संगीत का कोई मज़हब, कोई ज़बान नहीं होती। 'रेडियोवाणी' ब्लॉग है लोकप्रियता से इतर कुछ अनमोल, बेमिसाल रचनाओं पर बातें करने का। बीते नौ बरस से जारी है 'रेडियोवाणी' का सफर।

Sunday, April 22, 2007

मुंबई एक बड़ा कूड़ाघर

जब मैं 1996 में पहली बार मुंबई आया तो मन में ये छबि थी कि ये सपनों का शहर है, सुंदर शहर होगा । लेकिन पिछले दस वर्षों में पाया कि मुंबई एक वृहद् कूड़ाघर के सिवाय कुछ नहीं है । धारावी एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी है । देश का सबसे बड़ा कूड़ाघर । इसकी अपनी एक अर्थव्‍यवस्‍था है, जिस पर ये चिट्ठाकार जल्‍दी ही अलग से चर्चा करेगा । पर ऊपर से देखने पर धारावी एक विशाल कूड़ाघर ही है ।


वर्ल्‍ड ट्रेड सेन्‍टर के पिछवाड़े आपको स्‍लम्‍स की झालर नज़र आ जायेगी । माहिम, वडाला और सायन के इलाक़े में तो पटरियों के इतने क़रीब झोपड़पट्टी है कि ट्रेन ड्राईवर भी डरते डरते गाड़ी आगे बढ़ाता है । यक़ीन मानिए मद्धम गति से रेंगती ट्रेन से हाथ बढ़ाकर इस झोपड़पट्टी की दुकानों से आप सिगरेट और पान खरीद सकते हैं । मेरे दफ्तर की ओर जाने वाली सड़क के किनारे पिछले कई सालों से झोपड़पट्टी की क़तार है । जिसे हज़ार बार उजाड़ा गया पर फिर यहां बहारे-चमन हो गया ।
समस्‍या ये है कि ये मज़लूम लोग आखिर कहां जायें । कहां रहें । झोपड़पट्टियों में भी इनको बाक़ायदा डिपॉजिट भरना पड़ता है । और हर महीने किराया अदा करना होता है । कचरेघर में रहने की क़ीमत अदा करनी पड़ती है ।


मुंबई में जुहू से लेकर अक्‍सा, गोराई और अरनाला तक हर समुद्री किनारे पर कचरा ही कचरा नज़र आयेगा । विख्‍यात मरीन ड्राईव की दीवारों पर बैठकर ठांठे मारते समंदर की लहरों को देखना पहले हर व्‍यस्‍त और तनावग्रस्‍त मुंबई वासी को सुकून से भर देता था । वहां भी अब पहले जैसी बात नहीं रही ।

लोखंडवाला और बांद्रा जैसे इलाक़ों में जाईये, जहां चमकीले फिल्‍मी सितारे रहते हैं, वहां की गलियां भी आपको कूड़े से भरी नज़र आयेंगी । कौन करेगा इस शहर की सफाई ।

रवीना टंडन जैसी कुछ फिल्‍मी तारिकाओं ने ज़रूर कहीं कहीं शहर को साफ रखने की मुहिम चलाई । मगर शाहरूख़ और अमिताभ जैसे ‘व्‍यस्‍त’ सितारे विज्ञापन फिल्‍मों में ‘स्‍वच्‍छ मुंबई-सुंदर मुंबई’ का नारा लगाकर अपनी दुनिया में मगन हो गये ।


कई इलाक़े तो ऐसे हैं जहां डंपिग साईट के काफी नज़दीक बड़ी बड़ी बस्तियां हैं । एकदम पॉश । बड़े बड़े बिल्‍डर अपने व्‍यवसायिक हितों को ध्‍यान में रखकर पूरी ताक़त लगाते हैं और डंपिंग साईटों को थोड़ा आगे खिसकवा देते हैं । यानी कचरे का री-लोकेशन या कह लीजिये ट्रांस्‍फर ।
मुंबई के ऊपर से उड़ान भरिये । और देखिये—आपको या तो फ्लाई ओवर नजर आयेंगे या फिर कचरे का महासागर । बेचारा अरब सागर कचरे के बीच दुबका हुआ दिखाई देगा ।

इस विशाल कचरे-घर से ही देश की सबसे खूबसूरत फिल्‍में आती हैं । 'स्‍ट्रग्‍लर’ अचानक स्‍टार बन जाते हैं । स्‍टॉक मार्केट उछलकूद मचाता है । टेक्‍नॉलॉजी अपने कारनामे करती है । और टी0वी0 चैनलों पर सास-बहू वाली अश्रूपूरित-कचरा-सामग्री पेश की जाती है ।

यक़ीन मानिए मुंबई एक बड़ा कूड़ाघर है । दोस्‍त आपके शहर का क्‍या हाल है ।

11 comments:

mahashakti April 22, 2007 at 1:17 PM  

कहने को तो भारत प्रगति कर रहा है किन्‍तु जिस दिशा मे प्रगति वास्‍तव मे होनी चाहिये थी वह न हो कर हम भ्रष्‍टाचार मे प्रगति कर रहे है।

आपने मुम्‍बई का जैसा मनोरम वर्णन किया है वह उच्‍च कोटि का है।

मुम्‍बई ही नही देश के हर महानगर की यही दशा है। पर मुम्‍बई में सब कुछ पहले ही दिख जाता है।

Raviratlami April 22, 2007 at 2:14 PM  

मेरे शहर रतलाम का भी यही हाल है.

क्या आप ब्लॉग हेडर की पहली पंक्ति हटा सकेंगे? ये मुझे थोड़ा सा असहज बना देती हैं.

धन्यवाद.

धुरविरोधी,  April 22, 2007 at 3:41 PM  

यूनुस भाई, स्वागत है आपका.
हर शहर के दो हिस्से हैं, मुम्बई बड़ा है सो बड़ा कूड़ाघर, कोई शहर छोटा है सो छोटा कूड़ाघर.
हमारा शहर भी वाकी शहरों जैसा ही है

Manish April 22, 2007 at 6:16 PM  

गंदगी तो सर्वव्यापी है यूनुस...जितनी ज्यादा जनसंख्या और जितना कारोबार उतनी ही गंदगी । जनता भी उसी हिसाब से रहने की आदि हो गई है और अपनी ओर से भी इसे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ती ।

शैलेश भारतवासी April 22, 2007 at 6:23 PM  

यूनुस जी,

आपने मुम्बई की चमक-दमक से अलग उसकी गंदी छवि को प्रभावी तरीके से वर्णित किया है, कम से कम हर पाठल के मन में इसे पढ़कर यह सवाल ज़रूर उठता होगा॰॰॰॰

कब से इस दोज़ख में जी रहा है आदमी
अर्सा हुआ कोई पैगम्बर नहीं आता।।

Ojha April 22, 2007 at 10:17 PM  

अरे मैं तो कानपुर में हूँ... जो कूड़ाघर को परिभाषित करता है। इसे दुनिया के १० सबसे प्रदूषित जगहो में होने का गौरवप्राप्त है। पर हाँ एक बात ये भी है कि मैं जिस परिसर में रहता हूँ, वो मेरे हिसाब से भारत की सबसे खूबसूरत और स्वच्छ जगह है। तो मुम्बई में भी ऐसी जगहें तो होंगी ही। हम अपनी जगहों को साफ रखने के अलावा कर भी क्या सकते हैं।

नितिन व्यास April 22, 2007 at 11:28 PM  

दोस्त आपका चिठ्ठा अच्छा लगा‍

Manish April 23, 2007 at 9:15 AM  

सारे शहरों का कमोबेश यही हाल है । जितनी ज्यादा आबादी और कारोबार उतनी ही गंदगी और प्रदूषण । सरकार की बात अगर छोड़ें भी दें तो जनता जनार्दन भी इस गंदगी को बढ़ाने में ही सहयोग करती है।

कल ही ये कमेन्ट किया था पता नहीं क्यूँ नहीं आया ।

Pankaj Bengani April 23, 2007 at 10:36 AM  

हमारे शहर का हाल इतना बुरा नहीं है युनुसजी,


थोडे लकी हैं हम. :)

अनुनाद सिंह April 23, 2007 at 11:32 AM  

आपने एक बड़ी समस्या को सतही तौर पर देखा और दिखाया है। भारत के शहर अन्य बातों के अलावा 'जनसंख्या-ओवरलोड' के शिकार हैं। अच्छा होता यदि आप समस्या का संतुलित और 'क्रिटिकल' विश्लेषण प्रस्तुत करते और इससे भी अच्छा तब होता यदि आप इसका कुछ व्यावहारिक समाधान प्र्सतुत करते।

yunus April 23, 2007 at 10:02 PM  

महाशक्ति भाई, कचरे के विवरण को मनोरम मत कहिए, रवि जी, रतलाम ही नहीं शायद ये सारे देश का हाल है । धुरविरोधी जी भी तो यही कह रहे हैं । शैलेष जी पैग़बंर नहीं आयेगा, अब हमें ही ये जिम्‍मेदारी निभानी होगी । अपना गम लेके कहीं और ना जाया जाये, घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए । ओझा भाई आई0आई0टी0 ना सिर्फ देश की सबसे सुंदर बल्कि बुद्धिमान जगहों में से एक है । नितिन भाई चिट्ठे पर आने का शुक्रिया, संपर्क रखियेगा । मनीष जी, जनता जनार्दन हर चीज के लिये सरकार का मुंह देखना छोड़ दे तो अच्‍छा हो । पंकज जी आप भाग्‍यशाली हैं, जो आपका शहर और वहां का प्रबंधन अच्‍छा है । अनुनाद जी, मैंने चिट्ठे में विश्‍लेषण का प्रयास किया भी नहीं था, जो देखा उसे सामने रखने का प्रयास किया । अब आपने कहा है तो गंभीर विमर्श और निदान भी प्रस्‍तुत करना होगा । इस बारे में जल्‍दी ही कुछ लिखूंगा । धन्‍यवाद सबको ।

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