निर्भय-निर्गुण गुण रे गाऊंगा: कुमार गंधर्व का दिव्य-स्वर
बहुत बरस पहले की बात है, मैं मध्यप्रदेश के आकाशवाणी छिंदवाड़ा में शौकिया-रेडियो-प्रस्तुतियां करता था । आकाशवाणी छिंदवाड़ा शहर से दूर एक टेकरी या पहाड़ पर स्थित है । जहां से शहर का सुंदरतम दृश्य नज़र आता है । जब हम 'युववाणी' के लिए प्रतीक्षा कर रहे होते थे उस समय एक कार्यक्रम हुआ करता था 'संझवाती' । संध्या-पूजा के समय में भजन बजाए जाते थे इस कार्यक्रम में और अकसर कुमार गंधर्व का 'चदरिया झीनी रे' या 'उड़ जायेगा हंस अकेला' बजता रहता । विशेष रूप से आकाशवाणी की इमारत की भौगोलिक स्थिति, सुरमई शाम के धुंधलके और एकदम सांद्र सन्नाटे में वो भजन बहुत मन भाते थे, जो कुमार गंधर्व और वसुंधरा कोमकली ने साथ में गाए हैं । एच.एम.वी. की एक पूरी डिस्क है । जिस पर दोनों ओर ये भजन हैं । इन निर्गुण भजनों को सुनकर मन जैसे बैरागी हो जाता था ।
कुमार गंधर्व को सुनना तो उसके बाद भी जारी रहा । एक दिन दादर के 'कोहीनूर म्यूजिक स्टोर' में भटक रहा था कि तभी कुमार जी की आवाज़ में 'कबीर' मिल गए । यानी कुमार गंधर्व को सुनना जारी रहा । हमारे मोबाइल पर 'उड़ जायेगा हंस अकेला' कभी रिंगटोन की तो कभी एम.पी.3 की शक्ल में बजता रहा है । ज़बर्दस्ती दूसरों को सुनवाया भी जाता रहा है । ट्रांस्फर भी किया जाता रहा है । यानी हम कुमार गंधर्व के मुरीदों की क़तार में बीच में कहीं खड़े हुए हैं । एक दिन 'रेडियोवाणी' पर लगे 'सी.बॉक्स' में किन्हीं रविकांत जी का संदेश मिला---'कभी निर्गुण सुनवाएं' । तो जैसे एक साथ कई यादें ताज़ा हो गईं । कुमार गंधर्व को सुनना किसी सौभाग्य से कम नहीं होता । उपमाएं कम पड़ जाती हैं और शब्द हमारी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए पूरे नहीं पड़ते । नए शब्दों को गढ़ने की ज़रूरत है कुमार जी के निर्गुण से गुज़रने के अहसास को बयान करने के लिए । आईये आज से रेडियोवाणी में कुमार गंधर्व को सुनने की अनियमित श्रृंखला शुरू करें । और कबीर की ये रचना सुनें ।
( स्वर कुमार गंधर्व और वसुंधरा कोमकली के )
अवधि- 4.14
