मेरे हमनशीं मेरे हमनवां: दानसिंह जी की याद में।
दानसिंह जी पर ये विशेष आलेख पिछले दिनों 'दैनिक-भास्कर' में प्रकाशित हुआ था। कई मित्रों को 'भास्कर' का अंक उपलब्ध नहीं हुआ इसलिए उनके आग्रह पर इसे यहां गानों और उनकी लिंक्स के साथ दिया जा रहा है।
पिछले दिनों संगीत-संसार से एक बहुत बुरी ख़बर आई। संगीतकार दानसिंह के निधन की ख़बर। मुझे पिछले बरस अप्रैल के वो दिन याद आ गये जब जयपुर में सुर-यात्रा के आयोजन में दानसिंह जी से मिलने का सौभाग्य मिला था। हिंदी फिल्म-संगीत जगत में कम चर्चित संगीतकारों की एक पूरी फेहरिस्त है। लच्छीराम, दत्ताराम, एन. दत्ता, लाला असर सत्तार, इक़बाल क़ुरैशी, गणेश, रामलाल, जे. पी. कौशिक वग़ैरह संगीतकारों की एक पूरी फेहरिस्त है, जिन्हें अपनी प्रतिभा का पूरा हक़ नहीं मिला। जिनके हिस्से में गिनी-चुनी फिल्में आईं। पर उनमें भी उन्होंने अपना पूरा असर दिखाया।
दानसिंह जी की याद विविध-भारती में अकसर आती। उनके रहते हुए भी और अब उनके ना रहने पर भी। और ये याद मुकेश के कुछ अनमोल गानों के लिए तो आती ही जिनका जिक्र मैं आगे चलकर करूंगा। पर मुझे दानसिंह का स्वरबद्ध किया सबसे अनमोल गाना लगता है गीता रॉय का—‘मेरे हमनशीं मेरे हमनवां, मेरे पास आ मुझे थाम ले।’ ये गाना सन 1965 में आई फिल्म ‘भूल ना जाना’ का है। और इसे हरिराम आचार्य ने लिखा है। (उनसे भी पिछले ही बरस जयपुर में मिलने का सौभाग्य मिला)। गीता रॉय के लोकप्रिय गीतों से बिल्कुल अलग, ये गाना अपनी वेदना के लिए सबसे अलग खड़ा नज़र आता है। और इसकी ख़ूबसूरती है साज़ों के किफ़ायत भरे इस्तेमाल में। मुझे ये गाना रूह को सिहरा देने वाले मर्सियों की क़तार में रखने लायक़ लगता है। अंतरों पर शहनाई और बांसुरी की गाढ़ी तान....दिल को गाढ़े सुरमई अंधेरे में ले जाती है। और यही इस गाने की गायकी, लेखनी और धुन की कामयाबी है।
1965 में आई ‘भूल ना जाना’ को अपने बेमिसाल गीतों के लिए याद किया जाता है। यहां मैं रवायत के मुताबिक़ इस फिल्म को ‘आई’ ज़रूर कह रहा हूं। पर दानसिंह की किस्मत की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि उनके सबसे सुंदर संगीत वाली ये फिल्म रिलीज़ ही नहीं हो सकी। केवल इसके गाने रिलीज़ हुए।
इस फिल्म के गानों में मुकेश का गाया ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे तुमसे अपनी ख़बर मिल रही है’..बड़ा नाज़ुक गाना है ये गुलज़ार का लिखा हुआ। दानसिंह जी के संगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि वो अपने समय के सभी दिग्गजों के बीच अपनी अलग धारा पर चले। पक्की और मधुर धुनों के साथ-साथ दानसिंह ने कविता की ऊंचाई को भी कायम रखा। उनके स्वरबद्ध सभी गाने अपनी कविताई में भी उत्कृष्ट हैं।
मुकेश के कुछ बहुत सुंदर गीत दिये उन्होंने। इसी फिल्म में हरिराम आचार्य का लिखा गाना है—‘ग़म-ए-दिल किससे कहूं कोई भी गमख़ार नहीं’। अफ़सोस है कि बड़ी संगीत कंपनियों ने मुकेश के सबसे उम्दा गानों में अकसर इस गाने की अनदेखी की है। जबकि मुकेश की सांद्र तान, उसका ‘नेज़ल टच’, उसमें बसा दर्द का राग..सब कुछ सुनने वाले को एक अलग ऊंचाई पर ले जाते हैं। यहां हरिराम आचार्य की लेखनी को सलाम ना करें तो बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी होगी।
फिल्म ‘माई लव’ सन 1970 में आई थी। और इसमें दानसिंह जी का स्वरबद्ध किया सबसे मशहूर गाना था। गिटार की तरंगों से शुरू होकर, सितार से होते हुए हम इस गाने में मुकेश की आवाज़ तक पहुंचते हैं—‘जिक्र होता है जब क़यामत का तेरे जलवों की बात होती है’। इसे आनंद बख़्शी ने लिखा। इसी फिल्म में मुकेश का ‘वो तेरे प्यार का ग़म’ भी था। सेक्सोफोन की सुंदर पुकार वाला गाना है ये। मैंने महसूस किया है कि दानसिंह के गाने हल्के रिदम के गाने हैं। कभी भी वो रिदम को झमाझम नहीं बनाते थे। इस गाने में तो सेक्सोफोन की हल्की तरंग मुकेश की आवाज़ के पीछे लगभग लगातार है। अंतरे पर पियानो और सेक्सोफोन की मिली-जुली हरकतें हैं। ज़रा सोचिए कि मुकेश के अनगिनत मशहूर गानों पर भारी है ये एक गाना।
इसी फिल्म का अनूठी धुन वाला शीर्षक गीत मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में था।
फिल्म ‘भूल ना जाना’ में मुकेश का एक और गाना था—‘गोरा गोरा मुखड़ा ये तूने कहां पाया है’।
दानसिंह मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश के शिष्य थे। मुंबई में उन्हें ज़्यादा मौक़े नहीं मिले। फिल्में रिलीज़ नहीं हुईं और उन्हें जयपुर वापस लौटना पड़ा। दानसिंह की स्वरबद्ध कुछ फिल्मों की चर्चा ज़्यादा नहीं हुई। जैसे कि 1969 में आई फिल्म ‘तूफ़ान’। जिसके कलाकार थे, दारासिंह, अनीता, जॉनी व्हिसकी और हेलेन वगै़रह। मोहम्मद रफ़ी का गाया इस फिल्म का टाइटल-गीत काफी इन्टेन्स है। बोल हैं—‘जिंदगी में आया तूफ़ान’।
फिल्म ‘भूल ना जाना’ भारत-चीन युद्ध पर केंद्रित थी। भारत सरकार ने पड़ोसी देश से संबंध सुधारने का वास्ता देकर फिल्म रिलीज़ ना कराने का फैसला सुनाया। इस तरह एक अच्छी फिल्म डिब्बे में बंद होकर रह गयी। ‘भूल ना जाना’ में मन्ना डे ने गाया था—‘बहती है जवां ख़ून की आज धारा/उठो हिंद की सरज़मीं ने पुकारा’
दानसिंह जी ने जिन फिल्मों में संगीत दिया उनके नाम हैं। ‘रेत की गंगा’, ‘भूल ना जाना’, ‘बहादुर शाह ज़फ़र’, ‘मतलबी’, ‘तूफ़ान’ और ‘बवंडर’। जगमोहन मूंदड़ा की फिल्म ‘बवंडर’ 1999 में आई थी। दानसिंह जी ने इस फिल्म में कुछ ख़ूबसूरत गाने बनाए थे। हाल ही में दानसिंह जी ने गजेंद्र श्रोत्रिय की राजस्थानी फिल्म ‘भोभर’ का एक गाना बनाया था। इसे रामकुमार सिंह ने लिखा है। ये गीत है —‘उग म्हारो सूरज उग रे'। जो बड़ा ही शानदार बन पड़ा है।
दानसिंह का जाना फिल्म-संसार की एक बड़ा नुकसान है। चलते-चलते अपने मन की एक बात कहता चलूं। हमारे देश में कला के क्षेत्र की नामी हस्तियों से जुड़े ‘डॉक्यूमेन्टेशन’ का कितना अभाव है। वो तो शुक्र है कि दानसिंह जी से पत्रकार ईशमधु तलवार ने वीडियो बातचीत रिकॉर्ड की थी दूरदर्शन के लिए। वरना दानसिंह जी को बोलते-बतियाते अब हम कहां सुनते। विनम्र श्रद्धांजली।
दानसिंह जी से ईश-मधु तलवार की वीडियो-बातचीत और कुछ अन्य वीडियो देखिए रेडियोवाणी के दूसरे पन्ने पर--यहां क्लिक कीजिए।
-----
अगर आप चाहते हैं कि 'रेडियोवाणी' की पोस्ट्स आपको नियमित रूप से अपने इनबॉक्स में मिलें, तो दाहिनी तरफ 'रेडियोवाणी की नियमित खुराक' वाले बॉक्स में अपना ईमेल एड्रेस भरें और इनबॉक्स में जाकर वेरीफाई करें।
