैं उन्‍हें मैं पहचान नहीं पाया ।
इस गाने को आप यहां देख सकते हैं ।


मदनमोहन के गानों की संक्षिप्‍त सूची आप यहां देख सकते हैं

उनकी फिल्‍मों की सूची और उनका लाइफ स्‍केच यहां है

अब आपको अपनी पसंद के गानों को चुनने में देर नहीं लगेगी

मदनमोहन और लता की जोड़ी के गीत आज मैंने अपने ब्‍लॉग पर धिनगाना प्‍लेयर पर भी चढ़ाए हैं । धिनगाना प्‍लेयर इस चिट्ठे पर बांये ऊपर की तरफ है ।




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Saturday, June 9, 2007

आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें—क्‍या आपको पता है कि कल दुनिया से चले गये संगीतकार दत्‍ताराम

संगीतकार दत्‍ताराम का शुक्रवार को निधन हो गया । मुझ समेत कई लोगों को पता ही नहीं था कि दत्‍ताराम जी जीवित हैं और गोवा के Bicholim तालुका के maulinguem में एक ख़ामोश जिंदगी बिता रहे हैं । कल जब विविध भारती में ये ख़बर आई तो तुरंत गोवा फ़ोन लगाकर इसकी पुष्टि की गई । अगर आप फिल्‍म-संगीत और उसके विवरणों को गहराई से परखते आए हैं तो दत्‍ताराम के नाम से ही आपके ज़ेहन में कुछ अनमोल गाने तैर जाने चाहिये ।
जैसे राग कल्‍याण पर आधारित फिल्‍म पर‍वरिश का गीत—
आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें कोई उनसे कह दे हमें भूल जाएं ।



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या फिर अब दिल्‍ली दूर नहीं फिल्‍म का गीत—
चुन चुन करती आई चिडिया, दाल का दाना लाई चिडिया ।


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या फिर फिल्‍म प‍रवरिश का ये गीत—
मस्‍ती भरा है समां

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इंटरनेट पर जाने माने लेखक और स्‍तंभकार फ्रेडरिक नोरोन्‍हा का एक लेख मिला, ये लेख उन्‍होंने दत्‍ताराम को खोज निकालने के बाद लिखा था । यहां प्रस्‍तुत की जा रही जानकारियां उसी लेख से ली गयी हैं ।

संगीतकार दत्‍ताराम का पूरा नाम था दत्‍ताराम वाडकर । वैसे तो अपनी पेशेवर जिंदगी में सन 1948 से लेकर 1974 तक वो महान संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन के सहायक रहे, पर बीच बीच में उन्‍होंने स्‍वतंत्र संगीतकार के रूप में भी फिल्‍में कीं । कुल उन्‍नीस फिल्‍मों में उन्‍होंने स्‍वतंत्र रूप से संगीत दिया था । इन फिल्‍मों के गीत तो लोग आज भी गुनगुनाते हैं पर किसी को ये ख़बर नहीं रही कि इन्‍हें बनाने वाला संगीतकार आज जीवित भी है या नहीं और अगर है तो किस हाल में है ।


दत्‍ताराम ने एक मराठी फिल्‍म में भी संगीत दिया था, प्रमाची सवली नाम इस फिल्‍म में जाने माने क्रिकेटर सुनील गावस्‍कर ने अभिनय किया था ।

शंकर जयकिशन के सहायक के रूप में वो रिदम सेक्‍शन के इंचार्ज होते थे । दत्‍ताराम जी ढोलक और तबला बजाने में माहिर थे । कई मशहूर गीतों में ढोलक और तबले की थाप उन्‍हीं ने छेड़ी थी । कहा जाता है कि आज भी फिल्‍मी दुनिया में रिदम संभालने वाले लोग दत्‍ताराम की ढोलक को ‘दत्‍तू का ठेका’ के नाम से याद करते हैं ।

दत्‍ताराम जब मुंबई आये थे मंझगांव बंदरगाह पर वो बतौर मज़दूर काम करते थे । ग़रीब परिवार से थे, पढ़ाई ठीक से हुई नहीं थी । पर अपनी मां की प्रेरणा से उन्‍होंने तबला बजाना सीख लिया था । इसके अलावा उन्‍हें व्‍यायामशाला में जाकर बॉडी बिल्डिंग करने का बड़ा शौक़ था । आपको जानकर हैरत होगी कि यही शौक़ संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन के जयकिशन को भी रहा था, दोनों की मुलाक़ात अखाड़े में हुई । और फिर शंकर उन्‍हें पृथ्‍वी थियेटर में ले आये, जहां वो खुद भी काम करते थे । पुरानी फिल्‍म ‘नगीना’ के लिये दत्‍ताराम ने बतौर तबला वादक अपनी पहली रिकॉर्डिंग की
थी । इसके बाद दत्‍ताराम शंकर जयकिशन की संगीत टोली का एक अटूट हिस्‍सा बन गये ।

सन 1971 में जयकिशन के गुज़र जाने के बाद दत्‍ताराम की जिंदगी में तूफान आ गया, उनका काम अचानक कम हो गया । हालांकि कुछ साल उन्‍होंने संगीतकार जोड़ी लक्ष्‍मीकांत प्‍यारेलाल के साथ भी काम किया । राजकपूर की फिल्‍म ‘बॉबी’ में वो लक्ष्‍मी-प्‍यारे के सहायक रहे ।

फिल्‍मी दुनिया में कामयाब लोगों की कहानी तो सब जानते हैं, उनके दीवाने भी बनते
हैं । पर शायद बाहर की दुनिया में किसी को ये अहसास नहीं होता कि कई ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार भी मुंबई में हैं जिन्‍हें अपने हिस्‍से की कामयाबी नहीं मिली । या जो अपना नाम स्‍थापित नहीं कर सके ।

दत्‍ताराम के कुछ गीतों को सुनाने की व्‍यवस्‍था मैंने इस चिट्ठे में ही की है । पर ये हैं कुछ ऐसे गीत, जिन्‍हें फिलहाल सुनवा नहीं पा रहा हूं ।

1. फिल्‍म कैदी नंबर 911......प्‍यार भरी ये हवाएं ।
2. फिल्‍म संतान....जीने वाले खुशी से जिये जा ।
3. फिल्‍म जिंदगी और ख्‍वाब....ना जाने कहां हम थे ।
4. फिल्‍म फर्स्‍ट लव....मुझे मिल गयी हैं मुहब्‍बत की मंजिल ।
5. फिल्‍म काला आदमी.....दिल ढूंढता है सहारे सहारे ।


संगीतकार दत्‍ताराम को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि



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Thursday, May 31, 2007

कभी तन्‍हाईयों में तुमको हमारी याद आयेगी --संगीतकार स्‍नेहल भाटकर को हमारी श्रद्धांजलि




जाने माने संगीतकार स्‍नेहल भाटकर का मंगलवार उन्‍तीस मई को मुंबई में निधन हो गया है । वे अठासी बरस के थे ।

संगीत के सुधी श्रोता स्‍नेहल भाटकर को केदार शर्मा की फिल्‍म ‘हमारी याद आयेगी’ के लिए याद करते हैं, जिसमें मुबारक बेगम ने गाया था ‘कभी तन्‍हाईयों में तुमको हमारी याद आयेगी, अंधेरे छा रहे होंगे कि बिजली कौंध जायेगी’ ।

आपको बता दें कि स्‍नेहल भाटकर कभी आकाशवाणी मुंबई के संगीत-विभाग में कार्यरत थे । पर ये बहुत बहुत बरस पहले की बात है । मुझे कभी उनसे मिलने का सौभाग्‍य नहीं प्राप्‍त हुआ । लेकिन उनके गानों का मैं लंबे समय से प्रशंसक रहा हूं ।

स्‍नेहल भाटकर जिन दिनों आकाशवाणी में कार्यरत थे तभी संगीतकार सुधीर फड़के से उनकी दोस्‍ती हुई और दोनों ने मिलकर जोड़ी बनाई वासुदेव-सुधीर । इस जोड़ी ने मराठी फिल्‍म ‘रूक्मिणी स्‍वयंवर’ में संगीत दिया था । ये उनकी पहली फिल्‍म थी । स्‍नेहल भाटकर के छद्म नाम से संगीत देने के पीछे भी एक दिलचस्‍प राज़ है । आकाशवाणी की नौकरी से उनकी आजीविका चलती थी और वे फिल्‍म संसार में पांव जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे । नौकरी पर कोई आंच ना आये इसलिये उन्‍होंने कई बार नाम बदल बदल के फिल्‍मों में संगीत
दिया ।

स्‍नेहल भाटकर जब एच0एम0वी0 में काम करते थे तब उनकी मुलाक़ात हुई जाने माने गीतकार और निर्देशक केदार शर्मा से । बाद में केदार शर्मा की फिल्‍म ‘नीलकमल’ में उन्‍होंने संगीत दिया था । आपको बता दें कि ये वही नीलकमल है जिसमें राज‍कपूर और मधुबाला ने काम किया था और इस फिल्‍म के सेट पर ही केदार शर्मा जी ने राजकपूर को वो चर्चित थप्‍पड़ मारा था, जिसने राज कपूर को फिल्‍मी दुनिया के प्रति गंभीर बना दिया था । ये किस्‍सा आपने कई जगह पढ़ा सुना होगा । हां ये बताना तो भूल ही गया कि इस फिल्‍म में स्‍नेहल भाटकर ने बी0 वासुदेव के नाम से संगीत दिया था ।

केदार शर्मा की एक फिल्‍म ‘सुहाग रात’ में संगीत देने के लिए उन्‍होंने महिला नाम ‘स्‍नेहल’ चुना । और फिर पूरे कैरियर में ये नाम उनके साथ जुड़ा रहा ।

स्‍नेहल भाटकर ने मुबारक बेगम से फिल्‍म ‘हमारी याद आयेगी’ में दो चर्चित गीत गवाए थे । कभी तन्‍हाईयों में तुमको हमारी याद आयेगी और हाले दिल उनको सुनाया ना गया


सुमन कल्‍याणपुर का गाया फिल्‍म फरियाद का उनका गीत ‘देखो बोल रहा है पपीहा’ काफी चर्चित रहा था ।

शोभना समर्थ की फिल्‍म छबीली में उन्‍होंने नूतन से दो गीत गवाये थे । ऐ मेरे हमसफर और लहरों पे लहर ।

स्‍नेहल भाटकर की संगीतबद्ध कुछ फिल्‍में हैं--- गुनाह, भोलाशंकर, आज की बात, दीवाली की रात, पहला क़दम वगैरह ।

इस चिट्ठे में मैं नीचे स्‍नेहल भाटकर के कुछ गानों की सूची दे रहा हूं, इन पर क्लिक करके आप इन्‍हें सुन भी सकते हैं । फिल्‍हाल इंटरनेट पर यही गीत मिल पाये हैं ।
स्‍नेहल भाटकर को हमारी श्रद्धांजलि ।

लहरों पे लहर उल्‍फत है जवां ( फिल्‍म छबीली) आवाजें हेमंत कुमार और नूतन
सुनने के लिए
यहां क्लिक कीजिये
है दिल में मिलन की आस ( फिल्‍म बिंदिया) आवाज़ तलत महमूद
सुनने के लिये
यहां क्लिक कीजिये
कभी तन्‍हाईयों में तुमको हमारी याद आयेगी ( फिल्‍म हमारी याद आयेगी)
आवाज़ मुबारक बेगम । सुनने के लिए
यहां क्लिक कीजिये


Kabhi Tanhaiyon Me...

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सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे: सचिन देव बर्मन के गाये गीतों पर आधारित श्रृंखला की दूसरी कड़ी ।

मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि सचिन दा की आवाज़ में एक फकीराना स्‍पर्श है । दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं । बाज़ार से निकला हूं ख़रीददार नहीं हूं । कुछ इस तरह का फ़लसफ़ा लगता है । अफ़सोस की बात बस इतनी है कि सचिन दा ने बहुत ज्‍यादा गीत नहीं गाए, शायद इसका कारण ये रहा होगा कि सचिन दा की आवाज़ किसी भी नायक पर‍ फिट नहीं बैठती थी, या इसे दूसरे तरीक़े से कहें तो ज्‍यादा मुनासिब होगा कि किसी भी नायक की शख्सियत ऐसी नहीं थी कि उसे परदे पर सचिन दा की आवाज़ मिल सके । फिर भी कई ऐसे नग़मे हैं जो सचिन दा की उपस्थिति का लगातार अहसास कराते रहते हैं । तो आज हम शुरू करते हैं इस नग्‍मे से ।


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सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे ।।

होता तू पीपल मैं होती, अमरलता तेरी

तेरे गले माला बनके पड़ी मुस्‍काती रे ।।

सुन मेरे साथी रे ।।

जिया कहे तू सागर मैं होती तेरी नदिया

लहर बहर करती अपने पिया से मिल जाती रे

सुन मेरे साथी रे ।।

केवल दो अंतरों का गीत है । दो अंतरे क्‍या हैं, आप खुद ही पढ़ लीजिये केवल चार पंक्तियां हैं मूल रूप से । लेकिन कितना गहरा अर्थ समाहित किया है मजरूह सुल्‍तानपुरी ने इस गीत में । इसे हम विशुद्ध भटियाली धुन कह सकते हैं । भटियाली संगीत में बांसुरी का बड़ा महत्‍त्‍व है । आप इस गाने को सुनिये और बांसुरी की तान के साथ खुद भी लहराईये । ये गाना तब हमारा साथ देता नज़र आता है जब जिंदगी में चीज़ें हमारे हाथ से छूट छूट जाती हैं । हम रेत की तरह उन्‍हें मुट्ठी में बंद करना चाहते हैं और वो सरक सरक पड़ती हैं । ये हमारी निराशाओं का गीत है ।

अगला गीत वो है जिसके बारे में चर्चा करने को हैदराबाद की अन्‍नपूर्णा जी ने भी कहा था, सन् 1971 में आई फिल्‍म अमर प्रेम का गीत ‘डोली में बिठाई के कहार’ ।



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हो रामा रे, हो रामा

डोली में बिठाईके कहार, लाए मोहे सजना के द्वार

ओ डोली में बिठाईके कहार ।।

बीते दिन खुशियों के चार, देके दुख मन को हज़ार

ओ डोली में बिठाईके कहार ।।

मर के निकलना था, घर से सांवरिया के जीते जी निकलना पड़ा

फूलों जैसे पांवों में पड़ गये ये छाले रे, कांटों पे जो चलना पड़ा

पतझड़ हो पतझड़, बन गयी पतझड़ बैरन बहार ।। डोली में बिठाईके कहार ।।

जितने हैं आंसू मेरी अंखियों में, इतना नदिया में नहीं रे नीर

ओ लिखने वाले तूने लिख दी ये कैसी मेरी टूटी नैया जैसी तकदीर

उठा मांझी, ओ मांझी रे, उठा मांझी उठे पतवार ।। डोली में बिठाईके कहार ।।

टूटा पहले मेरा मन, अब चूडियां टूटीं, हुए सारे सपने यूं चूर

कैसा हुआ धोखा, आया पवन का झोंका, मिट गया मेरा सिंदूर

लुट गये, ओ रामा लुट गये, ओ रामा रे, लुट गये सोलह सिंगार ।। डोली में बिठाईके कहार ।।

इस गाने में उस महिला की पीड़ा है, जिसका जीवन उजड़ गया है । आनंद बख्‍शी ने इस गाने को इतनी तल्‍लीनता और तन्‍मयता से लिखा है कि क्‍या कहें । फिल्‍म में ये गीत भी बैकग्राउंड गीत की तरह आता है । ‘मर के निकलना था घर से, जीते जी निकलना पड़ा’ और ‘जितने हैं आंसू मेरी अंखियों में इतना नदिया में नहीं रे नीर’ इन पंक्तियों से जैसे दर्द छलक छलक पड़ रहा है । इस गीत के लिए ऐसी आवाज़ की ज़रूरत थी, जिसमें दर्द का महासागर हो । यूं लगे जैसे कोई किसी ऊंचे से पहाड़ पर खड़े होकर ऊपर वाले तक अपनी दर्द भरी पुकार पहुंचा रहा है । और ये स्‍वर केवल बर्मन दादा की ही हो सकता था । इस गाने को तब सुनिए जब आप नितान्‍त अकेले हों और सुनते हुए अपनी आंखें बंद कर लीजिये, फिर देखिये कि किस तरह आपके अंतस में उतरेगा जज्‍बात का समंदर । दरअसल दर्द भरे इन चुनिन्‍दा गीतों के लिए बर्मन दा संगीत के देवपुरूष हैं । अफ़सोस बस इतना है कि ये गाने ना तो टी0वी0 पर आपको ज्‍यादा दिखाई देते हैं और ना ही रेडियो पर ज्‍यादा सुनाई देते हैं । यहां तक कि श्रोता इन गानों की फ़रमाईश भी नहीं करते । या तो इन्‍हें लोगों ने भुला दिया या फिर संगीत के क़द्रदान वर्ग तक ही ये सीमित रह गये । आज के ज्‍यादातर शोरगुल भरे संगीत में ये खामोश नग्‍मे सुकून का स्‍वर्ग बन गये हैं ।

और अब बात फिल्‍म ‘बंदिनी’ के इस गाने की ।


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ओ रे मांझी

मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूं इस पार

ओ मेरे मांझी, अबकी बार, ले चल पार, ले चल पार ।।

मन की किताब से तू, मेरा नाम ही मिटा देना

गुण तो ना था कोई भी, अवगुण मेरे भुला देना

मुझे आज की बिदा का मरके भी रहता इंतज़ार ।। मेरे साजन हैं ।।

मत खेल जल जायेगी, कहती है आग मेरे मन की

मैं बंदिनी पिया की, चिर संगिनी हूं साजन की

मेरा खींचती हैं आंचल, मन मीत तेरी हर पुकार ।। मेरे साजन हैं ।।


शैलेन्‍द्र ने ये गीत लिखा था सन 1963 में आई फिल्‍म बंदिनी के लिये ।

इस गाने में भी वही विकलता, वही बेक़रारी है । कुछ छूट रहा है, तक़दीर पर अपना वश नहीं है और नायिका की मनोदशा को दर्शाने के लिए ये गीत फिल्‍म में रखा गया है । एक बात की ओर आपका ध्‍यान खींचना चाहूंगा । सचिन दा के जिन नग्‍मों की चर्चा आज हमने की उन तमाम गीतों में एक नारी के हृदय की पीड़ा, उसकी वेदना को उजागर किया गया है । ये सारे गीत बैकग्राउंड में आते हैं । नारी की पीड़ा और उसके जीवन की उलझन को दर्शाने के लिए ये गीत लता जी से भी गवाए जा सकते थे । या किसी और गायिका की आवाज़ भी ली जा सकती थी । पर ये फिल्‍म निर्देशकों की सूझबूझ और कलात्‍मकता ही थी कि उन्‍होंने सचिन दा की आवाज़ का सहारा लिया । बंबईया फिल्‍म के व्‍याकरण के हिसाब से देखें तो एक भी पक्ष इस आवाज़ का समर्थन करता नज़र नहीं आता । फिर भी ये गाने फिल्‍मों में आये । इन्‍होंने लोगों का ध्‍यान खींचा और कामयाबी हासिल की । तभी तो हम आज इतने सालों बाद भी इनका जिक्र कर रहे हैं । वो भी इतनी शिद्दत के साथ । पिछली पोस्‍ट पर किन्‍हीं अमिताभ जी ने टिप्‍पणी की थी कि इन गानों का वीडियो भी अगर दिखाऊं तो अच्‍छा होगा । उनसे निवेदन है कि वो वीडियो की लिंक भेज दें या टिप्‍पणी में इसी पोस्‍ट पर दिखा दें । जो वीडियो मुझे मिले वो यहां दिखाए जा रहे हैं ।

फिल्‍म बंदिनी का गीत ‘ओ रे मांझी’





फिल्‍म गाईड का गीत ‘ वहां कौन है तेरा’

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Tuesday, May 29, 2007

अल्‍ला मेघ दे पानी दे छाया दे रे तू रामा मेघ दे-सचिन देव बर्मन के बहाने बारिश का इंतज़ार


प्रिय मित्रो जब भी तपती हुई गरमी के दिन आते हैं और ये तपिश बर्दाश्‍त से बाहर हो जाती है तो मुझे फिल्‍म गाईड याद आती है । गाईड में देव आनंद सन्‍यासी का भेस धरे हुए हैं और गांव वाले उनसे बिनती करते हैं कि वो किसी तरह इंद्रदेव को मनायें और बारिश ला दें । कुछ यही सीक्‍वेंस है, जब सचिन दा की आवाज़ में एक गाना पृष्‍ठभूमि में बजता है ‘मेघ दे पानी दे रामा मेघ दे’ । उफ़ कितना दर्द और कितनी विकलता है उस आवाज़ में । ऊपर से विजय आनंद ने दृश्‍य भी बड़े मार्मिक रखे हैं । इसलिये जब भी संसार गर्मी से त्रस्‍त हो जाता है, मुझे सचिन दा की आवाज़ की छांह में सुकून मिलता है । ये गीत इंटरनेट पर मिल नहीं रहा था, भाई सागर चंद नाहर ने मेरे लिये ये गीत कहीं से ढूंढ निकाला है । उन्‍हें बहुत बहुत शुक्रिया । पेश है ।

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अल्‍ला मेघ दे पानी दे छाया दे रे तू रामा मेघ दे ।

आंखें फाड़े दुनिया देखे आज ये तमाशा


हाय रे विश्‍वास मेरे हाय मेरी आशा ।।

अल्‍ला मेघ दे पानी दे छाया दे रे तू रामा मेघ दे ।।



ये शैलेन्‍द्र की रची पंक्तियां हैं । जिन पर फिर कभी चर्चा की जाएगी ।

बहरहाल, बर्मन दा पर लिखने की एक वजह ये भी है कि 2006 बर्मन दा का जन्‍मशती वर्ष था, भूले भटके कुछ लोग इस पूरे साल बर्मन दा का जन्‍मशती समारोह मना रहे
हैं । त्रिपुरा के राजकुमार थे सचिन दा और वहां के मछुआरे आज भी बर्मन दा के नग्‍मे गुनगुनाते हुए मछलियां पकड़ते हैं । एन0डी0टी0वी0 पर मैंने बर्मन दा पर त्रिपुरा से एक बहुत सुंदर रिपोर्ट देखी थी और रोमांचित हो गया था ।

बर्मन दा को संगीतकार के रूप में तो सभी जानते हैं लेकिन एच0एम0वी0 ने कभी बर्मन दा के गाये गीतों का एक कैसेट जारी किया था, जिसे मेरे छोटे भाई ने कहीं से खोजकर खरीद लिया था । उसमें बर्मन दा के सारे नग्‍मे थे । वो नग्‍मे जो आपने कहीं ना कहीं सुने होंगे और वो भी जो आपने शायद कहीं नहीं सुने होंगे । जैसे चालीस के दशक की फिल्‍म ताजमहल के गीत । चले चलो प्रेम के राही । प्रेम प्‍यार की निशानी ताजमहल ।
या फिर भंवरा फिल्‍म के गीत—उड़ गया पंछी । और प्रेम का पिंजरा । मैं प्रयास करूंगा कि जल्‍दी ही नेट पर चढ़ाकर ये गीत आप तक पहुंचाऊं ।

बर्मन दा की आवाज़ में एक दर्द है, दर्द कहने से बात नहीं बनती, उनकी आवाज़ के लिए पीड़ा और विकलता जैसे शब्‍द सही बैठते हैं । एक गायक के रूप में उन्‍होंने हिंदी संगीत को भटियाली शैली से परिचित कराया है । भटियाली वो गीत हैं जो बंगाल की सरज़मीं पर नाव खेते मल्‍लाह गाया करते हैं । उनमें दार्शनिकता का अपार पुट होता है । बर्मन दा का मन दरअसल एक मल्‍लाह का मन था । उन्‍होंने जो भी गीत गाये उसमें एक मल्‍लाह की दार्शनिकता है । तूफानी लहरों की गोद में अपनी नौका उतारने के बाद ये तय नहीं होता कि शाम को मल्‍लाह वापस लौट पायेंगे या नहीं । वो ईश्‍वर के भरोसे होते हैं ।

बर्मन दा का फिल्‍म जिंदगी जिंदगी का ये गीत सुनिए । मेरी जानकारी के मुताबिक इस फिल्‍म के लिये बर्मन दा को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिला था ।

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जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप

बीती हुई रातों की बातों की तू छाया

छाया वो जो बनेगी धूप ।। जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप ।।

कभी तेरी किरणें थीं ठंडी ठंडी हाय रे

अब तू ही मेरे जी में आग लगाये

चांदनी ऐ चांदनी तेरे हैं दो रूप ।। जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप ।।

आते जाते पल क्‍या हैं समय के ये झूले हैं

बिछड़े साथी कभी याद आये कभी भूले हैं

आदमी ऐ आदमी तेरे हैं दो रूप ।।

कोई भूली हुई बात मुझे याद आई है

खुशी भी तू लाई थी और आंसू भी तू लाई है

दिल्‍लगी ऐ दिल्‍लगी तेरे हैं दो रूप

कैसे कैसे वादों की तू यादों की तू छाया

छाया वो जो बनेगी धूप ।। जिंदगी ऐ जिंदगी तेरे हैं दो रूप ।।


ये गीत आनंद बख्‍शी ने लिखा है । सन 1972 में आई फिल्‍म जिंदगी जिंदगी के लिए ।


जिंदगी जिंदगी फिल्‍म के इस गाने का शिल्‍प कमाल का है । आनंद बख्‍शी से बहुत ही गहरी बात कही है कि हम सब के दो रूप होते हैं । हम सही मायनों में संसार के रंगमंच के एक अभिनेता हैं । बाहर से हम कुछ और हैं और भीतर से कुछ और । भीतर से कैसे हैं हम, ये जानने के लिए बहुत अकेले हों तो मन के भीतर झांक कर देखना पड़ता है । कभी कभी हैरत होती है कि जैसा बर्ताव हम करते हैं, वैसा करते क्‍यों हैं । कई बार हमें भीतर से पता होता है कि ये हम ग़लत कर रहे हैं । पर करते चले जाते हैं । बहरहाल इस फिल्‍म का एक गीत और है—पिया तूने क्‍या किया रे, इसकी चर्चा हम इस लेख के अगले हिस्‍से में करेंगे । फिलहाल गाईड फिल्‍म के एक और गाने की बात ।

इस गाने में भी जिंदगी की एक सच्‍चाई है, एक फ़लसफ़ा है । और यक़ीन मानिए इससे पहले के गीत और ये गीत भी, अगर बर्मन दा के सिवाय किसी और की आवाज़ में होता तो उनका असर चला जाता । उनमें वो गहराई नहीं आ सकती थी । ज़रा गाईड फिल्‍म का ये गीत सुनिए और सुनते सुनते पढिए भी ।

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वहां कौन है तेरा, मुसाफिर जायेगा कहां

दम ले ले घड़ी भर, ये छैंया पायेगा कहां ।।

बीत गये दिन, प्‍यार के पलछिन,


सपना बनी वो रातें

भूल गये वो, तू भी भुला दे


प्‍यार की वो मुलाक़ातें

सब दूर अंधेरा, मुसाफिर जायेगा कहां ।। वहां कौन है तेरा ।।

कोई भी तेरी राह ना देखे

नैन बिछाये ना कोई

दर्द से तेरे कोई ना तड़पा


आंख किसी की ना रोई

कहे किसको तू मेरा मुसाफिर जायेगा कहां ।। वहां कौन है तेरा ।।

कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी

पानी पे लिखी लिखाई

है सबकी देखी, है सबकी जानी


हाथ किसी के ना आई

कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफिर जायेगा कहां ।। वहां कौन है तेरा ।।


शैलेन्‍द्र का गीत है । अपनी गहनता और वेदना में इस गीत का कोई सानी नहीं है । मेरी इस गीत की पसंदीदा पंक्तियां ये वाली हैं ---

कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी

पानी पे लिखी लिखाई

है सबकी देखी, है सबकी जानी


हाथ किसी के ना आई ।।

सचिन दा की आवाज़ मुझे किसी फ़क़ीर की सी आवाज़ लगती है । किसी संत या सन्‍यासी की आवाज़ । उनकी आवाज़ में कुछ और गीत मैं जल्‍दी ही लेकर आऊंगा इस लेख के दूसरे भाग में ।

फिलहाल आपकी राय का इंतज़ार ।।

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