संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।
Showing posts with label shailendra. Show all posts
Showing posts with label shailendra. Show all posts

Tuesday, August 30, 2016

तू जिंदा है तो जिंदगी के गीत पर यक़ीन कर

आज गीतकार और कवि शंकर शैलेंद्र का जन्‍मदिन है।

थियेटर का कोई समूूह या कोई ऐसा जन आंदोलन ना होगा, जिसमें शैलेंंद्र के कुछ गीत ना गाए जाते रहे हों। ये वो गीत हैं जिनका फिल्‍मों से ताल्‍लुक़ नहीं है। आज मैं ऐसा ही एक गीत लेकर रेडियोवाणी पर हाजिर हुआ हूं।

शैलेंद्र अपने फिल्‍मी गीतों में भी हमेशा आम आदमी के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं।
'श्री 420' के एक गाने में वो लिखते हैं--
छोटे से घर में ग़रीब का बेटा/ मैं भी हूं मां के नसीब का बेटा/ रंजोग़म बचपन के साथी/ आंधियों में जली जीवन बाती/ भूख ने बड़े प्‍यार से पाला / दिल का हाल सुने दिल वाला 

बहरहाल....शैलेंद्र की गीतकारी पर फिर कभी विस्‍तार से बातें होंगी। ऐसे गानों कीी बातें जो आम आदमी के गाने हैं। आज सुनते हैं उनका गीत 'तू जिंदा है तो जिंदगी के गीत पर यक़ीन रख'।




तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,
कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!



सुबह औ' शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर
नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


हमारे कारवां का मंज़िलों को इन्तज़ार है,
यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है,
जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,
गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


शैलेंद्र का एक और जनगीत

हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है
संघर्ष हमारा नारा है

तुमने मांगें ठुकराई हैं तुमने तोड़ा है हर वादा
छीना हमसे सस्ता अनाज तुम छंटनी पर हो आमादा
तो अपनी भी तैयारी है तो हमने भी ललकारा है

मत करो बहाने संकट है, मुद्रा प्रसार इन्फ्लेशन है
इन बनियों-चोर-लुटेरों को क्या सरकारी कन्सेशन है
बगलें मत झांको दो जवाब क्या यही स्वराज तुम्हारा है!

मत समझो हमको याद नहीं वो जून छियालीस की रातें
जब काले गोरे बनियों में चलती थीं सौदे की बातें
रह गई गुलामी बरक़रार हम समझे अब झुटकारा है।

क्या धमकी देते हो साहब दम दांती में क्या रक्खा है 
यह वार तुम्हारे अग्रज अंग्रेजो ने भी तो चक्खा है, 
दहला था सारा साम्राज्य जो तुमको इतना प्यारा है। 

समझौता? कैसा समझौता हमला तो तुमने बोला है 
महँगी ने हमें निगलने को दानव जैसा मुंह खोला है,
हम मौत के जबड़े तोड़ेंगे एका अधिकार हमारा है!

अब संभलें समझौतापरस्त घुटना-टेकू ढुलमुल यकीन 
हम सब समझौतेबाजों को अब अलग करेंगे बीन बीन 
जो रोकेंगा वह जायेगा, यह वह तूफानी धारा है।

हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है
हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है


READ MORE...

तू जिंदा है तो जिंदगी के गीत पर यक़ीन कर

आज गीतकार और कवि शंकर शैलेंद्र का जन्‍मदिन है।

थियेटर का कोई समूूह या कोई ऐसा जन आंदोलन ना होगा, जिसमें शैलेंंद्र के कुछ गीत ना गाए जाते रहे हों। ये वो गीत हैं जिनका फिल्‍मों से ताल्‍लुक़ नहीं है। आज मैं ऐसा ही एक गीत लेकर रेडियोवाणी पर हाजिर हुआ हूं।

शैलेंद्र अपने फिल्‍मी गीतों में भी हमेशा आम आदमी के पक्ष में खड़े नज़र आते हैं।
'श्री 420' के एक गाने में वो लिखते हैं--
छोटे से घर में ग़रीब का बेटा/ मैं भी हूं मां के नसीब का बेटा/ रंजोग़म बचपन के साथी/ आंधियों में जली जीवन बाती/ भूख ने बड़े प्‍यार से पाला / दिल का हाल सुने दिल वाला 

बहरहाल....शैलेंद्र की गीतकारी पर फिर कभी विस्‍तार से बातें होंगी। ऐसे गानों कीी बातें जो आम आदमी के गाने हैं। आज सुनते हैं उनका गीत 'तू जिंदा है तो जिंदगी के गीत पर यक़ीन रख'।




तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,
कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!



सुबह औ' शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर
नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


हमारे कारवां का मंज़िलों को इन्तज़ार है,
यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है,
जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!


बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,
गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

READ MORE...
Blog Widget by LinkWithin
.

  © Blogger templates Psi by Ourblogtemplates.com 2008 यूनुस ख़ान द्वारा संशोधित और परिवर्तित

Back to TOP