रेडियोवाणी पर इन दिनों मशहूर शायर मख़दूम मोहिउद्दीन की रचनाओं
की श्रृंखला चल रही है । लेकिन आज उसे मुल्तवी करते हुए एक अहम शायर को श्रद्धांजली दी जा रही है । कल टेलीविजन पर ख़बर देखी कि जाने-माने शायर सुदर्शन फाकिर नहीं रहे । ये भी देखा कि जगजीत सिंह उनकी यादों की महफिल सजाए हुए हैं ।
सुदर्शन फाकिर के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है । ना ही इंटरनेट खंगालते हुए ज्यादा कुछ पता चला । हां उनकी ग़ज़लों की एक लंबी फेहरिस्त है । और इनमें से ज्यादातर ग़ज़लें कई नामचीन कलाकारों ने गाई हैं । मुझे बेगम अख्तर की गाई ये ग़ज़ल बहुत शिद्दत से याद आती है । आईये इसे सुना जाए । इसकी इबारत भी दे रहा हूं ।
इश्क़ में ग़ैरत-ऐ-जज्बात ने रोने ना दिया
वरना क्या बात थी, किस बात ने रोने ना दिया ।
आप कहते हैं कि रोने से ना बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप की इस बात ने रोने ना दिया
रोने वालों से कह दो उनका भी रोना रो लें
जिनको मजबूरी-ऐ-हालात ने रोने ना दिया
तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ऐ-वक्त-ऐ-मुलाक़ात ने रोने ना दिया
एक दो रोज का सदमा हो तो रो लें फ़ाकिर
हमको हर रोज़ के सदमात ने रोने ना दिया ।।
सुदर्शन फाकिर की सबसे बड़ी ख़ासियत ये थी कि वो बहुत सरल और सादा जज़्बात काग़ज़ पर उतारते थे । उनकी ग़ज़लें इसलिए ज्यादा लोकप्रिय हुईं क्योंकि उनमें उर्दू के भारी-भरकम अलफ़ाज़ नहीं हैं । कहते हैं कि बेगम अख़्तर के वो पसंदीदा शायर थे । हालांकि जगजीत सिंह ने भी उनकी कई रचनाएं गायी हैं । पहले सुनिए बेगम अख़्तर की आवाज़ में उनकी ये बेमिसाल ग़ज़ल ।
कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया
और कुछ तल्खि़ए हालात ने दिल तोड़ दिया
हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
दिल तो रोता रहे, और आंख से आंसू ना बहे
इश्क़ की ऐसी रवायाल ने दिल तोड़ दिया
वो मेरे हैं, मुझसे मिल जायेंगे, आ जायेंगे
ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया
आप को प्यार है मुझसे कि नहीं है मुझसे
जाने क्यों ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया ।।
और अब बारी सुदर्शन फाकिर की लिखी और जगजीत सिंह की गाई उस नज़्म की, जो सारी दुनिया में इसलिए मशहूर है क्योंकि उसके ज़रिए हम अपने बचपन की गलियों में लौट जाते हैं । दुनिया में भला कौन ऐसा होगा जिसे इस नज़्म ने बचपन की तरल-यादों में ना लौटा दिया हो । मैंने अपने स्कूल के दिनों में इसी नज़्म के ज़रिए पहली बार सुदर्शन फाकिर को पहचाना था । इसका वो संस्करण रेडियोवाणी पर चढ़ाया जा रहा है जो किसी कंसर्ट में जगजीत सिंह ने गाया था । ऐसा इसलिए कि इसमें जगजीत सिंह का एक अलग ही रंग नज़र आ रहा है ।
ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी ।
मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन
वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी ।।
मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी,
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में परियों का डेरा,
वो चेहरे की झुर्रियों में सदियों का फेरा,
भुलाए नहीं भूल सकता है कोई,
वो छोटी-सी रातें वो लम्बी कहानी।
कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,
वो गुड़िया की शादी पे लड़ना-झगड़ना,
वो झूलों से गिरना, वो गिर के सँभलना,
वो पीतल के छल्लों के प्यारे-से तोहफ़े,
वो टूटी हुई चूड़ियों की निशानी।
कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना,बना के मिटाना,
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी,
वो ख़्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी,
न दुनिया का ग़म था, न रिश्तों का बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो ज़िन्दगानी ।
सुदर्शन फाकिर जिंदगी भर गुमनाम रहे, वो उन शायरों में से नहीं थे जो टेलीविजन या रेडियो की दुनिया में छाए रहें । वो ज्यादा इंटरव्यू भी नहीं देते थे । ये विडंबना ही है कि शायर सुदर्शन फाकिर की ग़ज़लें उनके नाम से ज्यादा लोकप्रिय हुईं
। और नामवर हो गये वो लोग जिन्होंने सुदर्शन फाकिर को गाया । सुदर्शन तो बस चंडीगढ़ में एक गुमनाम जिंदगी जीते रहे और चुपके से चले भी गए । शायद मौत के ज़रिए भी सुर्खियों में आना उनको मंजूर नहीं था । चलते चलते उन्हीं की ग़ज़ल के कुछ शेर उनके नाम---
पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसां पाए हैं
तुम शहरे मुहब्बत कहते हो, हम जान बचाकर आए हैं ।।
बुतख़ाना समझते हो जिसको पूछो ना वहां क्या हालत है
हम लोग वहीं से गुज़रे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं ।।
हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहां
सहरा में खु़शी के फूल नहीं, शहरों में ग़मों के साए हैं ।।
होठों पे तबस्सुम हल्का-सा आंखों में नमी से है 'फाकिर'
हम अहले-मुहब्बत पर अकसर ऐसे भी ज़माने आए हैं ।।
फाकिर साहब की याद को हज़ारों सलाम ।
सुदर्शन फाकिर की अन्य रचनाओं की फेहरिस्त देखने के लिए यहां क्लिक कीजिए ।
सुदर्शन फाकिर को श्रद्धांजलि
ReplyDeleteफ़ाक़िर साहब ने सचमुच सादा अल्फ़ाज़ में ज़िंदगी की रूमानी और ज़मीनी हक़ीक़तों से हमारी शनासाई करवाई है. ग़ज़लें अगर एक ख़ास श्रोतावर्ग से निकलकर आम श्रोताओं तक आरज़ू लखनवी के ज़रिये तब पहुँची थीं तो सुदर्शन फ़ाक़िर के ज़रिये अब.
ReplyDeleteआपने जिस परिश्रम और लगन से यह पोस्ट लगाई है उसे भी याद रखा जाएगा.
यूनूस भाई, वाकई गजब का लिखते थे फाकिर साहब. "बुतखाना समझते हो जिसको, पूछो न वहाँ क्या हालत है..." उन्हें श्रद्धांजलि.
ReplyDeleteइस पोस्ट के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद.
आप को प्यार है मुझसे कि नहीं है मुझसे।
ReplyDeleteजाने क्यों ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया।।
वाकई हर खासोआम के दिलों को छू जानेवाले शायर थे फाकिर साहब। अफसोस मुझे आज तक पता नहीं था कि वो कागज की कश्ती को लिखनेवाले का नाम सुदर्शन फाकिर है। वाकई काम और नाम होते हुए भी अगर मार्केटिंग दुरुस्त न हो तो प्रतिभाएं कैसे गुमनाम रह जाती हैं।
बहुत जरूरी काम किया आपने. सुदर्शन फ़ाकिर साहब की याद को नमन.
ReplyDeleteफाकिर साहब को श्रदांजलि
ReplyDeleteइश्क़ में ग़ैरत-ऐ-जज्बात ने रोने ना दिया
वरना क्या बात थी, किस बात ने रोने ना दिया ।
हाय कालेज के दिनों में कितनी बार इस शेर ने सहारा दिया है।
फाकिर साहब यहां ना मिल पाये आपसे, ऊपर हम भी आ ही रहे हैं, दस बीस पचास साल में, ऊपर जमकर बैठकें होंगी।
नहीं यूनुस जी, फाकिर साहब के जज्बात सादा नहीं थे, हां अल्फ़ाज़ ज़रूर सादा थे।
ReplyDeleteएक स्तर पर आने के बाद काग़ज़ की कश्ती और बारिश का पानी याद रखना और
हम तो समझे थे बरसात में बरसेगी शराब
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
ये सादा जज्बात नहीं है।
sari nazmo.n kojankari thi bas ye jankati nahi thi ki Faqir sahab ki hai.. batane ka shukriya
ReplyDeleteयूनुस भाई,
ReplyDeleteये सुन कर बहुत दु:ख हुआ की अजीम शायर सुदर्शन फ़ाकिर साहब जन्नतनशीं हो गए.
पर उनके लिखे अशआर हमेशा हमें सुनने को मिलेंगे, और जब भी गायक को दाद मिलेगी तो उस पर पहला हक तो शायर का ही होगा.
धन्यवाद.
फाकिर साहब को श्रध्दांजलि . इतनी खूबसूरत गज़लों के सृजनकर्ता का नाम ही नही पता था मुझे.कितनी बार रिवाइंड करके सुना है उनकी गज़लों को.
ReplyDeletegazalen suni thi. naam nahi pata tha.
ReplyDeleteaise mahan shayar ko shradhaanjali.
फ़ाकिर साहब को जाना भी अभी जब वे नहीं हैं। और ये अति सुन्दर गीत तो वास्तव में उनके प्रति गहरे मन से श्रद्धांजलि देने को प्रेरित कर रहे हैं।
ReplyDeleteशुक्रिया तीन बेहतरीन गजलें सुनाने का।
ReplyDeleteसुदर्शन जैसे शाइर ज़माने में एक बार ही पैदा होते है और उनकी शाइरी सभी के दिलों में मरते दम तक ज़िन्दा रहती है...
ReplyDelete‘दिल तो रोता रहे, और आंख से आंसू ना बहे
ReplyDeleteइश्क़ की ऐसी रवायात ने दिल तोड़ दिया’
यूनुस भाई,
ग़ज़ल के इश्क मे आज कुछ ऐसी ही हालत
है अपने दिल की ।
सुदर्शन फ़ाकिर नहीं रहे..जानकर बहुत धक्का पहुँचा। उनकी कई गजलें और नज़्में सुनते सुनते बड़े हुए हैं। बड़ी मायूसी हुई..
ReplyDeleteजगजीत सिंह की गई हुई ये नज्म तो सुनी थी पर शायर का नाम नही मालूम था।
ReplyDeleteफाकिर साहब को श्रधांजलि ।
सुदर्शन फ़ाकिर को विनम्र श्रद्धांजलि! आम आदमी के जज़्बातों को उसी की भाषा में बेहद खूबसूरती से कहने वाले इस महान शायर की गज़लें और नज़्म हमेशा हमें उनकी याद दिलातीं रहेंगी!
ReplyDeleteझूठा है जो भी कहता है कि फ़ाकिर नहीं रहा
क्या कोई भी उस कलाम का शाकिर नहीं रहा
यूनुस, सुदर्शन फ़ाक़िर की याद को उनकी कृतियो से जोड़ रहें है आप, तो हमें बचपन में सुने दूरियाँ के record की याद आयी जब गीत के सुंदर शब्दों को सुनकर एक नाम ’सुदर्शन फ़ाक़िर’ का जाना था जो आज भी उन गीतों को पुन: सुनते वक़्त ज़ेहन पर आ जाता है।
ReplyDeleteशब्दो से एहसासात का जादू जगानें वाले फ़ाक़िर साहब को श्रद्धा सुमन अर्पित हैं।
महान शायर को विनम्र श्रद्धांजलि!
ReplyDeleteकिसी के जाने के बाद ही उनकी खूबियों के बारे में पता चलता है... कितने दिनो से तो वो कागज़ की कश्ती हम सुनते आ रहे थे या जगजीत चित्रा की वजह से भी हम सुदर्शन जी को गुनगुना रहे थे पर बेग़म अख्तर भी उन्हें गाती थी ये जानकारी मेरे लिये नई है.. हमारी विनम्र श्रद्धांजलि सुदर्शन जी को.......
ReplyDeleteएक अनूठे कलाम के बढ़ जाने पर क्या कह सकते हैं? - उन्हीं के शब्दों में ? - बस तेरी याद के साए हैं .. पनाहों की तरह.. - श्रद्धांजलि - मनीष
ReplyDeleteफाकिर साहेब की एक और रचना मुलाहिजा फरमाइए :
ReplyDeleteकिसी रंजिश को हवा दो के मैं जिंदा हूँ अभी
मुझको एहसास दिला दो के मैं जिंदा हूँ अभी
मेरे रुकने से मेरी साँसें भी रुक जायेगी
फासले और बढ़ा दो के मैं जिंदा हूँ अभी
ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानें वालों
अब कोई और दवा दो के मैं जिंदा हूँ अभी
चलती राहों में यू हीं आँख लगी है फाकिर
भीड़ लोगों की हटा दो के मैं जिंदा हूँ अभी.
सच में जगजीत सिंह जी से ऎसी कितनी हीं लाज़वाब गज़लें सुनी थी मैने, लेकिन शायर का नाम पता न था। और पता भी तब चला जब शायर ना रहा। बड़े हीं अफसोस की बात है।
ReplyDeleteदुआ करता हूँ कि जन्नत में सुदर्शन जी की आत्मा को शांति मिले।
आमीन!
-विश्व दीपक ’तन्हा’