संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
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Sunday, September 21, 2008

'ब्‍लैक फ्रायडे' फिल्‍म का गीत-'अरे रूक जा रे बंदे' । 'इंडियन-ओशन' की पेशकश

हिंदी सिनेमा संगीत में जाने क्‍यों एक चलन हमेशा से रहा है । प्‍यार मुहब्‍बत वाले गानों को जनता ने हमेशा अपने होठों पे सजाया है, लेकिन जहां बात जन-जागरण की होती है, जहां सामाजिक-मुद्दों से जुड़े गानों की बात होती है या दिलो-दिमाग़ को मथ देने वाले गानों की बात होती है तो एक बहुत बड़ा वर्ग इन गानों को ना तो बजाता है और उससे भी बड़ा वर्ग इन गानों को सुनना भी पसंद नहीं करता ।
ये वो दौर है, जब हमारे शहर सुरक्षित नहीं रह गए हैं । ख़ासकर बड़े शहर, Black_friday_banner ये बात भले ही आपको अतिशयोक्ति लगे, लेकिन सच यही है कि अब घर से निकलते हुए बहुधा लोगों को ये भरोसा नहीं रहता कि वो सुरक्षित घर लौटेंगे । मुंबई की लोकल ट्रेनों में जब धमाके हुए थे, उसके बाद कितने ही ऐसे लोग थे जिन्‍हें लोकल ट्रेनों से दहशत हो गई थी । लेकिन उनके पास और कोई विकल्‍प नहीं था । लोकल-ट्रेनें और बेस्‍ट की बसें तो मुंबई में अब भी सुरक्षित नहीं हैं । दिल्‍ली, जयपुर, बैंगलोर और बनारस जैसे शहरों के धमाकों ने साबित कर दिया है कि दहशत के सौदागर बेधड़क घूम रहे हैं और अपनी करतूतों को अंजाम दे रहे हैं । ये सिलसिला संभवत: सन 1993 में हुए मुंबई के अब तक के सबसे बड़े बम धमाकों से शुरू हुआ था ।
इन धमाकों पर मुंबई के टेबलॉयड अखबार मिड-डे के पत्रकार एस.हुसैन ज़ैदी ने एक पुस्‍तक लिखी--Black Friday - The True Story of the Bombay Bomb Blasts. इसी पुस्‍तक पर युवा निर्देशक अनुराग कश्‍यप ने 'ब्‍लैक फ्रायडे' नामक फिल्‍म बनाई थी । आपको याद होगा कि धमाकों की जांच के मद्देनज़र इस फिल्‍म के प्रदर्शन में काफी देर हुई थी । और अब ये फिल्‍म डी.वी.डी. लाईब्रेरियों में आसानी से उपलब्‍ध है । उम्‍मीद है कि आप सभी ने इसे देखा होगा । नहीं देखा तो फौरन से पेशतर देखिएगा । इस फिल्‍म में संगीत दिया था मशहूर बैन्‍ड indian ocean ने । जो गाना मैं आपको सुनवा रहा हूं उसे जहां तक मुझे याद आता है, मशहूर नाट्यकर्मी पियूष मिश्रा ने लिखा है । आज के माहौल के परिप्रेक्ष्‍य में इस गाने को सुनिए और इसके जज्‍बात को शिद्दत से महसूस कीजिए ।
यहां एक बात और कहनी है कि हमारे यहां पॉप-म्‍यूजिक के बैन्‍ड बहुत सीरियसली नहीं लिये जाते । बहुत प्रयोगधर्मी होने के बावजूद बाज़ार के मद्देनज़र उन्‍हें वैसे धूम-धड़ाम गाने बनाने पड़ते हैं, जो बिकें । जिन्‍हें सुनकर सुनने वाले क़दम थिरकाएं । इस गाने को सुनकर मुझे बार बार इप्‍टा के जनगीत याद आते हैं । सफ़दर हाशमी के परचम गीत याद आते हैं । और फिर लगता है कि इंडियन ओशन जैसे पॉप ग्रुप इस काम को आगे बढ़ा सकते हैं । यक़ीन मानिए अगर संस्‍कार पैदा किये जाएं तो ये सिलसिला जारी रह सकता है ।
इस गाने में आवाजें हैं इंडियन ओशन के सुष्मित सेन, असीम चक्रवर्ती, अमित किलाम और राहुल राम की ।

अरे रूक जा रे बंदे , अरे थम जा रे बंदे
कि कुदरत हंस पड़ेगी हो ।
अरे नींदें हैं ज़ख्‍़मी, अरे सपने हैं भूखे
कि करवट फट पड़ेगी हो ।
अरे रूक जा रे बंदे ।।
अरे मंदिर ये चुप हैं, अरे मस्जिद ये गुमसुम
इबादत थक पड़ेगी हो ।
समय की लाल आंधी कब्रिस्‍तां के रस्‍ते
अरे लथपथ चलेगी हो ।
अरे रूक जा रे बंदे ।।
किसे काफिर कहेगा, किसे कायर कहेगा
तेरी कब तक चलेगी हो ।
अरे रूक जा रे बंदे ।।
ये अंधी चोट तेरी कब की सूख जाती
मगर कब पक चलेगी हो ।
अरे रूक जा रे बंदे ।

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