सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते : अहमद फ़राज़ की याद में
आज नामचीन शायर अहमद फ़राज़ की याद का दिन है । पिछले बरस आज ही के दिन फ़राज़ इस दुनिया से रूख़सत हुए थे । फ़राज़ एक बिंदास शायर थे । सारी दुनिया में उनके चाहने वालों का कारवां फैला है । कविता-कोश पर आप फ़राज़ के अशआर यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं । अहमद फ़राज़ को गायकों ने ख़ूब गाया है । मेहदी हसन की आवाज़ में उनकी कई मशहूर ग़ज़लें हैं । आज रेडियोवाणी पर हम उनको खिराजे-अकीदत पेश करते हुए ग़ुलाम अली की गाई ये ग़ज़ल सुनवा रहे हैं ।
| सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते वरना इतने तो मरासिम* थे कि आते-जाते रिश्ते इतना आसां था तेरे हिज्र में मरना जानां फिर भी इक उम्र लगी है जान से जाते-जाते सिलसिला-ए-ज़ुल्मते शब* से तो कहीं बेहतर था रात के अंधेरे का सिलसिला अपने हिस्से की कोई शम्मां जलाते जाते उसकी वो जाने, उसे पास-ए-वफा* था के ना था क़द्र तुम ‘फ़राज़’ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते ।। |
