संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, July 10, 2011

मेरे हमनशीं मेरे हमनवां: दानसिंह जी की याद में।


दानसिंह जी पर ये विशेष आलेख पिछले दिनों 'दैनिक-भास्कर' में प्रकाशित हुआ था। कई मित्रों को 'भास्‍कर' का अंक उपलब्‍ध नहीं हुआ इसलिए उनके आग्रह पर इसे यहां गानों और उनकी लिंक्‍स के साथ दिया जा रहा है।



पिछले दिनों संगीत-संसार से एक बहुत बुरी ख़बर आई। संगीतकार दानसिंह के निधन की ख़बर। मुझे पिछले बरस अप्रैल के वो दिन याद आ गये जब जयपुर में सुर-यात्रा के आयोजन में दानसिंह जी से मिलने का सौभाग्‍य मिला था। हिंदी फिल्‍म-संगीत जगत में कम चर्चित संगीतकारों की एक पूरी फेहरिस्‍त है। लच्‍छीराम, दत्‍ताराम, एन. दत्‍ता, लाला असर सत्‍तार, इक़बाल क़ुरैशी, गणेश, रामलाल, जे. पी. कौशिक वग़ैरह संगीतकारों की एक पूरी फेहरिस्‍त है, जिन्‍हें अपनी प्रतिभा का पूरा हक़ नहीं मिला। जिनके हिस्‍से में गिनी-चुनी फिल्‍में आईं। पर उनमें भी उन्‍होंने अपना पूरा असर दिखाया।

दानसिंह जी की याद विविध-भारती में अकसर आती। उनके रहते हुए भी और अब उनके ना रहने पर भी। और ये याद मुकेश के कुछ अनमोल गानों के लिए तो आती ही जिनका जिक्र मैं आगे चलकर करूंगा। पर मुझे दानसिंह का स्‍वरबद्ध किया सबसे अनमोल गाना लगता है गीता रॉय का—
‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां, मेरे पास आ मुझे थाम ले।’ ये गाना सन 1965 में आई फिल्‍म ‘भूल ना जाना’ का है। और इसे हरिराम आचार्य ने लिखा है। (उनसे भी पिछले ही बरस जयपुर में मिलने का सौभाग्‍य मिला)। गीता रॉय के लोकप्रिय गीतों से बिल्‍कुल अलग, ये गाना अपनी वेदना के लिए सबसे अलग खड़ा नज़र आता है। और इसकी ख़ूबसूरती है साज़ों के किफ़ायत भरे इस्‍तेमाल में। मुझे ये गाना रूह को सिहरा देने वाले मर्सियों की क़तार में रखने लायक़ लगता है। अंतरों पर शहनाई और बांसुरी की गाढ़ी तान....दिल को गाढ़े सुरमई अंधेरे में ले जाती है। और यही इस गाने की गायकी, लेखनी और धुन की कामयाबी है।


1965 में आई ‘भूल ना जाना’ को अपने बेमिसाल गीतों के लिए याद किया जाता है। यहां मैं रवायत के मुताबिक़ इस फिल्‍म को ‘आई’ ज़रूर कह रहा हूं। पर दानसिंह की किस्‍मत की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि उनके सबसे सुंदर संगीत वाली ये फिल्‍म रिलीज़ ही नहीं हो सकी। केवल इसके गाने रिलीज़ हुए।


इस फिल्‍म के गानों में मुकेश का गाया ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे तुमसे अपनी ख़बर मिल रही है’..बड़ा नाज़ुक गाना है ये गुलज़ार का लिखा हुआ। दानसिंह जी के संगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि वो अपने समय के सभी दिग्गजों के बीच अपनी अलग धारा पर चले। पक्‍की और मधुर धुनों के साथ-साथ दानसिंह ने कविता की ऊंचाई को भी कायम रखा। उनके स्‍वरबद्ध सभी गाने अपनी कविताई में भी उत्कृष्‍ट हैं।


मुकेश के कुछ बहुत सुंदर गीत दिये उन्‍होंने। इसी‍ फिल्‍म में हरिराम आचार्य का लिखा गाना है—‘ग़म-ए-दिल किससे कहूं कोई भी गमख़ार नहीं’। अफ़सोस है कि बड़ी संगीत कंपनियों ने मुकेश के सबसे उम्‍दा गानों में अकसर इस गाने की अनदेखी की है। जबकि मुकेश की सांद्र तान, उसका ‘नेज़ल टच’, उसमें बसा दर्द का राग..सब कुछ सुनने वाले को एक अलग ऊंचाई पर ले जाते हैं। यहां हरिराम आचार्य की लेखनी को सलाम ना करें तो बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी होगी।



फिल्‍म ‘माई लव’ सन 1970 में आई थी। और इसमें दानसिंह जी का स्‍वरबद्ध किया सबसे मशहूर गाना था। गिटार की तरंगों से शुरू होकर, सितार से होते हुए हम इस गाने में मुकेश की आवाज़ तक पहुंचते हैं—‘जिक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है’। इसे आनंद बख़्शी ने लिखा। इसी फिल्‍म में मुकेश का ‘वो तेरे प्‍यार का ग़म’ भी था। सेक्‍सोफोन की सुंदर पुकार वाला गाना है ये। मैंने महसूस किया है कि दानसिंह के गाने हल्‍के रिदम के गाने हैं। कभी भी वो रिदम को झमाझम नहीं बनाते थे। इस गाने में तो सेक्‍सोफोन की हल्‍की तरंग मुकेश की आवाज़ के पीछे लगभग लगातार है। अंतरे पर पियानो और सेक्‍सोफोन की मिली-जुली हरकतें हैं। ज़रा सोचिए कि मुकेश के अनगिनत मशहूर गानों पर भारी है ये एक गाना।



इसी फिल्‍म का अनूठी धुन वाला शीर्षक गीत मोहम्‍मद रफ़ी की आवाज़ में था।

फिल्‍म ‘भूल ना जाना’ में मुकेश का एक और गाना था—‘गोरा गोरा मुखड़ा ये तूने कहां पाया है’।

दानसिंह मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश के शिष्‍य थे। मुंबई में उन्‍हें ज़्यादा मौक़े नहीं मिले। फिल्‍में रिलीज़ नहीं हुईं और उन्‍हें जयपुर वापस लौटना पड़ा। दानसिंह की स्‍वरबद्ध कुछ फिल्‍मों की चर्चा ज़्यादा नहीं हुई। जैसे कि 1969 में आई फिल्‍म ‘तूफ़ान’। जिसके कलाकार थे, दारासिंह, अनीता, जॉनी व्हिसकी और हेलेन वगै़रह। मोहम्‍मद रफ़ी का गाया इस फिल्‍म का टाइटल-गीत काफी इन्‍टेन्‍स है। बोल हैं—‘जिंदगी में आया तूफ़ान’।


फिल्‍म ‘भूल ना जाना’ भारत-चीन युद्ध पर केंद्रित थी। भारत सरकार ने पड़ोसी देश से संबंध सुधारने का वास्‍ता देकर फिल्‍म रिलीज़ ना कराने का फैसला सुनाया। इस तरह एक अच्‍छी फिल्‍म डिब्‍बे में बंद होकर रह गयी। ‘भूल ना जाना’ में मन्‍ना डे ने गाया था—‘बहती है जवां ख़ून की आज धारा/उठो हिंद की सरज़मीं ने पुकारा’


 







दानसिंह जी ने जिन फिल्‍मों में संगीत दिया उनके नाम हैं। ‘रेत की गंगा’, ‘भूल ना जाना’, ‘बहादुर शाह ज़फ़र’, ‘मतलबी’, ‘तूफ़ान’ और ‘बवंडर’। जगमोहन मूंदड़ा की फिल्‍म ‘बवंडर’ 1999 में आई थी। दानसिंह जी ने इस फिल्‍म में कुछ ख़ूबसूरत गाने बनाए थे। हाल ही में दानसिंह जी ने गजेंद्र श्रोत्रिय की राजस्‍थानी फिल्‍म ‘भोभर’ का एक गाना बनाया  था। इसे रामकुमार सिंह ने लिखा है। ये गीत है —‘उग म्‍हारो सूरज उग रे'। जो बड़ा ही शानदार बन पड़ा है।

दानसिंह का जाना फिल्‍म-संसार की एक बड़ा नुकसान है। चलते-चलते अपने मन की एक बात कहता चलूं। हमारे देश में कला के क्षेत्र की नामी हस्तियों से जुड़े ‘डॉक्‍यूमेन्‍टेशन’ का कितना अभाव है। वो तो शुक्र है कि दानसिंह जी से पत्रकार ईशमधु तलवार ने वीडियो बातचीत रिकॉर्ड की थी दूरदर्शन के लिए। वरना दानसिंह जी को बोलते-बतियाते अब हम कहां सुनते। विनम्र श्रद्धांजली।

दानसिंह जी से ईश-मधु तलवार की वीडियो-बातचीत और कुछ अन्‍य वीडियो देखिए रेडियोवाणी के दूसरे पन्‍ने पर--
यहां क्लिक कीजिए।

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Friday, August 10, 2007

संगीतकार दानसिंह के अनमोल नग्‍मे—‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां,मेरे पास आ मुझे थाम ले’




पिछले चार दिनों से मुंबई की बारिश ने मेरे एम.टी.एन.एल ब्रॉडबैन्‍ड कनेक्‍शन को तबाह कर रखा था और शुरूआत के बाद पहली बार इतने दिन चिट्ठाकारी की दुनिया से दूर रहना पड़ा । बहुत छटपटाहट हुई । लेकिन साईबर कैफे जाकर माथापच्‍ची करने की ना तो मोहलत मिली और ना ही साहस हुआ ।

फिर कल रात जब कनेक्‍शन दुरूस्‍त हुआ तो देखा कि मेरे छोटे भाई का एक संदेश चिट्ठे पर पड़ा है, क्‍या भाई तीन दिन हो गये, कुछ लिखा नहीं क्‍या हुआ । बहुत अच्‍छा लगा इस संदेश को पढ़कर । ये लगा कि कोई है जो इंतज़ार कर रहा है मेरे लिखने का । पुराने ज़माने के एक ब्रॉडकास्‍टर ने मुझसे एक बार कहा था कि रेडियो से बोलना किसी ऊंची इमारत से कंकर फेंकने जैसा है, पता नहीं किस किस को जाकर लगता है । आप जान भी नहीं पाते । ब्‍लॉगिंग में ऐसा नहीं है । प्रतिक्रियाएं और टिप्‍पणी फौरन मिल जाती हैं और हौसला अफ़ज़ाई भी हो जाती है ।

विकास शुक्‍ल ने तलब किया है कि दानसिंह पर आधारित श्रृंखला का क्‍या हुई भाई साहब । दरअसल दान सिंह वाली श्रृंखला पूरी हो ही नहीं सकी थी । ये इस श्रृंखला की तीसरी कड़ी है । विकास भाई ने जो गाना याद दिलाया है, वो है ‘ज़िक्र होता है जब क़यामत का, तेरे जलवों की बात होती है’ । ये मुकेश के यादगार गानों में से एक है और आगे चलकर ज़रूर सुनवाया जायेगा । लेकिन आज मैं जो गाना लेकर आया हूं वो इस गाने से कहीं ज्‍यादा अच्‍छा है ।

ये गीत है ‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां मेरे साथ आ मुझे थाम ले’

फिल्‍म-संसार के बेहद नाज़ुक गीतों में इस गाने का शुमार होता है । ये गीता रॉय के उन गानों में से एक है जो अनसुने से रह गये, ज्‍यादा कामयाब नहीं हो सके । यहां तक कि म्‍यूजिक कंपनी वाले भी इस तरह के कुछ गानों को अनदेखा करते रहे हैं । ये मुझे बेहद अफ़सोस की बात लगती है ।

बहरहाल......शायद आपको ये जानकर हैरत होगी कि इस गाने को हरिराम आचार्य ने लिखा है । आचार्य भी हिंदी फिल्‍म संगीत के बहुत कम चर्चित गीतकार रहे हैं । उनका ज्‍यादातर काम दानसिंह के साथ ही है । ‘भूल ना जाना’ 1960 में आई फिल्‍म है । मेरी जानकारी ये कहती है कि ये फिल्‍म रिलीज़ नहीं हो सकी थी । लेकिन इसके गानों के तो कहने ही क्‍या । इससे पहले मैंने आपको इसी फिल्‍म का मुकेश का गाया गीत सुनवाया था—‘पुकारो मुझे नाम लेकर’ ।
गीता रॉय ने इस गाने को बड़ी विकलता से गाया है । मैं ज़ोर देकर इस गाने की तुलना ‘साहब बीवी और ग़ुलाम’ के गीत ‘ना जाओ सैंया’ से करना चाहूंगा । दोनों को गीता रॉय ने ही गाया और दोनों में एक अजीब सी विकलता है । ये दोनों गाने कुछ इस तरह के हैं जैसे जिंदगी मुट्ठी में बंद रेत की तरह सरकती जा रही हो और कोई इसे थाम लेने, सहेज लेने की जद्दोजेहद कर रहा हो । कोई अपनी जिंदगी के रेज़े-रेज़े को चुनकर उसे नई शक्‍ल देने की नाकाम कोशिश कर रहा हो, किसी चमत्‍कार ही उम्‍मीद में ।

अब ज़रा इस गाने को सुनिए---
यहां क्लिक करके ।

वायलिन की विकल तान से शुरू होता है ये गाना, उसके बाद आती है गीता राय की दर्द में डूबी आवाज़ । ऐसी आवाज़ जिसकी सांद्रता हर पंक्ति के साथ बढ़ती चली जाती है । जैसे दर्द का गाढ़ा घोल कानों में उतारा जा रहा हो । दानसिंह के सूझबूझ भरे संगीत संयोजन की नायाब मिसाल है ये गीत । यहां फिर कहूंगा कि सबसे कमाल की है इस गाने की धुन, धुन जो गाने को कालजयी बनाती है । फिर आती है गायकी और लेखनी, तीनों के स्‍तर पर मुझे ये बेहतरीन नग़मा लगता है ।


मेरे हमनशीं मेरे हमनवां मेरे पास आ मुझे थाम ले
तू चला है मुझसे बिछड़ के यूं जो शिकस्‍ता-साज़ से रागिनी
जो चली हो जिस्‍म से दूर जां, जो चली हो आंख से रोशनी
मुझे दे दे बांहों का आसरा, मेरे पास आ मुझे थाम ले ।।

ये तेरा मिलन, ये तेरा करम है मुझे हयात से कम नहीं
तू है सामने तो मेरे सनम, मुझे मौत का भी अलम नहीं
ऐ बहारे-दिल, ऐ सुकूने-जां मेरे पास आ मुझे थाम ले
मेरे हमनशीं मेरे हमनवां ।।


बताईये आपका क्‍या कहना है ।


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इस श्रृंखला के अन्‍य लेख-- पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो वो तेरे प्‍यार का ग़म ,
वो तेरे प्‍यार का ग़म

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Saturday, July 28, 2007

श्रृंखला: संगीतकार दानसिंह के अनमोल नग्‍मे:दूसरा भाग —पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो


रेडियोवाणी पर मैं इन दिनों आपको कम चर्चित संगीतकार दानसिंह के गीत सुनवा रहा हूं । मित्र विकास शुक्‍ल ने मुझसे दानसिंह पर काम करने का अनुरोध किया था । और मुझे ये अनुरोध वाक़ई मौज़ूं लगा । कल मैंने आपको सुनवाया था मुकेश का गाया गीत ‘वो तेरे प्‍यार का ग़म, इक बहाना था सनम’ । फिल्‍म ‘माई लव’ का गीत था । आईये आज आपको सुनवायें ‘भूल ना जाना’ फिल्‍म का गीत ।

‘भूल ना जाना’ फिल्‍म कब आई और कब गई, ये हमारी चर्चा का विषय नहीं, बल्कि इसका संगीत है हमारी चर्चा का विषय । और वो भी इसलिये कि इनी-गिनी दो तीन फिल्‍मों में संगीत देने वाले संगीतकार दान सिंह ने इन गानों में कमाल का जादू रचा
है ।

मुझे वाक़ई ये सोचकर कष्‍ट होता है कि इन संगीतकारों को और काम क्‍यों नहीं मिला । कितनी बड़ी फेहरिस्‍त है कम चर्चित संगीतकारों की । जिन पर मैं आगे चलकर कभी चर्चा करूंगा । ज़रा इन नामों पर ग़ौर कीजिये—

इक़बाल कुरैशी (जिनका सबसे लोकप्रिय गीत है ‘इक चमेली के मंडवे तले—फिल्‍म चा चा चा),

दत्‍ताराम (जिनके बारे में मैं लिख चुका हूं)

एन.दत्‍ता( फिल्‍म-धर्मपुत्र के गीत याद कीजिये, ‘मैं जब भी अकेली होती हूं, ये किसका लहू ये कौन मरा, ये मस्जिद है वो बुतख़ाना)

लच्‍छीराम (रजिया सुल्‍ताना फिल्‍म का गीत—ढलती जाये रात कह दे दिल की बात)

लाला असर सत्‍तार ( फिल्‍म संग्राम का गाना—मैं तो तेरे हसीन ख्‍यालों में खो गया)

रामलाल ( पंख होते तो उड़ आती रे—फिल्‍म सेहरा)

बाबुल (जुल्‍फों की घटा लेकर सावन की परी आईं—फिल्‍म रेशमी रूमाल)

रॉबिन बैनर्जी( फिल्‍म सखी रॉबिन का गीत—तुम जो आओ तो प्‍यार आ जाए)

याददाश्‍त के आधार पर लिखी गयी इस फेहरिस्‍त को अगर मैं अपनी संगीत की पोथियां खोलकर बढ़ाऊं तो ये ल...म्‍...बी बनती चली जायेगी । लेकिन यहां ये बात रेखांकित करनी ज़रूरी है कि फिल्‍म-संसार में सब लोग कामयाब नहीं होते । हमें ये नहीं भूलना चाहिये कि कामयाब लोगों की चमक-दमक के पीछे एक अंधेरा भी है, जहां कम कामयाब या नाकाम लोग हैं । वो जिन्‍हें हमने और आपने भुला दिया । उन्‍हें वन फिल्‍म वंडर कहा गया । पर शायद हालात ने या फिर जाने किस वजह ने उन्‍हें कामयाब नहीं होने दिया । ये निश्चित है कि इनमें प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी । ये बात तो इनका काम कहता ही है । शायद मैं इनके गीत कभी आप तक ला सकूं, नहीं लाया तो कृपया रेडियो सुनिए, खोजबीन करिए और इन गानों को सुनिए, गुनिए और बुनिए । अगर अब तक आप अनभिज्ञ हैं तो आपको अहसास होगा कि संगीत के इस ख़ज़ाने से कितना दूर थे आप, और अगर आप इनसे वाकिफ़ हैं तो दिल में दर्द का गहरा अहसास होगा, आपको लगेगा कि काश ये लोग कामयाब होते तो शायद संगीत की ये विरासत और संपन्‍न
होती ।

बहरहाल चलिये फिर से अपने आज के गाने पर आते हैं । आज मैं आपको सुनवा रहा हूं ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो’ । फिर से मुकेश का गाया गीत, इसे गुलज़ार ने लिखा है, और इसमें गुलज़ार का मिज़ाज थोड़ा सा कम है, ये काफी पारंपरिक किस्‍म का खामोश सा गाना है । इस गाने के संगीत पर भी ग़ौर कीजिये और बताईये कि आपने इसकी कौन कौन सी बारीकियां नोट कीं ।

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पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो
मुझे तुमसे अपनी खबर मिल रही है ।।

कई बार यूं भी हुआ है सफ़र में,
अचानक से दो अजनबी मिल गये हों जिन्‍हें रूह पहचानती हो अज़ल से..........अज़ल--जन्‍म से पहले
भटकते भटकते वही मिल गये हों
कुंवारे लबों की क़सम तोड़ दो तुम
ज़रा मुस्‍कुराकर बहारें संवारो
पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो ।।

ख़्यालों में तुम ने भी देखी तो होंगी
कभी मेरे ख़्वाबों की धुंधली लकीरें
तुम्‍हारी हथेली से मिलती हैं जाकर
मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें
बड़ी सरचढ़ी हैं ये जुल्‍फें तुम्‍हारी
ये जुल्‍फें मेरे बाज़ुओं में उतारो
पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो ।।



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Friday, July 27, 2007

संगीतकार दानसिंह के अनमोल नग्‍मे—वो तेरे प्‍यार का ग़म



दो दिन पहले मैंने रेडियोवाणी पर छाया गांगुली के बारे में लिखा था और उनके गीत सुनवाये थे । इस पोस्‍ट पर हमारे नियमित पाठक और मित्र विकास शुक्‍ला ने फ़रमाईश की कि दान सिंग जी की चर्चा की जाए । तो आईये आज से एक एक करके रोज़ सुने जाएं दानसिंह के तीन अनमोल नग्‍मे । इनमें से दो गाने एक ही फिल्‍म के हैं और इस फिल्‍म का नाम है ‘भूल ना जाना’ । जबकि एक गाना है फिल्‍म ‘माई लव’ का ।

आज आपके लिए फिल्‍म ‘माई लव’ का गीत । मुकेश के बहुत प्‍यारे गानों में इसकी गिनती होती है ।

गिटार और पियानो की बेहतरीन तरंगों और कुछ अलग तरह की बीट्स के साथ शुरू होता है ये गीत । मुकेश मुखड़ा गाते हैं और उसके बाद पियानो की स्‍वरधारा.......इसके कुछ ही पलों बाद आती है मेरे प्रिय वाद्य सेक्‍सोफ़ोन की तरंगें । जैसे किसी की विव्‍हल पुकार । और ये पुकार एकदम से ठहर जाये तब आता है अंतरा मुकेश की आवाज़ में ।
मुकेश की आवाज़ की ख़ासियत ये है कि वो बिल्‍कुल सहज गायक हैं । उनके हर गीत को सुनकर यही लगता है कि वो चेहरा बिगाड़ कर गाने वाले गायक नहीं थे । वो एक जेन्‍टलमैन की तरह गाते थे । इस गाने में उनकी संयत आवाज़ वाक़ई समां बांध देती है ।

ये गीत ठेठ आनंद बख्‍शी शैली का गीत है ।
बख्‍शी साहब को बेवफाई बर्दाश्‍त नहीं । उनकी संगीत-यात्रा में दर्जनों ऐसे गीत हैं जिनमें टूटा हुआ दिल आंसू नहीं शोले उगलता है ।

अफ़सोस कि दान सिंह के बारे में मैं ज्‍यादा कुछ नहीं खोज सका । मुझे उनकी तीन ही फिल्‍मों की जानकारी है । ‘माई लव’, ‘भूल ना जाना’ और ‘बवंडर’ ।

कुछ बरस पहले जाने-माने फिल्‍मकार जगमोहन मूंदड़ा ( फिल्‍म कमला, मॉनसून ) विविध भारती में आए थे, मौक़ा था उनकी फिल्‍म ‘बवंडर’ की शूटिंग का । मैंने उनसे लंबी बातचीत की थी और उन्‍होंने बताया था कि राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि पर होने की वजह से उन्‍होंने इसके लिए संगीतकार के रूप में दान सिंह का चयन किया है । मैंने पूछा कि दानसिंह की क्‍यूं । उन्‍होंने कहा कि वो फिल्‍म संसार के विरले संगीतकारों में से एक हैं, इसलिये । जगमोहन मूंदड़ा ने ही मुझे बताया कि दानसिंह शायद जयपुर में रह रहे हैं । फिल्‍मी दुनिया की चमक दमक से उन्‍होंने नाता तोड़ लिया है । बवंडर का संगीत शानदार था । इस फिल्‍म के गीत भी मेरे पास हैं । और किसी दिन रेडियोवाणी पर ज़रूर चढ़ाए जायेंगे ।

बहरहाल फिलहाल सुनिए फिल्‍म ‘माई लव’ का ये गीत ।
ये दुर्लभ भी है और अनमोल भी ।


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वो तेरे प्‍यार का ग़म, इक बहाना था सनम
अपनी किस्‍मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया ।।

ये ना होता तो कोई दूसरा ग़म होना था
मैं तो वो हूं जिसे हर हाल में बस रोना था
मुस्‍कुराता भी अगर तो छलक जाती नज़र
अपनी किस्‍मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया ।।

वरना क्‍या बात है तू कोई सितमगर तो नहीं
तेरे सीने में भी दिल है कोई पत्‍थर तो नहीं
तूने ढाया है सितम, तो यही समझेंगे हम
अपनी किस्‍मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया ।।

वो तेरे प्‍यार का ग़म ।।

रेडियोवाणी पर दानसिंह के गानों पर आधारित ये श्रृंखला जारी रहेगी ।

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