मैं बार-बार अपने इस चिट्ठे और दूसरे चिट्ठे 'तरंग' पर यायावरी करने की
मेरे एक साथी कहते हैं कि हेमंत कुमार की आवाज़ यूं लगती है जैसे किसी मंदिर में धूप-बत्ती की खुश्बू आ रही हो । जैसे कोई पुजारी तन्मयता से गा रहा हो । जैसे रात के सन्नाटे में अचानक वीणा की तान सुनाई दे रही हो ।
कुछ इसी तरह का अंदाज़ है हेमंत दा का । हेमंत दा और गुलज़ार की जुगलबंदी कई गानों में हुई है । ख़ासतौर पर इस गाने की बात करते हुए मुझे सुकून मिलता है । ज्यादा कुछ नहीं कहना । सुनिए और बताईये ।
जनम से बंजारा हूं बंधु जनम-जनम बंजारा
कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
जहां कहीं ठहर गया दिल, हमने डाले डेरे
रात कहीं नमकीन मिली तो मीठे सांझ-सवेरे
सब नगरी छोड़ी, साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु रे........नगरी छोड़ी साहिल छोड़ा लिया मंझधारा
बंधु कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।।
सोच ने जब करवट बदली शौक़ ने पर फैलाए
....के तिनके सारे डाल से उड़ाए
सब रिश्ते तोड़े नाते तोड़े छोड़ा कुल-किनारा
बंधु रे.....कहीं कोई घर ना घाट ना अंगनारा ।
जनम से बंजारा ।।
आफिस में आनलाईन गाने नहीं सुन सकता हूं.. घर जाकर सुनुंगा.. वैसे ऐसा लग रहा है जैसे मैंने यह गीत नहीं सुना है.. :)
ReplyDeleteprashantvitmca वाला कमेंट मैंने डाला था.. पता नहीं क्यों और कैसे ये मेरा दूसरा इ-मेल ले लिया जो याहू का है..
ReplyDeleteक्या बात है य़ूनुस भाई. हेमन्त दा के सबसे महान गीतों में एक है यह. बहु बहुत धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत खूबसूरत है...धन्यवाद
ReplyDeleteभाईया ये इस गाने पर click करने के बाद भी हम यह गाना नही सुन पा रहे है adobe flash player install hai मैने कई लोगों को लिखा पर जवाब नही मिला. क्या आप जवाब देगे.
ReplyDeleteबहुत अच्छा लगा। बनजारियत की ही तो तलाश है। खोल से बाहर निकलना है।
ReplyDeleteचुनकर दिया गीत - मानो हमारे लिये था।
maja aa gaya Yunus Ji...!
ReplyDeleteहेमंत दा की बात ही कुछ और है... मैं सब से ज्यादा वैसे तो किशोर दा को सुनता हूँ पर हेमत दा के गानों पूरा कलेक्सन रखा है... और जिस दिन बज गया फिर कई दिनों तक बजता ही रहता है...
ReplyDeleteवैसे तो कई गीत है पर अगर बिना कुछ सोचे ५-६ गाने हेमंत दा के लिखने बैठ जाऊं तो ...
'है अपना दिल तो आवारा होता'
'या दिल की सुनो दुनिया वालो',
'जाने वो कैसे लोग थे',
'न तुम हमें जानो'
'नींद न मुझको आए'
'सुन जा दिल की दास्ताँ'
'तरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है की मर जाएँ '
'तुम पुकार लो'
'याद किया दिल ने कहाँ होता तुम'
'ये नयन डरे-डरे'
और हाँ जनम जनम का बंजारा भी...
धन्यवाद.
आज तो सच में मज़ा आ गया ये गाना सुनकर... अब अगले कुछ दिनों तक हेमंत दा को सुनता हूँ.
सच्चा और मधुर गीत, पर इस में भी कड़वा स्वाद लगा होगा अनेक को। हर कोई बंजारा ही है। बस एक काल खंड के लिए वह समझ बैठता है कि वह नहीं है और चिपक जाता है अपने ही बनाए गए घरोंदों से।
ReplyDeleteवाह मजा आ गया हेमंतदा को सुन कर ,बहुत दिनों बाद सुना ये गीत ,प्लीज आपसे एक फरमाइश करती हूँ .... मुझे ये गीत बहुत अच्छा लगता है... ये नयन डरे डरे ... प्लीज सुनवायेंगे?
ReplyDeleteBhai saahab aap kab tak meree pasand ko apanee pasand kah kar sabkee aankhon mein dhool jhokte raheinge? Ab bas bhee keejiye!
ReplyDeleteआप सब को गाना अच्छा लग रहा है - हम तो पिछले बीस साल से हर तीन चार साल नियम से घरबदर कर रहे हैं! सच में ! और यूनुस मियाँ हेमंत दा के ही बोले शब्दों में - "कातिल तुम्हें पुकारूँ या जाने वफ़ा कहूं, हैरत में पड़ गया हूँ में तुमको क्या कहूं" - धूपबत्ती की उपमा नायाब है सटीक है - इस पर एक और सलाम - मनीष [ पुनश्च - कल ई-मेल देख लेना] [irfaan saahab phir aap "nayan dare dare" laga den]
ReplyDeleteबंजारा गीत,बैरागी आवाज़/ बहुत पसंदीदा गीत सुनवाया आज आपने। धन्यवाद
ReplyDeleteमन मोहने वाला गीत लगा ये। सुनवाने का धन्यवाद !
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