संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Saturday, July 28, 2007

राजा मेहदी अली खां की याद में आईये आज सुनें उनके गाने


मुझे राजा मेहदी अली ख़ां के गाने बहुत पसंद हैं । ख़ासकर मदन मोहन के साथ उनकी जोड़ी ने जो काम किया है वो कालजयी है । कहते हैं कि मेहदी साहब नवाबों के ख़ानदान के थे । उनके निजी जीवन के बारे में ना तो कुछ ज्‍यादा लिखा गया है और ना ही मुझे पता चल पाया । अफ़सोस कि हमारे यहां इतने नामचीन गीतकारों की गुमनामी को दूर करने का कभी किसी ने सोचा ही नहीं । मुझे बहुत खोजने पर भी ना तो राजा मेहदी अली खां की जीवनी मिली और ना ही उनका कोई चित्र मिला ।


धुंधली सी याद उस पुस्‍तक की जरूर आ रही है जिसे शायद प्रकाश पंडित ने कंपाईल किया था और
जिसमें राजा मेहदी अली ख़ां की उर्दू शायरी से परिचय कराया गया था । मुझे ये भी पता है कि उर्दू में मेहदी साहब एक मज़ाहिया शायर के रूप में ज्‍यादा जाने जाते थे लेकिन फिल्‍म संसार में उन्‍होंने बहुत गंभीर काम किया है । उनके गानों में विविधता है । नाज़ुकी है और सरलता है । ये तीनों चीज़ें फिल्‍मी दुनिया में कामयाबी की बुनियाद होती हैं । फिलहाल ये गीत सुनिए-फिल्‍म है वो कौन थी । संगीत मदनमोहन का है और आवाज़ लता मंगेशकर की ।

मुझे ये क्रांतिकारी गीत लगता है । देखिए कितने अलग तरीक़े से मेहबूबा बेवफ़ाई पर शोले उगल रही है ।



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जो हमने दास्‍तां अपनी सुनाई आप क्‍यूं रोए
तबाही तो हमारे दिल पे आई आप क्‍यूं रोए
हमारा दर्दे ग़म है ये, इसे क्‍यों आप सहते हैं
ये क्‍यों आंसू हमारे आपकी आंखों से बहते हैं
ग़मों की आग हमने खुद लगाई आप क्‍यूं रोए
बहुत रोए मगर अब आपकी ख़ातिर ना रोएंगे
ना अपना चैन खोकर आपका हम चैन खोऐंगे
क़यामत आपके अश्‍कों ने ढायी आप क्‍यूं रोए
ना ये आंसू रूके तो देखिए हम भी रो देंगे
हम अपने आंसूओं में चांद तारों को डुबो देंगे
फ़ना हो जाएगी सारी ख़ुदाई आप क्‍यूं रोए ।।


राजा मेहदी अली ख़ां की पुण्‍‍यतिथि है आज । हम उनको नमन करते हैं ।
उनके गानों पर एक लंबी चर्चा की इच्‍छा है, देखिए कब मोहलत मिलती है इस लंबे काम के लिए ।

आज धीनगाना प्‍लेयर पर मैंने राजा मेहदी अली खां के गीत चढ़ाए हैं । अगर आप इन्‍हें लगातार सुनें तो आपका ये दिन यादगार बन जायेगा, संवर जायेगा, निखर जाएगा ।
धीनगाना प्‍लेयर मेरे चिट्ठे पर बाईं ओर ऊपर है ।

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6 comments:

अजय यादव July 28, 2007 at 1:24 PM  

युनुस भाई!
राजा मेंहदी अली ख़ां साहब ने अपने दौर में कई खूबसूरत गीतों से लोगों के दिलों में राज किया था. मेरा साया, अनपढ़, आपकी परछाइयाँ और वो कौन थी आदि फिल्मों में उनके लिखे गीतों को शायद कोई भी संगीत-प्रेमी भूल नहीं सकता.
उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन! और साथ ही आपका शुक्रिया हमें इस दिन उनकी याद दिलाने के लिये.

Anonymous,  July 28, 2007 at 1:45 PM  

सवेरे मैंने आपकी प्रस्तुति मे राजा मेंहदी अली खां के गीत भूले बिसरे गीत मे सुनें।

मदन मोहन के साथ अनपढ और मेरा साया के गीतों के लिए उन्हें याद किया जाता रहेगा।

अन्नपूर्णा

जोगलिखी संजय पटेल की July 28, 2007 at 2:40 PM  

राजा साहब की पोएट्री का क्राफ़्ट इतना पुरअसर है कि वह सुनते वक़्त पूरे दृष्य को जीवंत कर देता है.लफ़्ज़ों की सादगी और उसमें पोशीदा खयाल दिल को छू जाता है.राजेन्द्र कृष्ण और राजा मेंहदी अली ख़ाँ के साथ मदनमोहनजी की जुगलबंदी हिन्दी चित्रपट संगीत की नायाब धरोहर है.राजा साहब को सुनते वक़्त सुनते वक़्त ठहर सा जाता है.युनूस भाई शराफ़त और भलमनसाती का दौर था वो जिसमें हमारे साहिर,मजरूह,शकील.शैलेन्द्र,और राजा मेहंदी अली ख़ा ने गीत-निगारी की.आज पिछले दौर के की कविता इसलिये भी अच्छी लगती है कि आज मन,रिश्ते,समाज,परिवेश और मनुष्य कहीं न कहीं टूटन से गुज़र रहा है सो इन गीतों का आसरा सिराहना बन तसल्ली की नींद बख्शता है.राजा मेहंदी अली ख़ा के गीतों और ग़ज़लों मे ज़माने का दर्द नमूदार होता आया है.

Udan Tashtari July 28, 2007 at 9:25 PM  

पुनः आभार बेहतरीन प्रस्तुति का.

valmikiramayan.agoodplace4all.com July 29, 2007 at 12:35 AM  

युनुस भाई,

मेंहदी अली खाँ साहेब के विषय में लिखने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया! मैं पुराने जमाने का पुराना आदमी हूँ जिसकी संगीत विषयक रुचियों को स्वयं उसके बच्चे ही उपहास का विषय समझते हैं। जमाना जो बदल गया है। ताल के स्थान पर बीट्स आ गये हैं। खैर, छोड़िये, लोग सोचेंगे कि मैं बहक रहा हूँ। मैं तो समझता था कि अब शायरी, गीत, गज़ल, संगीत का मतलब केवल हो-हल्ला ही रह गया है, मेलोडी नाम की चिड़िया की मृत्यु हो चुकी है। किन्तु आप जैसे कुछ चिट्ठाकारों के चिट्ठों तथा उनकी टिप्पणियों को पढ़ने के बाद लगता है कि मेरी धारणा मिथ्या है। मुझे सुखद आश्चर्य होता है कि लोग आज भी राजा मेंहदी अली खाँ, साहिर, शैलेन्द्र जैसे शायरों, गीतकारों, कवियों को न केवल याद रखते हैं वरन उनकी जन्मतिथियों और पुण्यतिथियों को भी याद रखते हैं।

आपने आज राजा मेंहदी अली खाँ साहब की जन्मतिथि पर जो उनका सम्मान किया है वह अत्यंत सराहनीय है। मेंहदी अली साहब जितना मदन मोहन जी से जुड़े थे उससे भी कहीं अधिक नजदीकी उनकी ओ.पी. नैयर साहब से थी। वैसे तो खाँ साहब ने ओ.पी. नैयर साहब के लिये "उड़े जब जब जुल्फें....", "यही वो जगह है....", "कजरा मोहब्तवाला...", "मेरा नाम चिन चिन चू....", "जाइये आप कहाँ जायेंगे...." जैसे अनेक गीत लिखे किन्तु मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है उनका यह गीत -

मेरा प्यार वो है के
मरके भी तुमको,
जुदा अपनी बाहों से
होने न देगा।

मिली उसको जन्नत तो
जन्नत के बदले,
खुदा से मेरी जाँ तुम्हें माँग लेगा॥

ज़माना तो करवट बदलता रहेगा
नये ज़िंदगी के तराने बनेंगे,
मिटेगी न लेकिन मोहब्बत हमारी,
मिटाने के सौ सौ बहाने बनेंगे।
हक़ीकत हमेशा हक़ीकत रहेगी
कभी भी न इसका फ़साना बनेगा॥

तुम्हें छीन ले मेरी बाहों से कोई
मेरा प्यार ये ना
गवारा करेगा,
तुम्हारा बदन चाँदनी
आ के छू ले,
मेरे प्यार को ये
गँवारा न होगा,
खुदा भी अगर तुमसे
आ के मिलेगा,
खुदा की कसम है,
मेरा दिल जलेगा॥

मेरा प्यार वो है......

mayank July 29, 2007 at 2:21 PM  

युनुस भाई, कल रात कुछ पुराने मित्रों की एक बैठकी में आप का जिक्र निकल आया और भाई प्रमोद व विमल ने एक साथ मेंहदी अली खाँ सहेब का गीत गुनगुनाते रहे. सच मानीये मजा आ गया. बहुत बहुत धन्यवाद आपका
बेगम अख्तर की एक ठुमरी याद आई है कहीं मिले तो कभी जगह दिजीए गा
निहुरे निहुरे बहारे अंगनवा गोरिया निहुरे
कंगना पहिन गोरिया अंगना बुहारे झुक झुक देखें बहरवा ...... गोरिया निहुरे....

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