Friday, January 11, 2008

प्रसून जोशी को सलाम ।

रेडियोवाणी पर आज मैं आपको प्रसून जोशी का लिखा एक बेहद मार्मिक गीत सुनवाना चाहता हूं । हिंदी फिल्‍मों में मां पर बेहद काग़ज़ी कि़स्‍म के गीत लिखे गये हैं, 'मैंने मां को देखा है मां का प्‍यार नहीं देखा' जैसे । लेकिन मां के प्रति अपने जज्‍बात दिखलाने वाले बेहद संवेदनशील गीत गिने चुने हैं, प्रसून जोशी के इस गाने को सुनकर या पढ़कर आंखें भीग जाती हैं । बहुत प्‍यारा-सा नाज़ुक सा गीत है ये ।



उम्‍मीद है कि मेरी 'मम्‍मा' भी इस पोस्‍ट को पढ़ेंगी । हालांकि ये वो बातें नहीं हैं जो मैं अपनी मां से कहना चाहता हूं, पर फिर भी ये उन बातों के आसपास पहुंचती हैं जो मेरे मन में हैं । मुझे वो दिन बहुत याद आता है जब मेरे पिता ट्रेनिंग के सिलसिले में दूसरे शहर में थे, उन दिनों तक मैंने सायकिल चलानी नहीं सीखी थी और भोपाल में हमारी कॉलोनी की सड़कों पर जब बड़े संकोच से गिरते पड़ते मैं सायकिल से जूझा करता था तो मां पीछे से उस छोटी सायकिल को पकड़े रहती थीं । मैं पैडल मारता रहता, इस यकीन के साथ कि मां हैं, पीछे मुझे थामे हुए हैं । और शायद हफ्ते भर में ऐसा भी हुआ कि मां ने पीछे से हाथ छोड़ दिया और मैं अपने आप सायकिल चलाने लगा । आज सोचता हूं कि जिंदगी की सायकिल चलाते हुए मैं कितनी दूर आ गया हूं.......मां वहीं खड़ी मेरे लौटने का इंतज़ार कर रही हैं । रोज़गार और महत्‍वाकांक्षाएं हमें ...अपनों से... भौ‍गोलिक रूप से कितनी दूर ले जाकर खड़ा कर देती हैं ना ।



लेकिन मुझे पता है कि विविध भारती पर मुझे और कोई सुन रहा हो या नहीं, मेरी मां हैं जो नर्म सबेरों में, सूनी और बोझिल दोपहरों में, सुरमई शामों में और सर्दीली रातों में मुझे सुन रही हैं । जिस दिन मेरी आवाज़ थोड़ी 'कमज़ोर या नेज़ल' लगे वो फोन पर पूछ लेती हैं--क्‍यों हो गयी फिर से सर्दी । आवाज़ बदल बदल के कितनी बार फोन पर मैंने मां को चकमा देने की कोशिश की, पर कभी कामयाब नहीं हो सका ।

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मैं कभी बतलाता नहीं पर अंधेरे से डरता हूं मैं

यूं तो मैं दिखलाता नहीं, तेरी परवाह करता हूं मैं मां

तुझे सब है पता, है ना मां

तुझे सब है पता मेरी मां ।।



भीड़ में यूं ना छोड़ो मुझे, घर लौट के भी आ ना पाऊं मां

भेज ना इतना दूर मुझको तू, याद भी तुझको आ ना पाऊं मां

क्‍या इतना बुरा हूं मैं मां

मेरी मां ।।



जब भी कभी पापा मुझे जो ज़ोर से झूला झुलाते हैं मां

मेरी नज़र ढूंढे तुझे, सोचूं यही तू आके थामेगी मां

तुमसे मैं ये कहता नहीं, पर मैं सहम जाता हूं मां

चेहरे पे आने देता नहीं, दिल ही दिल में घबराता हूं मां

तुझे सब है पता, है ना मां

मेरी मां ।।



मैं कभी बतलाता नहीं, पर अंधेरे से डरता हूं मैं मां

यूं तो मैं दिखलाता नहीं, तेरी परवाह करता हूं मैं मां

तुझे सब है पता, है ना मां

मेरी मां ।।

14 comments:

  1. माफ़ करना यूनुस जी मुझे ये गीत भी काग़ज़ी किस्म का ही लग रहा है।

    अन्नपूर्णा

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  2. भाई यूनुस माँ के नाम पर आपको सलाम.
    अन्नपूर्णा जी सही हो सकती हैं . मगर कोई गीत किसी पर कितना असर डालता है वह भावना के स्तर पर तय होता है. कोई गीत जब सुना जाता है उस समय आपकी मन:स्थिति कैसी है उस पर भी निर्भर करता है. एक गीत हम बहुत बार सुनते हैं सामान्य तौर पर. मगर वाही गीत किन्ही विशेष पलों में सुनते हैं तो उसका नया अर्थ समझ में आता है जिसे हम फिर कभी नहीं भूलते.

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  3. भाई यूनुस माँ के नाम पर आपको सलाम.
    अन्नपूर्णा जी सही हो सकती हैं . मगर कोई गीत किसी पर कितना असर डालता है वह भावना के स्तर पर तय होता है. कोई गीत जब सुना जाता है उस समय आपकी मन:स्थिति कैसी है उस पर भी निर्भर करता है. एक गीत हम बहुत बार सुनते हैं सामान्य तौर पर. मगर वाही गीत किन्ही विशेष पलों में सुनते हैं तो उसका नया अर्थ समझ में आता है जिसे हम फिर कभी नहीं भूलते.

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  4. माँ पर आधारित कोई भी गाना शायद ही बुरा होता होगा।

    वैसे जिस गाने मैंने माँ को देखा है .....को आपने कागजी किस्म का कहा है उस फिल्म मे बच्चे की माँ तो नही थी या शायद सौतेली माँ थी जो उस पर काफी अत्याचार करती थी (ठीक से याद नही है )इसीलिए उस गाने मे इस तरह की लाईनें है।

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  5. नमस्कार यूनुस जी..
    वैसे तो ये गीत मैं पहले ही अपने चिट्ठे पर सुना चुका हूँ पर उससे पहले आपके बचपन की घटना का वर्णन बहुत अच्छा लगा..
    ये सिनेमा मैंने रात वाले शो में देखा था, और उस समय मुझे अपनी माँ का गोद और उनका आँचल बहुत याद आ रहा था.. तो अब आप मेरी भावनाओं का अंदाजा लगा सकते हैं..

    उस समय मेरे जेहन में एक और गीत घूम रहा था.. S.D. बर्मन जी का गाया हुआ "मेरी दुनिया है माँ, तेरे आँचल में.."

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  6. ओह! मां के विषय में लिखना कितना अपनापन रखता है - कितना मर्म को छूता है।

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  7. मैं नहीं जानता कि अन्नापूर्णा जी ने इसे क़ागजी कैसे कह दिया। इस गीत के बारे में मुझे भी बहुत कुछ लिखना है इसे मैंने करीब १२ दिन पहले सुना और बस सुनते ही आँखें नम हो गईं पर ये आँसू खुशी के थे। प्रसून जोशी के काव्यमय गीतों में एक और सितारा जड़ गया।

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  8. युनुसजी,
    बढिया गीत, यों मुझे बोल पढना गीत सुनने से ज्यादा पसन्द आये । चलिये अब ईमेल की बजाय यहीं बतला लेते हैं । आपकी डीवीडी भूला नहीं हूँ बस जिन्दगी के कारखानों में खो सा गया हूँ :-)

    कल ही बडे अरसे के बाद एक फ़िल्म देखी, "खोया खोया चाँद", आप जरूर देखें । फ़िल्म का संगीत बडा सराहनीय और सबसे अच्छी बात कि पूरी फ़िल्म को काम्प्लिमेंट करता है । गीतों के बोल भी खास हैं, मजाज और खुसरो के कलाम से Inspired हैं लेकिन लिखने वाले ने उनका नाम इशारे से दिया है ("मिजाज में मजाज है") ।

    हमारी तो ये रही, आप कहाँ खो गये हैं? रेडियोवाणी पर नयी पोस्ट बडी धीरे धीरे आ रही हैं । आपकी तरंग दिमाग से फ़िसल गयी थी, अभी उसको पढकर भी आपसे बात करना बाकी है । देख लो, ऐसे ही टिप्पणी नहीं लिख देते हैं :-)

    साभार,

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  9. शुक्रिया मित्रो, दरअसल हर गाना अलग अलग व्‍यक्तियों को अलग अलग स्‍तर पर छूता है । और ये अच्‍छी बात है कि सबकी अपनी अलग राय होती है । मुझे ये गीत बहुत अपीलिंग लगा इसलिए यहां प्रस्‍तुत किया । जल्‍दी ही एक और गीत यहां लाया जा रहा है ।

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  10. युनुस जी हमें तो गाना बहुत अच्छा लगा आप ने इस बार फ़िल्म का नाम नहीं दिया, तारे जमीं पर का है न? आप ने मां से ये सब न कहा हो और शायद उन्हें एह्सास होगा फ़िर भी कह देने में कोई हर्ज नहीं, मां भी ये न कहेगीं कि वो ऐसा कुछ सुनना चाह्ती हैं, लेकिन सच सच

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  11. मुझे आपका प्रश्न मिला गया है.. मैं उसका उत्तर ढूँढने की कोशिश करता हूँ..
    और हाँ, कला मैं जब अपनी माँ से बात कर रहा था टू उन्हें ये गीत गा कर सुनाया और उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा.. वो ये गीत पहली बार सुन रही थी..
    मेरा इ-पता है : prashant7aug@gmail.com

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  12. अपने सलाम में एक / दो / तीन/ (जितने माने) सलाम इधर के भी जोड़े - यहाँ गुरूवार की छुट्टी "तारे ज़मीन पर" - पहली बार इसे परदे के सामने देखा/ सुना - आपने अगर फ़िल्म नहीं देखी है तो जल्दी देखें - शर्तिया रोयेंगे इस गाने में - फूट फूट कर - लगी शर्त - [ अच्छा बाकी के गाने भी अव्वल हैं] - manish

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  13. देखिये न यूनुस जी कुछ चीज़ें कितनी यूनिवर्सल होती है...माँ भी उनमें से एक है....माँ शब्द ही अपने में बड़ा भीगा सा लगता है मुझे...फिर चाहे वो "मैने माँ को देखक है" वाला गीत हो या फिर "मै तुम्हें बतलाता तो नही"
    और आपने अपने अनुभव बता कर आँखें भिगो दीं.... मेरा भांजा (बहन का बेटा) जो कि न्यूज़ एंकर है उसके साथ कुछ ऐसा ही हमारा भी व्यवहार होता है जैसा आपने अपनी माँ का बताया...!"आज आँखें क्यों सूजी लग रही थी...रात में देर से सोये थे क्या.." "आज तुमने न्यूज़ रीडिंग नही की, तबियत खराब है क्या...?" यही प्रश्न हमारे भी होते है...!

    और आज कल छोटा भांजा जब गुस्सा होने पर धीमे से सर झुका के कहता है..."तुम्हे सब कुछ पता है न माँ...!" तो किस माँ सी की हिम्मत होगी नाराज़ होने की

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