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Tuesday, August 25, 2009

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते : अहमद फ़राज़ की याद में

आज नामचीन शायर अहमद फ़राज़ की याद का दिन है । पिछले बरस आज ही के दिन फ़राज़ इस दुनिया से रूख़सत हुए थे । फ़राज़ एक बिंदास शायर थे । सारी दुनिया में उनके चाहने वालों का कारवां फैला है । कविता-कोश पर आप फ़राज़ के अशआर यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं  । अहमद फ़राज़ को गायकों ने ख़ूब गाया है । मेहदी हसन की आवाज़ में उनकी कई मशहूर ग़ज़लें हैं । आज रेडियोवाणी पर हम उनको खिराजे-अकीदत पेश करते हुए ग़ुलाम अली की गाई ये ग़ज़ल सुनवा रहे हैं ।



सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम* थे कि आते-जाते        
रिश्‍ते
इतना आसां था तेरे हिज्र में मरना जानां
फिर भी इक उम्र लगी है जान से जाते-जाते
सिलसिला-ए-ज़ुल्‍मते शब* से तो कहीं बेहतर था         
रात के अंधेरे का सिलसिला
अपने हिस्‍से की कोई शम्‍मां जलाते जाते
उसकी वो जाने, उसे पास-ए-वफा* था के ना था                   
क़द्र
तुम ‘फ़राज़’ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते ।।

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