रेडियोवाणी को इसी साल अप्रैल में शुरू किया गया था ।
सोचा ये था कि इस पर गीत संगीत के अलावा मेरे मन की बातों की महफिल भी सजेगी । पर फिर संगीत के तमाम सुधि श्रोताओं और जुनूनियों के इसरार के रहते मैंने रेडियोवाणी पर संगीत के अलावा बाकी तमाम बातें करनी बंद कर दीं । लेकिन चिट्ठा तो अपनी अभिव्यक्ति का एक माध्यम ही है ना । इसलिए काफी दिनों से एक बेचैनी थी कि रेडियोवाणी पर ही वो सिलसिला दोबारा शुरू किया जाये या फिर कोई नया चिट्ठा तैयार किया जाये । मित्रों की सलाह यही थी कि रेडियोवाणी को संगीत का मंच रहने दिया जाये और एक नये चिट्ठे का आगाज किया जाये ।
इसलिए बीस दिसंबर से मैं अपने नये चिट्ठे 'तरंग' की शुरूआत कर रहा हूं । तरंग, मेरे मन की तरंग होगी । इसमें मैं खुद को अभिव्यक्त करूंगा । यानी इसमें मेरे मन की बातें होंगी । मेरी कविताएं, मेरी पसंदीदा कविताएं, पसंदीदा किताबों , फिल्मों और बाकी तमाम मुद्दों की बातें । अपने संस्मरण, यात्रा वृत्तांत । सब कुछ । यानी जो मर्जी में आये वही तरंग पर चढ़ाया जायेगा ।
ये रहा तरंग का लोगो । तरंग आज से तीन दिन बाद शुरू कर दिया जायेगा
तरंग के लिए हमारी तरंगित बधाईयाँ :)
ReplyDeleteaa gaye na line par :) badhai ho
ReplyDeleteअग्रिम शुभकामनायें..
ReplyDeleteआइए, आपकी तरंग में बह जाने के लिए हम बेकरार हैं। - आनंद
ReplyDeleteप्रतीक्षा रहेगी।
ReplyDeleteआइये आइये हमने लाल कालीन बिछवा दिया है स्वागत है मित्र ।
ReplyDeleteswaagat hai, v haardik shubhkaamnaaye
ReplyDeleteस्वागत है. तरंग को भी रेडियोवाणी जैसी सफलता मिले!
ReplyDeleteआप कविता भी लिखते है ?
ReplyDeleteख़ैर तीन दिन बाद पता चल जाएगा कितना ख़ुराफ़ाती दिमाग़ है आपका और तभी तय करेंगें कि आपका स्वागत करें या …
सभी का धन्यवाद । तरंग पर आपका इंतजार रहेगा ।
ReplyDeleteप्यारे युनुस भाई,
ReplyDelete‘मेरी क़िस्मत में ग़म गर इत्ना था
दिल भी या रब कई दिये होते।’
वहाँ एक् और चिठ्ठे की क्या बात।
मै आपकी तकलिफ को समझ सकता हूँ। हिन्दी सिनेसंगीत से लेकर लोकसंगीत तक और कविता से लेकर दोस्तो की महफिल तक ढेर सारी बाते एक चिठ्ठे मे कैसे समायेगी। मेरे पास एक कविता है फुलचंद मानव की ‘काँच के गिलास’। आपको ई-मेल से भेज दुंगा। बरसो पहले ‘धर्मयुग’ मे छपी थी। आप जैसे दोस्तो मे उसे बाँटना जरूरी है। चलो इस बहाने आपके दिल से निकलनेवाली एक नयी ‘तरंग’ का मन से स्वागत।
- डॉ. श्रीकृष्ण राऊत